हिन्दुत्व नहीं हिन्दूवादी संगठन संकट में हैः संत विजय कौशल

विजय कौशल महाराज उन विरले संतों में हैं जो स्वीकार करते हैं कि संत की समाज में पहुंच बढ़ी है लेकिन प्रभाव कम हुआ है. वे मानते हैं कि संभवतः संतों की तपस्या क्षीण पड़ गयी है जिसके कारण समाज पर उनसे ज्यादा सिनेमा के एक्टरों का प्रभाव हो गया है. वे पहले विरक्त थे फिर आरएसएस के माध्यम से सामाजिक काम में संलग्न हुए और 1989 से रामकथा गायन कर रहे हैं. रामकथा यात्रा, समाज, धर्म और उनके अपने लक्ष्यों के बारे में वृंदावन जाकर हमने उनसे विस्तृत बात की.

सवालः रामकथा यात्रा कब शुरू हुई?

जवाबः 1967 में यहीं वृंदावन में अपने गुरु से मैंने विरक्त दीक्षा ले ली थी. उसके बाद मैंने आगे की पढ़ाई की और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल हुआ. बाद में 1989 में संघकार्य से मुक्त होकर मैंने रामकथा गायन शुरू किया.

सवालः संघ से मुक्त क्यों हुए?

जवाबः मुझे हमेशा से धर्मकार्य के प्रति आकर्षण रहा है. संघ में जाने का प्रमुख कारण भी यही था कि धर्म के अधिष्ठान पर रहते हुए सामाजिक कार्य कर सकूंगा. लेकिन धीरे-धीरे मुझे आभास हो गया कि संघ वह मंच नहीं है जहां रहकर मैं सामाजिक काम का वह स्वरूप साकार कर सकूं जिसकी कल्पना के साथ मैं यहां आया था. मेरा मानना है कि अगर सामाजिक काम आप सेवा के लिए करते हैं तो वह धर्मकार्य है लेकिन अगर उसके बदले में आप कुछ पाने की उम्मीद करते हैं तो वह व्यवसाय है. संघ में काम करते हुए मुझे लगा कि हम जो काम कर रहे हैं उसके पीछे सेवा का भाव कम है बल्कि उसके माध्यम से हम कुछ और ही लक्ष्य पाना चाहते हैं.

सवालः क्या ऐसा विदेशी संस्थाओं के प्रभाव के कारण है?

जवाबः मैं ऐसा नहीं मानता. सेवा के क्षेत्र में आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सबसे बड़ा संगठन है. लेकिन मूल में उसकी प्रेरणा क्या है? वह ईसाई मिशनरियों की प्रतिक्रिया स्वरूप खड़ा हुआ ढांचा है. सवाल है अगर कल को ईसाई मिशनरियां देश छोड़कर चली जाती हैं तो हम सेवा का काम छोड़ देंगे? इसलिए मैं विदेशी संस्थाओं के प्रभाव को बहुत जिम्मेदार नहीं मानता. मूल में हमारी प्रेरणा ठीक हो तो कोई समस्या नहीं है.
सवालः क्या भारत में सेवा की कोई परिपाटी नहीं रही है जिसके कारण हमें इस तरह की समस्या का सामना करना पड़ रहा है?

जवाबः भारत में सेवा की परंपरा हमेशा से रही है.

सवालः फिर वह कहां अवरूद्ध हुआ?

जवाबः महाभारत के युद्ध के बाद वह धारा टूट गयी. केवल सेवा कार्य ही नहीं बल्कि ज्ञान-विज्ञान, तकनीकि, जीवनदर्शन हर क्षेत्र में भारत की समृद्ध परंपरा में महाभारत के युद्ध के बाद अवरोध आ गया. युद्ध के कारण जो अवरोध आया उसका असर आज तक दिखाई देता है. फिर भारतीय समाज उस ताकत से अपने पैरों पर कभी खड़ा नहीं हो पाया. थोड़ी-बहुत कोशिश जरूर हुई है लेकिन उसमें भी बाहरी आक्रमणकारियों का जबर्दस्त व्यवधान आता रहा है.
सवालः आपका आशय मुसलिम आक्रमणकारी और अंग्रेजों से है?
जवाबः जी हां. लेकिन यहां एक बात ध्यान देने की है कि इन आक्रमणकारियों के कारण भारतीय समाज को बहुत नुकसान हुआ हो ऐसा मानना भी ठीक नहीं होगा. जब इन लोगों के आक्रमण हुए उसके पहले ही भारत का गौरव अतीत का हिस्सा हो चुका था. इन आक्रमणों की दुष्परिणाम यह हुआ कि भारतीय समाज अपने-आप को पुनर्नियोजित नहीं कर सका. पौधा पनप नहीं पाया और उसके पहले ही उस पर आघात होने लगा जो आज तक चल रहा है.
सवालः धार्मिक आयोजनों की बाढ़ साफ दिख रही है. फिर भी जीवनस्तर में लगातार गिरावट क्यों है?

