"भारत एक बिकाऊ और गया गुज़रा देश है, ये सच है"

नये-पुराने सभी ब्लागर रजनीश मंगला को जानते ही होंगे. वे उन कुछ लोगों में हैं जो हिन्दी ब्लागिंग के शुरूआती दौर से काम कर रहे हैं. आज उनकी एक पोस्ट है कि “भारत जैसे घटिया देश ही हैं जहां एक साथ दो-दो करंसी चल सकती है.” उनका आशय है कि भारत में कोई विदेशी डॉलर में भी भुगतान कर सकता है. केवल इसी आधार पर भारत को घटिया कहा होगा ऐसा लगता नहीं है. उनकी स्मृति में और भी बातें होंगी जिसने मजबूर किया कि वे ऐसी बात कहें. यह बात बहुतों को नागवार लग सकती है कि भारत को कोई घटिया कहे. संजीत त्रिपाठी ने टिप्पणी के माध्यम से कहा है कि बाकी बातें तो ठीक हैं लेकिन यह घटिया शब्द ठीक नहीं लगता. इसके बाद रजनीश मंगला ने पलटकर जो जवाब लिखा है वह बहुत तल्ख है. वे लिखते हैं “त्रिपाठी जी क्या मैं भारत को घटिया इसलिए न कहूँ क्योंकि मैं भारतीय हूँ? आप खबरों से या ब्लॉगों से एक भी ऐसी चीज़ दिखायें जो भारत की अच्छी तस्वीर पेश करता हो। भारत एक बिकाऊ और गया गुज़रा देश है, ये सच है।”

रजनीश मंगला की बातों से आप सहमत हैं या असहमत यह तो आप जानें. लेकिन थोड़ा बहुत मैं भी जानता हूं रजनीश मंगला को. मुझे तो वे हमेशा एक तड़पती मछली ही लगे जो कि भारतीयता के लिए कुछ न कर पाने की टीस में छटपटाता ही रहता है. वे चाहते हैं कि भारत में हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में ही ज्ञान-विज्ञान, समाज, राजनीति, अर्थशास्त्र, तकनीकि आदि विषयों की पढ़ाई हो. उनकी इस तड़प से हम सब इत्तेफाक ही रखेंगे. ऐसा आदमी जो एक ओर निज भाषा, भूषा, भोजन के प्रति इतना आग्रही हो वह अपने ही देश के बारे में इतनी तल्ख टिप्पणी कैसे कर सकता है?

मेरा मानना है कि अतीत के गौरव से वर्तमान का काम नहीं चलता. वर्तमान ठीक होना ही चाहिए. आज हमारा वर्तमान गड़बड़ाया हुआ है. इसलिए मैं रजनीश मंगला की बात को सार्वभौम सच न भी मानूं तो उनसे पूरी तरह असहमत भी नहीं हूं. संजीत त्रिपाठी के सवाल का जो जवाब उन्होंने दिया है वह हमारी क्रूर हकीकत है जिससे हम इन्कार नहीं कर सकते.

7 thoughts on “"भारत एक बिकाऊ और गया गुज़रा देश है, ये सच है"

  1. रजनीश मंगला मुझे काफी समय से रोचक व्यक्तित्व लगते रहे हैं।

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  2. Ma to Ma he, keysi bhi hoo,jo usey geigujari yaa fir ghatiyaa Khahey ghaa us aadmi kaa charitar….? aap jany…
    kahawat he jo ma kaa nahi ho sakaa woo kisi kaa nahi

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  3. भारत जैसे देश जिसका लम्बा अतीत होता है एक साथ कई शताब्दियों में जीते है। कोई भाग अठहरवीं सदी में जीता है, कोई चौदहवीं में तो कोई बाइसवीं सदी में। अजीब तरह का कोलाज होता है पुरानी संस्कृति वाला देश। भारत भी ऐसा ही एक देश है। तमाम कमियां हैं तो तमाम खूबियां भी हैं यहां। अगर यह खराब है तो इसे अच्छा कौन बनायेगा? हम और आप ही न! 🙂

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  4. Just compare India with many other countries especially our neighboring countries and you would instantly feel the difference.An eternal value system [sanatan dharm !]is still a driving force for us.
    Such frustrated utterances are not new and would not cause any harm .Let us not give much attention to such remarks.

