जब आप बोलते हैं

पता नहीं इस बात से कितने लोग सहमत होंगे कि वे दया के पात्र हैं जो अंग्रेजी में शिक्षा पाते हैं. मैं उनको दीन-हीन ही मानता हूं और सोचता हूं कि ऐसे लोगों के साथ हम सबको सहानुभूति रखनी चाहिए जो अपनी मातृभाषा में शिक्षा नहीं पाते. हमारी सरकारें और अन्य संस्थाएं ऐसे लोगों को उनकी भाषा में शिक्षा न देकर उनका मानसिक शोषण करती हैं. यह एक किस्म का मानवाधिकार हनन है. संतति में जो भाषा मुझे मिली है अगर उसमें मुझे शिक्षा न मिले तो बताईये भला मैं क्या कर सकता हूं?

देवदत्त जी बुजुर्ग हो चुके हैं. संभवतः 75 पार हैं. अंग्रेजी माध्यम से पढ़े लिखे हैं. जेएनयू जब विश्वविद्यालय नहीं था तब वे वहां विद्यार्थी रह चुके हैं. बाद में घुमंतू अध्यापन भी किया. पत्रकारिता करते हैं. इस उम्र में भी रिपोर्टिंग करते हैं और एक छुट्टा पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं. मूलतः पंजाब के हैं. उनका घर बहुत आधुनिक है. पूरा घर इक्कीसवीं सदी के अजूबों से भरा है लेकिन उनके कमरे में घुसते ही आप चौंक सकते हैं. कोई ताम-झाम नहीं. एक तख्त, हाथ का बना बिछावन, हाथ से भरी गयी रूई वाली तकिया. पूरा कमरा गांव के किसी कमरे की तरह है. वहां आधुनिकता का कोई आक्रमण नहीं है. सच बताऊं तो उनके कमरे में बहुत सुकून मिलता है. वेष-भूषा, रहन-सहन से वे ठेंठ भारतीय हैं. बस एक कमी है. वे लिखना-पढ़ना अंग्रेजी में करते हैं. अंग्रेजी भी ऐसी कि सामान्य समझ से काम नहीं चलेगा. इस अंग्रेजी ज्ञान को मैं कमी क्यों कह रहा हूं इसका कारण है.

एक दिन देवदत्त जी कहने लगे कभी-कभी मैं तरस जाता हूं कि मुझसे कोई पंजाबी में बात करे. मैं चौंका. क्या किसी भाषा विशेष में बात करने से भी आत्म संतोष मिलता है क्या जो देवदत्त जी ऐसा कह रहे हैं. लेकिन मैंने अनुभव किया है कि जब कभी वे पंजाबी में बात करते हैं उनकी आत्मा संवाद करती है. जब वे अंग्रेजी में बात करते हैं तो लगता है वे बुद्धि की बात कर रहे हैं. लंबे समय से आदत छूट जाने के बाद भी पंजाबी में बात करते समय वे जितना सहज होते हैं, अंग्रेजी में उतना सहज मैंने उनको कभी नहीं देखा. अब मुझे लगता है कि बात ठीक ही है. भाषा केवल सीखने भर का विषय नहीं होती. यह हमारी स्मृति और संतति से जुड़ी होती है.

हम जो बोलते हैं उसका एक क्रम होता है. आमतौर पर यह धारणा है कि हम सोचते हैं और बोल देते हैं. लेकिन बात शायद इतनी ही नहीं है. हमारा सोचने के पीछे भी कड़िया हैं जो हमारी भाषा से जुड़ी होती हैं. सोचने के पहले की स्थिति है प्रेरणा. हम बोलने के लिए प्रेरित होते हैं. इसके भी पहले की अवस्था यह है कि हमें प्रेरित कौन कर रहा है? और वह जो हमें प्रेरित कर रहा है उसका हमारी स्मृति से गहरा संबंध होता है. यह क्रम शताब्दियों में बनता है जो आनुवांशिक रूप से हमें प्राप्त होता है. हम जो बोलते हैं वह केवल हम नहीं बोलते, हमारी पूरा परिवार, खानदान, समाज, देश, काल, परिवेश सब कुछ बोल रहा होता है. आपकी वाणी सिर्फ प्रतिनिधित्व करती है. लेकिन आप इसमें फर्क ला सकते हैं. यह आपका स्वतंत्र विषय है, आप जैसे चाहे वैसे इसके साथ व्यवहार करें. हम चाहें तो अपने बोलने मात्र से अपने पूरे जीवन की दिशा परिवर्तित कर सकते हैं. अपने शब्दों की समझ से अपनी पूरी जिन्दगी को तबाह या आबाद कर सकते हैं.