जवाबः जब चिकित्सालय ज्यादा बनने लगें तो समझना चाहिए कि रोग बढ़ रहे हैं. मनुष्य शरीर और मन दोनों ही स्तरों पर रोगी होता जा रहा है. शरीर के रोग का इलाज तो अस्पतालों के पास है लेकिन मन के रोगों का उनके पास कोई इलाज नहीं है? काम, क्रोध, मद, लोभ, ईर्ष्या जैसे मानसिक रोगों से मुक्ति पानी हो तो धार्मिक जीवन जीने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है. आज जीवन की जो आपाधापी है वह पूरे समाज को मानसिक रोगी बना रहा है. इसलिए धर्मतंत्र का विस्तार भी उसी मात्रा में हो रहा है. लेकिन हो सकता है यह धर्मतंत्र उन समास्याओं के समाधान में अपने आप को सक्षम अनुभव न कर रहा हो. यह भी हो सकता है कि हम धर्माचार्य अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप व्यवहार न कर पा रहे हों. इसलिए आलोचना भी होती है.

सवालः क्या धर्माचार्य इस विषय पर कभी विचार नहीं करते?

जवाबः हमारे कुंभ के आयोजनों का मुख्य लक्ष्य यही था. समाज एक सतत प्रवाहित धारा है. इस प्रवाह में कुछ कूड़ा-करकट आ जाना बहुत स्वाभाविक है. इसकी सफाई के लिए ही कुंभ का आयोजन होता है. यहां समाज के लोग भी होते हैं और संत समाज भी होता है. दोनों मिल-बैठकर विचार करते हैं. बारह वर्षों में समाज में आये परिवर्तन को धर्मसंसद सुनती थी. इसमें चारों शंकराचार्य और अनेक पंथ और संप्रदायों के आचार्य एक साथ बैठते थे. इस धर्मसंसद में कालबाह्य हो चुके रीति-रिवाज और कर्मकाण्डों में आवश्यक संशोधन करते थे. नये नियम बनते थे. फिर अगले बाहर वर्षों के दौरान हर तीसरे साल अलग-अलग जगहों पर आयोजित होनेवाले कुंभ मेलों में उनकी समीक्षा होती थी. इस तरह पूरी सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं पर मंथन होता था और उसमें से जो नवनीत निकलता था उसे समाज में साधु-संतो के माध्यम से वितरित किया जाता था. लेकिन वह कड़ी टूट गयी और कुंभ आम आदमी के लिए आस्था का विषय बन गया और संतों के लिए अपने वैभव प्रदर्शन का एक माध्यम बन गया है.
सवालः समाज में आ रहे क्षरण का शिकार हमारी धर्मसत्ता भी हुई है?

जवाबः नहीं. धर्मसत्ता में क्षरण हुआ है इसलिए समाज में कमजोरियां दिख रही हैं.

सवालः धर्मसंसद तो आज भी कुंभ में होता है?

जवाबः विश्व हिन्दू परिषद हर कुंभ में धर्मसंसद का आयोजन करती है लेकिन वह धर्मसंसद नहीं है. वह एक संस्था का अपने निर्धारित कार्यों की समीक्षा और आगे की कार्ययोजना है. इसे हम उस धर्मसंसद का स्थान नहीं दे सकते जिसकी चर्चा हमने अभी की है. अब विहिप वाले इसे धर्मसंसद कहते हैं लेकिन इसे हम समाज की नहीं बल्कि एक संस्था की धर्मसंसद ही मानते हैं.
सवालः मूल प्रेरणा कुंभ की धर्मसंसद परंपरा से निकली है?
जवाबः हो सकता है. और यह अच्छी बात है कि विहिप वाले अपनी धर्मसंसद का आयोजन कुंभ में ही करते हैं. इससे साधु-संतो का आशिर्वाद भी उन्हें मिलता है. अब यह बात दूसरी है कि वे साधु-संतों की बात कितना सुनते है.

