गांधीमार्ग को एक पत्र

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप किसी पत्रिका को चिट्ठी लिखें और उस चिट्ठी को पढ़कर लोग आपको चिट्ठी लिखे? आठ-नौ सालों से अन्य कामों के साथ-साथ थोड़ा लिखता-पढ़ता भी हूं. लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि मेरे लेख नहीं बल्कि मेरे पत्र को पढ़कर किसी ने मुझे पत्र लिखा है. मुझे नहीं लगता कि यह मेरे पत्र की खासियत थी. यह उस पत्रिका का कद है जिसके पत्र भी संजीदगी से पढ़े जाते हैं. मैंने गांधीमार्ग में जो चिट्ठी लिखी थी वह भी कहीं न कहीं इसी विषय को छूता है. मुझे जिन सज्जन ने पत्र लिखा है वे कानपुर देहात में रहते हैं और एक डिग्री कालेज में भूगोल के प्रोफेसर हैं. उन्होंने मुझे आशिर्वाद दिया है कि मैं जो भी काम कर रहा हूं उसमें सफल होने के लिए असीम शक्ति दे. मैं उनका आभारी हूं.

गांधी मार्ग दिल्ली से निकलनेवाली एक द्वैमासिक पत्रिका है. गांधी शांति प्रतिष्ठान उसका प्रकाशन करता है. और संपादन? बस यही मेरे पत्र का भी विषय है-

“छोटे से अल्प विराम के बाद गांधी मार्ग दोबारा दिखी तो झटपट सदस्य बन गया. ग्राहक नहीं कहूंगा क्योंकि मैं इतना सामर्थ्यवान नहीं हूं कि विचार खरीद सकूं. ऐसा कोई होगा तो मुझे मालूम नहीं. गांधी मार्ग तब भी मुझे आकर्षित करता था जब मैं दिल्ली आया था. कोई सात साल पहले. लेकिन तब का वह आकर्षण अब समर्पण बन गया है. यह समर्पण भाव किसी खास अखबार, पत्रिका या व्यक्ति के लिए नहीं है. यह उन सब कार्यों, व्यक्तियों के बारे में है जो विचारों की साधना कर रहे हैं. गांधी मार्ग समर्पण की इस परिधि से परे भला कैसे हो सकता है?

सदस्यता के बाद पहला अंक मिला तो उस अंक के लेखों ने उतना नहीं चौंकाया जितना इस बात ने कि संपादक अनुपम मिश्र के नाम के पहले संपादन लिखा है. सच बताऊं मेरा माथा ठनका. एक बार तो यह ख्याल भी आया कि क्या हमारी संस्थाएं इतनी अनुदार हो गयी हैं कि वे उदारतापूर्वक संपादक का शीर्षक भी नहीं दे सकतीं. ऐसा सोचने का कारण कई संस्थाओं द्वारा निकाली जा रही पत्रिकाएं हैं. संस्थाओं में, संस्थानों में उचित संपादक रखे नहीं जाते और किसी को भी संपादन का काम सौंप दिया जाता है. लिख दिया जाता है कि अंक संपादन का काम इन्होंने किया है. एक दिन संयोगवश गांधी शांति प्रतिष्ठान गया. मन में वह सवाल तो था ही. इसलिए सीधे संपादक से ही यह सवाल पूछ लिया. जो जवाब मिला वह मेरे माथे को दुरूस्त करने के लिए पर्याप्त था. अनुपम मिश्र ने कहाः यह मेरा ही निर्णय था कि संपादक की जगह संपादन ही जाना चाहिए. एक संपादक का मूल कर्म तो संपादन ही होता है.

