पर्यावरण का पाठ

आत्मा कभी मरती नहीं क्योंकि वह अजर-अमर है. वह हमारे शरीर में निवास करती है और आत्मतत्व इस शरीर को वाहक के रूप में उपयोग करती है. जब शरीर अशक्त हो जाता है तो आत्मा उसी तरह इसे छोड़ देती है जैसे पुराने पड़ने पर हम वस्त्र का त्याग कर देते हैं. यह धारणा भारतीय जीवन-दर्शन में रची-बसी है. अब इसकी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए प्रयोग करने होंगे. जो इस धारणा को चुनौती देना चाहते हैं उन्हें जरूर प्रयोग के रास्ते इस बात को स्वीकार अस्वीकार करना चाहिए. लेकिन कुछ क्षण के लिए इस बात को मान भी लें कि भारतीय जीवन दर्शन की इस धारणा में कुछ भी अन्यथा नहीं है तो सवाल उठता है कि आत्मा का निवास कहां है? शरीर में है यह बात सही है. समय आने पर जब आत्मा शरीर का त्याग करती है वह जाती कहां है? क्या वह उन्हीं पंचमहाभूतों में वापस लौट जाती है जिसके समुच्चय से इस नश्वर शरीर की रचना होती है?

मेरे पर्यावरण का पाठ इसी सवाल से शुरू होता है. भारतीय विज्ञान और दर्शन में पंच महाभूतों से शरीर रचना का विवरण है. इस बात का बहुत तथ्यपरक विश्लेषण है कि कैसे हमारा शरीर अग्नि, जल, आकाश, धरती और वायु का समुच्चय है. और इस समुच्चय में केन्द्रीय भूमिका में आत्मा रहती है. यानी आत्मा के संयोग से पंच महाभूत जीव के नश्वर शरीर की रचना करते हैं. यहां दो सवाल उठना स्वाभाविक है. पहला क्या पंच महाभूत आत्मतत्व से अलग हैं जो शरीर की रचना करने के लिए उन्हें किसी परा ब्रह्मांडीय शक्ति के साथ समन्वय करना पड़ता है? दूसरा, अगर हां तो क्या पंचमहाभूत भी नश्वर हैं?

भारतीय दर्शन विज्ञान पंचमहाभूतों को नश्वर मानता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पंचमहाभूत आत्म तत्व से मुक्त हैं. पंचमहाभूत दर्शन को समझने के लिए हमें यह समझना होगा कि जब आप कोई रचना करते हैं तो रचना के साथ ही उसकी एक समयसीमा भी निर्धारित कर देते हैं. पंचमहाभूत के संयोग से जो कुछ भी निर्मित होता है उसकी एक निश्चित अवधि होगी ही. संसार में हम जो कुछ भी देख रहे हैं वे इन्हीं पंचमहाभूतों के समन्वय से उत्पन्न हुई हैं. कोई भी पदार्थ ऐसा नहीं है जो इनसे पृथक हो सिर्फ रूप बदलते चले जाते हैं. ये पंचमहाभूत ही हैं जो रूप, रस, गंध, नाद और प्रकाश की रचना करते हैं. ऐसा अनुभव होता है कि केवल शरीर ही नहीं पूरी सृष्टि इन्हीं पंचमहाभूतों के समन्वय से निर्मित होती है, नष्ट होती है और पुनः नया रूप धारण करती है.
मेरी समझ यह कहती है कि जितना यह शरीर नश्वर है उतना ही पंचमहाभूत. इन सबका एक काल है. भौतिकी पर शोध करनेवाले इसको ज्यादा तार्किक ढंग से विश्लेषित कर सकते हैं कि कैसे पूरा पर्यावरण मृतप्राय है. भौतिक विज्ञान की नयी खोज इस दिशा में है कि क्या यहां से लेकर वहां तक कोई शक्ति स्रोत है जो समूचे ब्रह्माण्ड में समान रूप से विद्यमान है. कुछ लोग इसे जीरो पॉवर का नाम दे रहे हैं तो कुछ लोग इसे स्प्रिंग थियरी कह रहे हैं. यह स्प्रिंग थियरी नयी है. इसके पीछे भी तर्क वही है जो जीरो पॉवर के पीछे है. यानी कोई एक सूक्ष्म शक्ति है जो पूरे ब्रह्मांड को चलायमान रखे हुए है. इस विषय पर जो लोग भौतिकी के आधार पर वैज्ञानिक बनकर शोध कर रहे हैं हो सकता है लोगों को उनके कहे पर विश्वास आ जाए और मान लें कि यत् पिंडे तत् ब्रह्माण्डे भी उसी जीरो पॉवर की ओर संकेत है. लेकिन यह विश्वास भी अधूरा ही होगा अगर हमने उसे अनुभव नहीं किया.
भारत में विज्ञान की लोकधारा बहती है. इसलिए बहुत गूढ़ बातें बड़ी सरल तरीके से लोगों में कही जाती हैं. हमें कहा जाता है कि आत्मानुभव करना ही चाहिए. यह आत्मानुभव क्या कोई अवैज्ञानिक अवधारणा है? अगर एक ताकत सर्वत्र विद्यमान है तो उसको कैसे अनुभव किया जाए? जो लोग शोध करते हैं वे आखिरकार किसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं. निष्कर्ष पर पहुंचने के बाद उस शोध का असल लक्ष्य क्या है? वह आम आदमी के कल्याण के लिए उपयोग हो. हमारे शोध प्रबंध इसलिए बेकार होते जा रहे हैं क्योंकि वे किताबों में कैद हो जाते हैं. यह तरीका पश्चिम ने सिखा दिया है जो ज्ञान को भी कमाई का जरिया मानता है. नहीं तो हमारे ज्ञान का असल लक्ष्य है लोक कल्याण. हो सकता है इसीलिए भारत में गूढ़ तकनीकि और वैज्ञानिक तथ्य को सरल तरीकों के सहारे समाज में स्थापित कर दिया गया. शोध वगैरह तो कुछ लोगों की बाते होती हैं.
ब्रह्मांड में हम एक तिनका भी डाल नहीं सकते और इससे एक तिनका बाहर निकाल नहीं सकते. हम सिर्फ इतना कर सकते हैं कि अपनी योग्यता, क्षमता और स्मृति के आधार पर जितना संभव हो सके उसमें फेरबदल करते चले जाएं. हम लोग मान सकते हैं कि यही करना हमारे होने की सार्थकता भी है. हकीकत में हम इससे ज्यादा कुछ कर भी नहीं सकते. कह सकते हैं कि यहां से प्रकृति की व्यवस्था में बुद्धि का हस्तक्षेप शुरू होता है. यह कोई अन्यथा हस्तक्षेप नहीं है. यह उसी प्रकृति का अनिवार्य हिस्सा है जिसके कारण हमारा अस्तित्व है. आत्मा की प्रेरणा के बिना हम कुछ नहीं कर सकते. हमारे ज्ञान का आदिस्रोत आत्मा में ही निहित है. कोई भी यह सवाल पूछ सकता है कि अगर हमारे ज्ञान का आदिस्रोत आत्मा में ही निहित है तो विक्षेप क्यों दिखाई देता है? इसका अर्थ यह हुआ कि संसार में कुछ भी अन्यथा नहीं हो रहा है. हमारे हर कर्म की प्रेरणा हमारी आत्मा ही है तो फिर अन्यथा क्या है?
इस सवाल का सही जवाब पाने के लिए आपको खुद आत्मानुभव से गुजरना चाहिए. दूसरे के जवाब से आप कभी सत्य तक नहीं पहुंच सकेंगे. जो जानता है वह बोल नहीं सकता और जो नहीं जानता उसके बोले का कोई मतलब नहीं है. जब आप अपनी इस अलौकिक यात्रा की तैयारी करते हैं तो आपको स्थूल से शुरूआत करनी होती है. जैसे तिल में छिपे तेल को निकालने के लिए आपको बहुत स्थूल रूप में तिल को पकड़ना होता है वैसे ही आत्मा की सूक्ष्म उपस्थिति को अनुभव करने के लिए स्थूल अर्थात पंचमहाभूत को समझने से शुरूआत करनी होगी. ज्यादा सरल शब्दों में कहें तो आपको अपने पर्यावरण को समझने की कोशिश से शुरूआत करनी होगी. किसी के प्रति आपकी समझ-बूझ तब बनती है जब आप उसके प्रति अनुराग रखते हैं. उसको समझने और उसके साथ एकाकार होने की कोशिश करते हैं.
आत्मा को उपलब्ध होना सर्वश्रेष्ठ इच्छा है. इस परम इच्छा की पूर्ति के लिए हमें पंचमहाभूतों को समझना होगा.