सवालः धर्म संसद भंग हुई तो क्या समाज में धर्म का स्रोत भी कमजोर हो गया है?
जवाबः धर्म का अर्थ केवल कर्मकाण्ड और पूजा नहीं है. जीवन के सम्पूर्ण आदर्शों के समुच्चय का नाम धर्म है. और जीवन का सम्पूर्ण आदर्श एकसाथ कहीं दिखता है तो वह है भगवान श्रीराम का चरित्र. इसलिए रामकथा का लक्ष्य है मानवमात्र के कल्याण के उपाय की बात करना. लेकिन यह बात सही है कि हमारे घरों से धर्म का दीपक बुझ गया है. इसका कारण है कि धर्माचार्यों की त्याग-तपस्या में कमी आयी है और समाज पर उनका प्रभाव कम हुआ है.

सवालः समाज पर बाजार का प्रभाव बढ़ गया है और नकली आदर्शों की भरमार है. ऐसे में रामचरित्र को स्थापित करना कितना मुश्किल है?

जवाबः हमारा जैसा आदर्श होता है वैसा ही हमारा चरित्र बनता है और हम वैसा ही जीवन जीने लगते हैं. आजकल सिनेमा का प्रभाव बढ़ा हुआ है इसलिए हमारे केश,वेष और भोजन पर बाजार का प्रभाव साफ दिखता है. यह संकट तो है. लेकिन इस जीवन में शांति नहीं है. जैसे शरीर का भोजन अन्न है वैसे ही आत्मा का भोजन भजन है. सिनेमा से शांति मिलती तो सबसे ज्यादा शांति उन एक्टरों के घर में रहती जो सिनेमा बनाते हैं. लेकिन ऐसा है नहीं. साफ है राम का चरित्र ही हमें रास्ता दिखा सकता है क्योंकि वह संम्पूर्ण है. मैंने भी रामकथा इसलिए ली क्योंकि समाज में राम की स्थापना आज की जरूरत है.

सवालः क्या इसी जरूरत का परिणाम है कि रामकथा का व्यवसायिक रूप भी दिखाई दे रहा है?
जवाबः जब रोग बढ़ता है तो चिकित्सालय भी उसी मात्रा में बढ़ जाते हैं. धार्मिक आयोजनों की बाढ़ यह बता रहा है समाज में धर्म की जरूरत बहुत बढ़ गयी है. ऐसे में कुछ ऐसे लोग भी आ ही जाते हैं जो इसमें व्यवसाय का पुट जोड़ देते हैं. लेकिन केवल इतना कह देना पर्याप्त नहीं होगा. आप भारत का इतिहास उठाकर देखें भारत में जितने भी संत हुए हैं वे सब गृहस्थ थे. यानी पौरोहित्य कर्म उनके जीविकोपार्जन का हिस्सा था. समाज उनके भरण-पोषण की व्यवस्था करता था. लेकिन एक बात मैं जरूर कहना चाहूंगा कि जो रामकथा के माध्यम से अर्थोपार्जन करना चाहते हैं वह निंदनीय है. उनकी वाणी का कभी अच्छा परिणाम नहीं आयेगा. देखिए हम केवल रामकथा की चिंता करते हैं तो हमारा समाज इतना संवेदनशील है कि वह हमारी चिंता करता है.

सवालः कथा वाचक जिस चरित्र को आधार बनाकर कथा करते हैं, इस व्यवसायिक दृष्टिकोण से उस चरित्र की पवित्रता पर कितना फर्क पड़ता है?
उत्तरः फर्क तो पड़ता है. आप देखिए इतनी रामकथाओं, धार्मिक आयोजनों की भरमार है लेकिन क्या परिणाम उस मात्रा में आ रहे हैं जिस मात्रा में मिलने चाहिए? इसका मतलब है कि संत की वाणी में प्रभाव नहीं है इसलिए धार्मिक आयोजन महज दिखावा बनते जा रहे हैं. मैं यह अनुभव करता हूं कि धर्माचार्यों को अपनी तपस्या में वृद्धि करने की जरूरत है.
सवालः धर्माचार्य के रूप में आप अपनी क्या भूमिका देखते हैं?

