रजनीश मंगला कहते हैं कि…

संजय जीआप मुझे समझ पाये, ये मेरे लिये बहुत प्रसन्नता की बात है। भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा की वकालत करने का सबसे कारण (कारण नहीं बल्कि प्रेरणास्त्रोत) है मेरा जर्मनी में रहना। अगर मैं जर्मनी की जगह अमरीका, इंगलैंड वगैरह चला जाता तो शायद ये सब महसूस नहीं कर पाता। यहाँ रह कर मैं लगातार महसूस कर रहा हूँ कि अंग्रेज़ी के बिना भी समाज उतना ही उन्नत, विकसित, शिक्षित, व्यवस्थित बन सकता है। शायद अंग्रेज़ी देशों से अच्छा भी। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि हज़ारों इंगलैंड और अमरीकी नागरिक बीस बीस बरसों से यहाँ रह रहे हैं, मेरे शहर में, खुशहाल। सैंकड़ों को तो मैं जानता हूँ। अपनी भाषा से शिक्षा के साथ साथ वैचारिक उन्नति भी होती है जो हमारे देश लगभग अनुपस्थित है।

हमारे देश में शिक्षा का उद्देश्य केवल अच्छी नौकरी है, भले ही वो विदेशी कंपनी की ही क्यों न हो जो गिने चुने लोगों को अच्छी तनख्वाह देकर हमारे बाज़ार में पूरी पूँजी के घुस जाते हैं और हमें खा जाते हैं। जब विदेशी देशों / कंपनियों के साथ हमारे अंग्रेज़ी पढ़े लिखे लोग सौदे बाज़ी करते होंगे तो कहीं न कहीं ज़रूर उनके मन में ये inferiority complex भी होता होगा कि वे लोग तो ये सब हमसे बेहतर ही जानते हैं, तो वो ठीक ही कह रहे होंगे (अपने मनमोहन जी को ही ले लें, न्यूक्लियर डील के मामले में)। ये तो तय है कि जब तक सारी शर्तें, बारीकियाँ मातृभाषा में न हों हम उनमें छुपे हुये मतलब नहीं निकाल सकते। और हमारी हालत यह है कि एक आम आदमी न ये समझ सकता है कि दवाई की शीशी में जो कागज़ होता है, उसमें क्या लिखा है, बैंकों, शेयरों के कागज़ों में बारीक अक्षरों में पन्ने के पन्ने भरे होते हैं, उनमें क्या लिखा है। कृपया ध्यान रखें मैं एक आम आदमी की बात कर रहा हूँ, गिने चुने बहुत प्रतिभशाली लोगों की बात नहीं कर रहा। बल्कि मैं एक आम भारतीय के स्तर की एक आम जर्मन के स्तर के साथ तुलना कर रहा हूँ।

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