इसलिए मैं तो उन्हें बेचारा ही मानता हूं जो अंग्रेजी में शिक्षित हो गये. वे बेचारे तो एक समृद्ध विज्ञान से पूरी तरह अपरिचित रह गये. हो सकता है आनेवाली दस नस्लों में अंग्रेजी उनकी स्मृति बन जाए लेकिन दस नस्लों को तो कष्ट भुगतना ही पड़ेगा. फिर वर्णमाला और शब्दों की भी बात है. देवनागरी लिपी की जितनी भाषाएं हैं उनके शब्दों का समृद्ध विज्ञान है. हर शब्द का मन पर प्रभाव होता है. अगर प्रदूषित शब्द या अपभ्रंश ज्यादा होंगे तो आपको तनाव होगा, क्रोध आयेगा, मन खंडित होगा. आप क बोलते हैं तो आप अपने प्राणों को एक आयाम देते हैं. आप “का” बोलते हैं तो अपने प्राणों को अलग आयाम देते हैं. और केवल बोलना तो प्रकटीकरण है. इसके बहुत पहले एक फिल्म की भांति आपके स्मृति पटल पर वे शब्द गुजर जाते हैं. अब इस गुजरने की प्रक्रिया का भी हमारे ऊपर प्रभाव होता है. हमारे मानस पटल से कैसे शब्द गुजर रहे हैं उनका भी हमारे जीवन पर प्रभाव होता है. संस्कृत से बनी भाषाओं के बारे में यह बात सटीक है. और के बारे में हम नहीं जानते.

क्या कहता है भारत का भाषा विज्ञान
।। आत्माबुध्या समेत्यार्थान मनोयुक्ते विवक्षया, मनः कायाग्नि आहंतिं स प्रेरयति मारूतम्, मारूतस्तुरेचिरण मंत्रम् जनयति स्वरम् ।।

आत्मा बुद्धि से अर्थों का समन्वय करके उसको बोलने के संकल्प से मन को नियुक्त करता है. वह मन फिर नाभीमण्डल से अग्नि को धक्का देता है. फिर वह अग्नि प्राणवायु को धक्का देकर शब्द की रचना करते हैं.

6 thoughts on “जब आप बोलते हैं

  1. सही कहा है आपने, अपनी भाषा में बात करने का आनंद ही कुछ और होता है.. इसी बात से संबंधित एक छोटा सा लेख मैंने बहुत पहले लिखा था उस पर भी नजर डाल लें.. पता है : http://prashant7aug.blogspot.com/2007/08/blog-post_22.html

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  2. सही है लेकिन जब तक कोई ठोस परिवर्तन नही होता तब तक हम नई पीड़ी को अपनी भाषा से प्यार करना ही सिखाते है….अपना भारत अनेक भाषाओं का धनी देश है इसलिए विदेशों में कम से कम अपनी मातृभाषा और राष्ट्र भाषा बोलने को ज़रूर कहते रहते हैं.

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  3. सबसे पहले तो आप को ये बता दें कि टिप्पणी करने से पहले पूरा पढ़ लिया है, क्या कोई बिना पढ़े भी टिपियाता है?
    आप की बात 99%सही है बस एक ही बात ख्टक रही है जो आप ने देवदत्त जी के उदारहण के रूप में कही कि उनको मन में टीस उठती है कि कोई पंजाबी में बात करे, उनकी मातृ भाषा शायद पंजाबी है। मेरी भी मातृ भाषा पंजाबी है पर मै पंजाबी नहीं बोल सकती, सिर्फ़ समझ सकती हूं , कभी मन में नहीं आया कि कोई हम से पंजाबी में बोले हां हिन्दी हमें अपनी मातृ भाषा लगती है और वो हम बोलते पढ़ते हैं, इसका मतलब ये नही कि मै आप से सहम्त नहीं सिर्फ़ आप जो कह रहे है उस में कुछ जोड़ रही हूं

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  4. पोस्ट कल पढ़ी थी.टिप्पणी आज कर रहा हूँ.

    हिन्दी के बारे में आपने जो कहा वो सही जान पड़ता है. इसका कुछ वैज्ञानिक आधार हो सकता है. लेकिन मेरे बढ़े होने से दूसरा छोटा हो जाये यह कतई ठीक नहीं. हो सकता है दूसरी भाषाऎं भी किसी वैज्ञानिक आधार पर बनी हों. मैं केवल अंग्रेजी की ही बात नहीं कर रहा.ऎसे हर आदमी अपनी मातृभाषा के अलावा दूसरी भाषा में बोलने वाले पर बेचारगी के भाव रखे यह सही नहीं. आज मैने अपनी पोस्ट में हिन्दी व अंग्रेजी पर अपने विचार रखे हैं.

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  5. मैं अनिता जी की बातों से बिलकुल सहमत हूं.. जैसे कहने को तो मेरी मातृभाषा मैथिली है पर मैं हिंदी को ही अपनी मातृभाषा मानता हूं।

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