जवाबः मेरी आंतरिक इच्छा यही है कि मैं स्वयं कथा बनूं. कथा को जियूं और जो भी हमारे संपर्क में आये वह स्वयं कथा बने. इसी इच्छा के साथ मैं देशभर में जा रहा हूं.
सवालः राजनीतिक तौर पर अब यह मुद्दा बन गया है कि देश में हिन्दुओं के स्वाभिमान के ऊपर लगातार हमला हो रहा है. एक धर्माचार्य के रूप में आप क्या कहते हैं?
जवाबः हिन्दुत्व पर कोई संकट नहीं है. संकट है तो संस्थाओं, संस्थाओं के स्वरूप और राजनीतिक दलों पर है क्योंकि उनकी संस्थाएं बिखर रही हैं हिन्दुओं के नाम पर राजनीति करनेवाले दलों के वोटर टूट रहे हैं. रावण, कंस के समय में हिन्दुओं पर जो संकट था उसके मुकाबले आज हिन्दुओं पर क्या संकट है? कुछ खास नहीं. लेकिन कुछ संस्थाएं और राजनीतिक दल इसे बढ़ाचढ़ा कर इसलिए प्रस्तुत करते हैं कि इससे उनका स्वार्थ सधता है. बीमारी है, महामारी नहीं है. सावधान रहने की जरूरत है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप बीमारी को इतना बढ़ा-चढ़ा कर बता दें कि रोगी घबराकर ही मर जाए.
सवालः हिन्दुओं के बारे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दृष्टिकोण पर आप क्या कहते हैं?
जवाबः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना का मूल उद्येश्य हिन्दुओं के लिए किये जानेवाले कार्य का पोषण, संरक्षण और संवर्धन था. वह इस दिशा में आगे भी बढ़ा. लेकिन अब यह दिखता है कि संघ का मूल उद्येश्य सत्ता प्राप्ति ही रह गयी है. उनकी रूचि ज्यादा राजनीतिक है. मैं भी यह मानता हूं कि राजनीति में अच्छे लोग जाएं क्योंकि आखिरकार राजनीति का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है. लेकिन मुझे लगता है कि संघ अभी यह तय नहीं कर पा रहा है कि वह जिन लोगों का साथ दे रहा है क्या वे धार्मिक हैं?

सवालः आपका संकेत भाजपा की तरफ है?

जवाबः मेरा कहना सिर्फ इतना है कि अगर संघ भारतीय जनता पार्टी को धार्मिक मानता है तो फिर धर्म की परिभाषा पर ही फिर से विचार करना होगा. संघ की इस सोच से मैं कतई सहमत नहीं हूं कि केवल भाजपा ही एकमात्र विकल्प है जो देश को यश-वैभव के शिखर पर ले जा सकती है. संघ को इस पर पुनर्विचार करना होगा कि वे कौन लोग हैं जिनको समर्थन देने से देश में चरित्र और नैतिकता से पूर्ण शासन की स्थापना हो सकती है.

सवालः क्या आप मानते हैं कि संघ को दलीय राजनीति से अपने आप को मुक्त कर लेना चाहिए?
जवाबः मैं तो सिर्फ यह कहता हूं कि संघ इसलिए सेवा का कार्य न करे कि उससे उसे एक राजनीतिक शक्ति का निर्माण करना है. वे इसलिए विद्यालय न चलाएं कि उससे एक राजनीकतिक शक्ति खड़ी होगी. मेरा मानना है कि अगर ऐसा होता है तो उद्येश्य दूषित हो गये.

सवालः राजनीतिक रूप से देखें तो भाजपा से हाल में ऐसे लोग अलग हुए हैं जो संघ के प्रतिनिधि माने जाते थे और हिन्दुत्व की राजनीतिक के पर्याय समझे जाते थे. लेकिन गोविन्दाचार्य और उमा भारती जैसे लोग अलग होते गये और संघ कुछ नहीं बोला. आप क्या कहते हैं?

जवाबः मैं भी संघ से अलग हुआ था. लेकिन वापस आते समय मैंने कह दिया था जिस कल्पना के साथ मैं यहां आया था उस दिशा में तो यहां काम ही नहीं हो रहा है. मुझे लगा था कि जिस मार्ग पर संघ चल रहा है इससे तो यह देश कभी शिखर पर नहीं पहुंचेगा. इसलिए मैं जा रहा हूं. मुझे लगता है इन नेताओं को भी पहले यही रास्ता अपनाना चाहिए था. जैसे मैंने अपना अलग रास्ता बना लिया वैसे ही इनको भी विकास और हिन्दुत्व का एक ब्लू-प्रिटं पूरे देश के सामने रखना चाहिए था. अगर इनकी बात में दम होता तो देश इनके साथ आ खड़ा होता. ऐसा तो कुछ इन्होंने अब तक किया नहीं है. फिर आंतरिक स्तर पर और क्या बाते हैं ये तो वही लोग जानें. लेकिन एक बात तो माननी ही पड़ेगी कि परिवार बड़ा हो जाए तो सबको सह-सुनकर रहना चाहिए तभी परिवार चलता है.
सवालः किसी परिवार में अलग-विलग होने की प्रक्रिया बहुत बढ़ जाए तो क्या इस बात की जरूरत नहीं होती कि परिवार का मुखिया भी अपनी कार्यपद्धति के बारे में पुनर्विचार करे?

