बीज हैं या बेताल

अपने देश में आजकल आनुवांशिक बीज अथवा जेनेटिकली मोडिफाईड अनाजों के बारे अक्सर चर्चा होती है. कुछ साल पहले तक इन शब्दों से हमारा कोई वास्ता नहीं था.लेकिन अचानक ही पैदावार बढ़ाने के लिए आनुवांशिक बीजों के प्रयोग को आधुनिक खेती के नाम पर प्रस्तुत किया जा रहा है. सबसे पहला सवाल तो यही है कि क्या आनुवांशिक बीज खेती के लिए सुरक्षित हैं? अमरीका में पहले मक्के और अब चावल के साथ की गयी आनुवांशिक छेड़छाड़ का जो परिणाम आया है उससे यह साबित हो गया है कि आनुवांशिक बीज मानव जाति को ही बर्बाद कर देंगे. सीधे सपाट अर्थों में समझना हो तो दो अलग-अलग प्रजातियों की आनुवांशिकी के साथ बेताली प्रयोग करके जिस बीज का निर्माण किया जाता है उसे जेनिटकली मोडिफाईड बीज कहा जाता है. हो सकता है चावल की नस्ल सुधारने के लिए उसमें बिच्छू के कुछ अंश शामिल कर दिये जाएं. या फिर ऐसे ही प्रयोगों को आनुवांशिक प्रयोग कहते हैं.

पिछले साल देश के विभिन्न हिस्सों में एक निजी कंपनी द्वारा इस तरह के चावल का उत्पादन किया गया था. इनमें उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, इलाहाबाद, हरियाणा के करनाल और पंजाब के लुधियाना प्रमुख हैं. जाहिर सी बात है कि किसानों को बड़े-बड़े और सुनहले सपने दिखाये गये लेकिन हकीकत नहीं बताई गयी कि इन बीजों की असलियत क्या है. सबकुछ बहुत गुप्त तरीके से किया गया. लेकिन समय रहते भारतीय किसान यूनियन ने इसका विरोध किया जिससे सारी हकीकत सामने आ गयी.

किसान यूनियन के इस आंदोलन के बाद सरकार ने आंशिक तौर पर कियान यूनियनों की कुछ मांगों को स्वीकार कर लिया और आनुवांशिक प्रयोगों वाले बीज पर फिलहाल रोक लगा दी. इस रोक में पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश भी शामिल हैं. फिर भी इस रोक के बावजूद बीटी राईस को रोपने की अनुमति दे दी गयी. और इस बार गोरपुर इलाहाबाद नहीं बल्कि प्रदेश की राजधानी को प्रयोग के लिए चुना गया. यह लखनऊ में हो रहा है. चावल के साथ-साथ आलू, बैंगन, टमाटर, मूंगफली, सरसों सहित दूसरी कई फसलों में आनुवांशिक छेड़छाड़ वाले बीजों को बोने की अनुमति दे दी है. आम आदमी भले ही आनुवांशिक बीजों के खतरों को न जानता हो लेकिन सरकार तो जानती है. फिर भी धड़ल्ले से यह सब हो रहा है. सरकार केवल अनुमति ही नहीं जमीन भी दे रही है, यह जानते हुए कि यह उत्पादक और उपभोक्ता दोनों के लिए खतरनाक है.

अमरीका जैसे व्यावसायिक देश में अगर आनुवांशिक बीजों के प्रयोग के खिलाफ आवाज उठ रही है तो हम क्यों चुप रहें? वियतनाम और थाईलैण्ड जैसे देशों ने अपने यहां आनुवांशिक प्रयोग वाले धान की खेती को बंद कर दिया है तो हमारा देश यह प्रयोग क्यों करे? क्या हमारे किसानों के खेत इतने सस्ते हैं कि कोई कंपनी जैसे चाहे वैसा उन पर प्रयोग कर ले? किसान भाईयों को इस बारे में खुद सोचना होगा.
और केवल किसान ही नहीं बल्कि हर नागरिक को इस बारे में सजग रहना होगा. अन्न हम सबकी जरूरत है. हम सब जो खाते हैं वह शुद्ध और पौष्टिक हो यह हमारा अधिकार है. अगर सरकार को हमारे स्वास्थ्य की चिंता नहीं है तो क्या हमें भी अपने स्वास्थ्य की चिंता नहीं होनी चाहिए? हम सबको अपने और अपने परिवार तथा अपने समाज के स्वास्थ्य की स्वास्थ्य रक्षा के लिए आनुवांशिक अन्न उत्पादन का विरोध करना चाहिए. क्या किसान चाहेंगे कि वे ऐसा अन्न पैदा करें जिसे खाने से लोग गंभीर रोगी हो जाएं? अगर नहीं तो किसान इस बारे में जागरूक हों कि वे अपने खेतों में आनुवांशिक बीजों का प्रयोग नहीं करेंगे, और किसानों के इस संकल्प में पूरे उपभोक्ता समाज को उनकी मदद करनी चाहिए.

क्या हुआ अमेरिका में?
(बायर कंपनी के आनुवांशिक प्रयोग के कारण अमरीका में छाये चावल संकट पर ग्रीनपीस द्वारा जारी रिपोर्ट का सार)
अगस्त 2006 में अमरीकी कृषि विभाग ने एक विज्ञप्ति जारी की जिसमें कहा गया था कि अमरीकी चावल निर्यातक एलएल601 (लिबर्टी लिंक) के शिकार हैं. चावल का यह प्रकार (एलएल601) अमरीकी कंपनी बॉयर कार्पसाईंस ने विकसित किया है. अमरीकी कृषि विभाग की यह घोषणा खतरे की घंटी थी. क्योंकि इस विज्ञप्ति में की गयी स्वीकारोक्ति से अमरीकी चावल उद्योग इतिहास के सबसे भयावह वित्तीय और वाणिज्यिक संकट में फंसने जा रहा था. इसका असर केवल अमरीका ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया पर होने जा रहा था. इस स्वीकारोक्ति की कीमत सबको चुकानी थी और इससे चावल उद्योग कुछ ऐसे बदलावों में उलझ गया जिसके लिए वह तैयार नहीं था.