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  5. तार्किक आधार पर सही होने के बाद भी मै यही कहना चाहूंगा कि ” घर में लाख बुराईयां, कमियां ही सही पर आप अपने ही घर को “घटिया” कैसे कह सकते हैं”।

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  6. संजय जी
    आप मुझे समझ पाये, ये मेरे लिये बहुत प्रसन्नता की बात है। भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा की वकालत करने का सबसे कारण (कारण नहीं बल्कि प्रेरणास्त्रोत) है मेरा जर्मनी में रहना। अगर मैं जर्मनी की जगह अमरीका, इंगलैंड वगैरह चला जाता तो शायद ये सब महसूस नहीं कर पाता। यहाँ रह कर मैं लगातार महसूस कर रहा हूँ कि अंग्रेज़ी के बिना भी समाज उतना ही उन्नत, विकसित, शिक्षित, व्यवस्थित बन सकता है। शायद अंग्रेज़ी देशों से अच्छा भी। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि हज़ारों इंगलैंड और अमरीकी नागरिक बीस बीस बरसों से यहाँ रह रहे हैं, मेरे शहर में, खुशहाल। सैंकड़ों को तो मैं जानता हूँ। अपनी भाषा से शिक्षा के साथ साथ वैचारिक उन्नति भी होती है जो हमारे देश लगभग अनुपस्थित है। हमारे देश में शिक्षा का उद्देश्य केवल अच्छी नौकरी है, भले ही वो विदेशी कंपनी की ही क्यों न हो जो गिने चुने लोगों को अच्छी तनख्वाह देकर हमारे बाज़ार में पूरी पूँजी के घुस जाते हैं और हमें खा जाते हैं। जब विदेशी देशों / कंपनियों के साथ हमारे अंग्रेज़ी पढ़े लिखे लोग सौदे बाज़ी करते होंगे तो कहीं न कहीं ज़रूर उनके मन में ये inferiority complex भी होता होगा कि वे लोग तो ये सब हमसे बेहतर ही जानते हैं, तो वो ठीक ही कह रहे होंगे (अपने मनमोहन जी को ही ले लें, न्यूक्लियर डील के मामले में)। ये तो तय है कि जब तक सारी शर्तें, बारीकियाँ मातृभाषा में न हों हम उनमें छुपे हुये मतलब नहीं निकाल सकते। और हमारी हालत यह है कि एक आम आदमी न ये समझ सकता है कि दवाई की शीशी में जो कागज़ होता है, उसमें क्या लिखा है, बैंकों, शेयरों के कागज़ों में बारीक अक्षरों में पन्ने के पन्ने भरे होते हैं, उनमें क्या लिखा है। कृपया ध्यान रखें मैं एक आम आदमी की बात कर रहा हूँ, गिने चुने बहुत प्रतिभशाली लोगों की बात नहीं कर रहा। बल्कि मैं एक आम भारतीय के स्तर की एक आम जर्मन के स्तर के साथ तुलना कर रहा हूँ।

    बेनाम अंकल जी
    हो सकता है आपका चरित्र मुझसे कहीं ऊँचा हो, आप साबित कर दें मैं माफ़ी माँग लूँगा। लेकिन बेनाम रहकर तो आप ये काम नहीं कर सकते। रही बात माँ की तो मेरा उत्तरः जो व्यक्ति अपनी बुरी माँ के बारे में स्वीकार नहीं कर सकता कि वो बुरी है, वो उसे अच्छा बनाने में भी कोई योगदान नहीं दे सकता। ये बात केवल माँ पर ही नहीं, खुद पर भी लागू होती है। अगर आप अपनी कमियाँ नहीं स्वीकारेंगे, आप उन्हें सुधारेंगे भी नहीं।

    अरविन्द मिश्रा जी
    आप इतनी तटस्थ टिप्पणी देकर कहाँ योगदान देना चाहते हैं? वैसे मुझे ये कतई पसंद नहीं कि हमें कोई हमारा ही सांस्कृति का होकर, हमारी ही सांस्कृति के बारे में अंग्रेज़ी में समझाये।

    त्रिपाठी जी, आपकी बात का उत्तर भी बेनाम जी को दिये उत्तर में शामिल है।

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  7. घटिया या बढ़िया है तो हमारा ही । जहाँ कमियाँ हैं कम उन्हें दूर करने का यत्न करेंगे । वैसे भारत में भाषा का मुद्दा उतना सरल नहीं है जैसा सब सोचते हैं । हर राज्य यूरोप के एक देश के समान है । कितने धर्म हैं , कितने प्रकार के रीति रिवाज हैं हम इन सबको साथ लेकर चल रहे हैं यह भी एक उपलब्धि ही कहलाएगी । बस हमें एक दूसरे को बराबर मानकर चलना है और जिस दिन यह हो गया तब शायद कोई भी हमें घटिया नहीं कह पाएगा । यह भी याद रहे कि कितने लम्बे समय हम पराधीन रहे । बहस से तो अच्छा होगा जब हम अपने भारत को ऐसा बना दें कि विदेश में बसे हमारे बन्धु घर लौटना चाहें ।
    घुघूती बासूती

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