जवाबः जरूर. यह बात ठीक है. लेकिन मुझे लगता है कि अब परिवार बड़ा हो गया है और यहां एक मुखिया की जगह सभी अपने आप को मुखिया मानने लगे हैं. तो समस्या यह है कि कौन किसको समझाए?

सवालः आपने तय किया है कि दिल्ली और आस-पास के परिक्षेत्र में आपने 100 कथाओं का लक्ष्य निर्धारित किया है. इसके पीछे कोई खास मकसद?

जवाबः बड़ी कथाएं तो मैं करता ही हूं लेकिन मैंने अनुभव किया है कि बड़ी कथाओं में वे लोग नहीं आते जिनको कथा की सबसे ज्यादा जरूरत है. इसलि मैंने तय किया दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों में मैं छोटी-छोटी कथा करूंगा जिससे वे लोग भी कथा में आ सके. यह पूरी तीन साल की योजना है. इसमें लक्ष्य यह है कि कथा के माध्यम से संस्कार उन घरों तक पहुंचाया जाए जहां पैसे का सबसे अधिक दुष्प्रभाव है. ये लोग जो करते हैं वही समाज में नीचे तक जाता है. अगर इन घरों में यज्ञ हो, सामूहिक भोजन और पारिवारिक संस्कार हो तथा भजन हो तो इसका असर समाज में नीचे तक पहुंचेगा. इसी उद्येश्य से मैंने दिल्ली और आस-पास 100 कथा करने का निश्चय किया है. अभी तक के परिणामों से मैं बहुत संतुष्ट हूं. मुझे विश्वास है कि जल्द ही दिल्ली केवल राजनीतिक राजधानी नहीं बल्कि देश की धार्मिक राजधानी भी होगी.

One thought on “हिन्दुत्व नहीं हिन्दूवादी संगठन संकट में हैः संत विजय कौशल

  1. महाराज श्री को कोटी कोटी प्रणाम,संघ पर दोषारोपण करना एक फैशन बन गया है महाराज श्री को कोटी कोटी प्रणाम,श्रीमान यदि संघ हिंदुत्व के लिये काम नहीं कर रहा तो कृपया बताएं की कौन कर रहा है और कितना कर रहा है ,और कर रहा है तो वह निश्चित ही साधुवाद का पात्र है,श्रीमन् हो सकता है आप को संघ का काम करने का तरीका अच्छा न लगा हो और इसमें कुछ भी अलग नहीं क्यों कि प्रत्येक संगठन का काम करने का अलग तरीका हो सकता है,आप राम कथा के माध्यम से हिंदुत्व को बढाना चाहते हैं स्वागत योग्य है,पर राम कथाओं की आवश्यकता दिल्ली के आस पास नहीं बल्कि सुदूर उत्तर पूर्व में है जहां ईसाई मिशनरी भोले भाले लोगों को पहले धर्म से और फिर देश से काटने में लगे हुए हैं,गुजरात के डांग में जहां 80 प्रतिशत आबादी हिंदु धर्म छोङ चुकी थी,या अंडमान निकोबार जैसे सुदूर द्वीपों में है,अन्यान्य आदिवासी क्षैत्रों में जहां धर्म परिवर्तन अगाध गति से हो रहा है वहां है,वहां जाकर देखिए कैसे संघ के कार्यकर्ता वनवासी कल्याण आश्रम और सेवा भारती के माध्यम से अपनी जान पर खेलकर इस देश को और धर्म को बचाने में लगे है.आज के चार वर्ष पूर्व चार मराठी कार्यकर्ताओं की उत्तर पूर्व के सुदूर ईलाकों में अपहरण के बाद हत्या कर दी गई थी वे सभी संघ की प्रेरणा से ही वहां सर्वस्व छोङ कर गये थे.
    हिंदु के नाम पर वने कितने संगठन कार्य करते हैं इस देश में.
    राम कथाऔं के माध्यम से आप हिंदु समाज को जागृत करने का आपका प्रयास निश्चित ही सराहनीय है .पर संघ पर अंगुली उठाने की बजाय क्यों न सभी मिलकर इस समाज को जागृत करें की हर कोई गर्व से बोले की हां में हिंदु हू.

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