न से क तक की यह दूरी भले ही एक अक्षर की हो लेकिन अंतराल विस्मयकारी है. हमारे अखबारों, पत्रिकाओं में संपादकों ने संपादन छोड़ा तो मालिकों ने संपादक को मैनेजर की भूमिका दे दी. ज्यादातर जगहों पर तो संपादक हटा ही दिये गये केवल मैनेजरों ही रख लिये गये. एक अक्षर के ह्रास ने संपादक को संस्था से हटाकर संचालक बना दिया. ऐसे में विचार अपना घोसला बनाए तो कहां बनाए? शायद यही कारण है कि विचारों की गौरेया यह घोसला छोड़ जंगल जा बसी है. अखबार, पत्रिकाएं, टीवी, इंटरनेट, रेडियो न जाने कितने माध्यमों का उपयोग कर सूचनाओं की न जाने कैसी-कैसी बमबारी हो रही है. उसमें क्या सही, क्या गलत, क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए. क्या कवर हो रहा है और क्या छूट रहा है इस विवेक का अभाव सभी जगह खटकता है. मुझे भी खटकता है, आपको भी खटकता ही होगा.

मुझे अब लगता है कि संपादक जब संपादन करता है तो वह उस बोध के वशीभूत रहता है जिसे विवेक कहते हैं. विवेक से परिवेश हमेशा सात्विक बनता है. या कहें वातावरण शुद्ध होता है. ऐसे में विचारों की गौरैया मजे से अपना घोसला बनाती है और संपादक के विवेकसम्मत निर्णय से सत्-असत् का भेद हो पाता है. शायद इसीलिए संपादक को पद से ज्यादा प्रतिष्ठान कहा गया है. लेकिन संपादन गया तो वह विवेक भी गया और आखिर में वह प्रतिष्ठान ही ध्वस्त हो गया.

लेकिन रूकिये मैं गांधी मार्ग की बात कर रहा था. और क से न का भेद गांधी मार्ग के संदर्भ में ही आया है. और जब तक गांधी मार्ग जैसी पत्रिकाएं जिन्दा हैं हम कैसे कह सकते हैं कि संपादक प्रतिष्ठान ही ध्वस्त हो गया? हम सब विलक्षण और अद्भुद भूमि के बेटे हैं. ये पोथी-पोथियों से नहीं सीखते. सीखने की बाद पोथियों की रचना करते हैं. यह स्मृतियों का देश है. शायद इसीलिए यहां कुछ भी लुप्त नहीं होता. जो कुछ अभाव हमें खटक रहा है इसका अर्थ यह नहीं कि वह लुप्त हो गया है. वह सिर्फ गुप्त हुआ है. प्रकृति और परमात्मा की इच्छानुसार गुप्त हो चुके विचार स्मृतियों के माध्यम से पुनः जागृत होते हैं. बस काल परिवेश और पात्रता का सामंजस्य होना होता है. काल परिवेश तो परमात्मा के हाथ, लेकिन पात्रता यह हमारी अपनी जिम्मेदारी है. और पात्र होने के लिए हमें साधना करनी होगी. अपनी इच्छाओं का रूपांतरण करना होगा. सीधे कहें तो साधन से ध्यान हटाकर साधना करनी पड़ती है. जोर साधन पर नहीं साधना पर होना चाहिए.

फिर स्मृति भी जागृत होती है और विचार भी आकार लेते हैं. तब कहीं से कोई संपादक हमारे बीच आ जाता है और लिखने-पढ़ने की इस विधा को एक प्रतिष्ठान बना देता है. एक अक्षर के फेरबदल से वह हमें बताना शुरू करता है कि संपादक का मूल कर्म संपादन ही है. फिर इस फेरबदल से जो ज्ञान-गंगा बहती है उसमें दोष कहां? परमात्मा और प्रकृति से यही प्रार्थना है कि वे कुछ और ऐसे संपादक हमारे समाज में भर दें कि संपादन पूरी तरह से लौट आये. अभी तो बहुत सूनापन है.”

संजय तिवारी
एफ-29, अंसारी मार्केट
दरियागंज, नई दिल्ली-110002

गांधी मार्ग
नवंबर-दिसंबर 2007

3 thoughts on “गांधीमार्ग को एक पत्र

  1. संजय तिवारी, अनुपम भाई और गाँधी मार्ग के प्रति शुभेच्छा ।

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  2. सारगर्भित लिखा है आपने!!

    घर में उपलब्ध गांधी मार्ग के बहुत पुराने अंक पढ़े है हमने पर पिछले कई सालों से देखा भी नही!!

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