इसलिए सबसे पहले पर्यावरण के नजदीक जाना होगा. उसके साथ अनुभूति का रिश्ता कायम करना होगा. आपके आस-पास जो पेड़ पौधे हैं, जो पानी का स्रोत है, सिर के ऊपर जो नीला आसमान है तथा पैरों के नीचे जो जगत-जननी वसुधा है इन सबके प्रति के विवेक सम्मत विचार करना होगा. मैं यह नहीं कहता कि आप सीधे इन पंचमहाभूतों के प्रति आस्था और समर्पण का भाव रखना शुरू कर दें लेकिन इतना तो कर ही सकते हैं कि आप इनके प्रति विवेकपूर्ण विचार रखना शुरू करें. ज्यादा सोच-विचार के बिना भी अपने आस-पास के पर्यावरण के प्रति तर्कबुद्धि से विचार करना शुरू कर दें तो शुरूआत हो सकती है. पानी का हमारे जीवन में क्या उपयोग है? हवा का हमारे जीवन में क्या उपयोग है? धरती का हमारे जीवन में क्या उपयोग है? ऊपर-ऊपर केवल इतना सोचने से ही अच्छी शुरूआत हो जाएगी.

अगर इन तत्वों का हमारे जीवन में उपयोग है तो हमारा उनके प्रति कैसा दृष्टिकोण होना चाहिए? यह विवेकसम्मत सवाल तो हर एक को अपने आप से पूछना ही चाहिए. जिस दिन आप अपनेआप से यह विवेकसम्मत सवाल पूछना शुरू कर देंगे उसी दिन से आप पर्यावरण रक्षा शुरू कर देंगे. यह सवाल तो हममें से हर एक को पूछना ही चाहिए, आखिरकार हम सबको आत्मानुभव करने का जन्मसिद्ध अधिकार है.

2 thoughts on “पर्यावरण का पाठ

  1. “सबसे पहले पर्यावरण के नजदीक जाना होगा. उसके साथ अनुभूति का रिश्ता कायम करना होगा”

    एकदम सही बात है. काश पर्याप्त संख्या में लोग इसे जान जाते — शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
    हर महीने कम से कम एक हिन्दी पुस्तक खरीदें !
    मैं और आप नहीं तो क्या विदेशी लोग हिन्दी
    लेखकों को प्रोत्साहन देंगे ??

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  2. सर मुझे हिंदू दर्शन की एक अच्छी किताब का नाम बताएं

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