लिबर्टी लिंक के कारण पूरी दुनिया को 741 मिलियन डॉलर से 1.285 अमरीकी डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा है. जिन किसानों या उत्पादकों को लिबर्टी लिंक जीई चावल के कारण नुकसान उठाना पड़ा है वे अब इस प्रयास में हैं कि उनके नुकसान की भरपाई जीई चावल विकसित करनेवाली कंपनी बॉयर कार्पसाईंस एलपी, राईसलैण्ड फूड्स और प्रोड्यूसर्स राईस मिल के जरिए हो.

अमरीकी चावल निर्यात में बॉयर के इस संक्रमित उत्पाद के कारण हजारों किसान और चावल व्यापारियों को घाटा उठाना पड़ेगा. ऐसा अनुमान है कि बॉयर के इस गलत प्रयोग के कारण अमरीका का 63 प्रतिशत चावल निर्यात प्रभावित होगा. बॉयर जीई बीज के जमीनी परीक्षण के कारण चावल निर्यातक, किसान, मिल मालिक, थोक और खुदरा चावल व्यापारी सभी प्रभावित हुए हैं. हालांकि अभी बॉयर पर दावा ठोंकने वालों की संख्या सैकड़ों में ही है लेकिन इस बात की पूरी संभावना है कि जल्द ही यह संख्या हजारों में पहुंच जाएगी.
इस घटना से हम क्या सीखेंगे?
बॉयर के इस प्रयोग का जो परिणाम हुआ है उससे हमें एक सबसे बड़ी सीख यह मिलती है कि सीमित मात्रा में भी अगर आनुवांशिक बीजों का व्यावसायिक जमीनी परीक्षण किया जाता है तो भी वह विनाशकारी साबित हो सकता है. आज हम जिस संक्रमित चावल को लेकर चिंतित हो रहे हैं उसका जमीनी परीक्षण पांच साल पहले किया गया था. आज पांच साल बाद हमें उसका परिणाम दिखाई दे रहा है. एलएल601 के व्यावसायीकरण की योजनाएं 2001 में ही रोक दी गयी थीं जब जमीनी परीक्षण हो रहे थे. अब इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इस तरह कृषि उत्पादों के संक्रमण के खतरे के कारण आनुवांशिक बीजों के जमीनी परीक्षण की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. यह पूरे कृषि उद्योग के लिए खतरनाक साबित हो सकता है.

लिबर्टी लिंक (एलएल601) संक्रमण अकेला ऐसा मामला नहीं है जिसमें बॉयर कार्प साईंस पर आरोप लग रहे हैं. 2001 में स्टार लिंक का प्रयोग भी भयावह परिणाम देनेवाला था. स्टार लिंक मक्के में आनुवांशिक प्रयोग था. आनुवांशिक मक्के के उत्पादन को किसी भी तरह से मनुष्य के उपयोग के लायक नहीं समझा गया था.

अमरीका में चावल उत्पादन उद्योग अब मुख्यतया लैटिन अमेरिका में निर्यात पर ही आधारित है. लेकिन लैटिन अमेरिका के देश कोई सुनिश्चित और सुरक्षित बाजार नहीं हैं. इन देशों में आनुवांशिक उत्पादों के लिए अपने बाजारों को पूरी तरह से खोला भी नहीं है, इसलिए ऐसे हालात में यह माना जा सकता है कि अमरीका का चावल बाजार और चावल निर्यातक दोनों के लिए ही यह मुश्किल भरा दौर हो सकता है.

महामारी से बचना है तो आनुवांशिक संक्रमण से दूर रहिए
आज अमरीकी चावल उद्योग के लिए सबसे जरूरी है कि वह आनुवांशिक संक्रमण से पूरे चावल उद्योग को बचाए और चावल पर किये जा रहे आनुवांशिक प्रयोगों को तुरंत पूरी तरह से रोक दे. अमरीकी सरकार, व्यापारी और उत्पादक सभी को मिलकर यह तय करना होगा कि अगर उन्हें दुनिया के चावल बाजार में टिके रहना है तो भविश्य में किसी भी प्रकार के आनुवांशिक प्रयोगों से बचना होगा.

2 thoughts on “बीज हैं या बेताल

  1. अपन को बस इतना समझ मे आया कि
    ” महामारी से बचना है तो आनुवांशिक संक्रमण से दूर रहिए”

    शुक्रिया!!

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  2. “बॉयर के इस प्रयोग का जो परिणाम हुआ है उससे हमें एक सबसे बड़ी सीख यह मिलती है कि सीमित मात्रा में भी अगर आनुवांशिक बीजों का व्यावसायिक जमीनी परीक्षण किया जाता है तो भी वह विनाशकारी साबित हो सकता है”

    सहमत !! मैं कम से कम 30 साल से यह बात कहता आया हूं — शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
    हर महीने कम से कम एक हिन्दी पुस्तक खरीदें !
    मैं और आप नहीं तो क्या विदेशी लोग हिन्दी
    लेखकों को प्रोत्साहन देंगे ??

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