अपना अध्ययन भी विदेशी निगाह से

धर्मपाल

सहज भारतीय, चित्त, मानस व काल को समझने के कई मार्ग है। अठारहवीं सदी के स्वदेशी राज-समाज को समझने का मेरा प्रयास एक मार्ग था। उस मार्ग से मानस तो शायद पकड़ में नहीं आता, पर उस मानस की विभिन्न भौतिक व्याप्तियों की समझ तो बनती है। सहज भारतीय तौर-तरीकों और व्यवस्थाओं का कुछ अनुमान होता है।

अपने साधारण लोगों का जानना, वे कैसे जीते हैं, किस प्रकार की बातें करते हैं, अलग-अलग परिस्थितियों से कैसे निपटने हैं, कैसा व्यवहार करते हैं, यह सब देखने-समझने की कोशिश करना भारतीय मानस, चित्त व काल को पकड़ने का एक और मार्ग है। पर यह शायद कुछ कठिन रास्ता है। हम सोचने-समझने वाले लोग फिलहाल अपनी जड़ों से इतने उखड़े हुए हैं कि अपने लोगों की बातों को उन्हीं की दृष्टि से समझ पाना शायद अभी हमसे बन न पाए।
भारतीय मानस को समझने के लिए अपने प्राचीन साहित्य को तो समझना ही पड़ेगा। यहॉ का असीम साहित्य, जो भारतीय सभ्यता का आधार रही है, उसे जाने बिना भारतीय मानस को जानने की बात चल नहीं सकती। ऋग्वेद से लेकर अपना जितना साहित्य हैं, उपनिषद् हैं, पुराण हैं, महाभारत और रामायण हैं, या बौद्ध और जैन साहित्य हैं, या फिर आयुर्वेद, शिल्पशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र व धर्मशास्त्र जैसे व्यावहारिक विषयों की जो विभिन्न संहिताएं हैं, उन सबकी एक समझ तो हमें बनानी ही पड़ेगी। इस सारे साहित्य से इस देश के मानस का, और उसकी विभिन्न राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक व तकनीकी व्याप्तियों का क्या चित्र उभरता है, और वह चित्र समय-समय पर कैसे बदलता- संवरता रहा है, इसका एक मोटा अनुमान तो हमें करना ही पड़ेगा। ऐसे किसी अनुमान के बिना अपने को समझने की प्रक्रिया आरंभ ही नहीं हो सकती। कम-से-कम बुद्धि पर आधारित प्रक्रियाएं तो ऐसे ही चला करती हैं। ज्ञानातीत कोई रास्ता हो तो उसकी बात अलग है।

अपने सारे पुराने साहित्य को देख-समझकर अपने चित्त व काल की एक तस्वीर बनाने, और उस तस्वीर में आधुनिक विश्व और उसकी वृत्तियों को उपयुक्त स्थान देने का काम हम कर नहीं पा रहीं हैं। ऐसा नहीं है कि भारत के पुराने साहित्य पर कोई काम हो ही न रहा हो। अनेक भारतीय विद्या संस्थान विशेष तौर पर भारतीय ग्रंथों को देखने-समझने के लिए बने हैं, और अनेक ऊंचे विद्वान लंबे समय से इस काम में लगे हैं। पर जो काम हो रहा है वह तो जो होना चाहिए था, उससे ठीक उल्टा है। अपनी दृष्टि से अपने और आधुनिक विश्व को समझने की बजाय आधुनिकता की दृष्टि से अपने साहित्य को पढ़ा जा रहा है। अपने काल के संदर्भ में बीसवीं सदी को समझने की बजाय बीसवी के संदर्भ में अपने काल में से कुछ समसामयिक ढूंढ़ने के प्रयास हो रहे हैं। अपनी कोई तस्वीर बनाकर उसमें आधुनिकता को सही जगह बैठाने की बजाय आधुनिकता की तस्वीर में अपने लिए कोई छोटा-मोटा कोना ढूंढ़ा जा रहा है।

पिछले दो-एक सौ साल से पश्चिम वालों ने भारत के बारे में जानने की कोशिश की है। यहॉं की नीति को, रीति-रिवाजों को, धर्म-शास्त्रों को, आयुर्वेद, ज्योतिष और शिल्प जैसी विद्याओं और विधाओं को,इन सबको समझने के प्रयास पश्चिमी विद्वान करते रहे हैं। जैसी-जैसी उन लोगों की रूचि थी, जैसी उनकी समझ थी, और जैसी उनकी आवश्यकताएं-अनिवार्यताएं थी, वैसा-वैसा कुछ वे भारतीय साहित्य पढ़ते रहे हैं। उनकी देखा-देखी, या कहिए कि उनके प्रभाव में आकर,अपने यहॉं के कुछ आधुनिक विद्वान भी भारतीय विद्याओं और विधाओं में रूचि लेने ले, और भारत के प्रचीन ग्रंथों का अध्ययन करने के लिए अनेक नए-नए संस्थान खुलने लगे। महाराष्ट्र में कई ऐसे संस्थान बने। बंगाल में भी बने होंगे। कई नए संस्कृत विश्वविद्यालय भी खुले।

वे सब संस्थान, विद्यालय और विश्वविद्यालय आदि नए तरीके के ही थे। भारतीय विद्याओं को पढ़ने-पढ़ाने की जो पारंपरिक व्यवस्थाएं हुआ करती थीं उनके साथ इनका कोई संबंध नहीं था। पश्चिम व विशेषत: लंदन के उस समय के विद्या संस्थानों के अनुरूप ही भारत के इन नए विद्या-संस्थानों का गठन किया गया था, और विद्याधाराओं से किसी प्रकार अपनी विद्याओं को जोड़ना ही शायद इनका प्रयोजन था। उदाहरण के लिए, वाराणसी में `क्वींस कॉलेज´ नाम का एक संस्थान वारेन हेस्टिंग्ज के समय में बना था। वही अब संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय कहलाता है। भारतीय विद्याओं का अध्ययन करने वाले प्रमुख भारतीय संस्थानों में उसकी गिनती होती है। ऐसे अनेक संस्थान बनते चले गए। अब भी इसी तरह के कई नए-नए संस्थान खुल रहे हैं।

पश्चिम की देखा-देखी में और पश्चिमी संस्थानों की तर्ज पर ये जो भारतीय विद्या संस्थान बने, उनमें पश्चिम के सारे पूर्वाग्रह और पश्चिम का पूरे-का-पूरा सैद्धांतिक ढॉचा प्रतिष्ठित हुआ। भारतीय विद्याओं पर भारतीय विद्वानों ने जो काम आरंभ किया, वह तो ऐसा था जैसे ये विद्वान कोई विदेशी लोग हों और किसी खोई हुई मृत सभ्यता के अवशेषों में से अपने काम आने योग्य कुछ ढूंढ रहे हों। यह काम वैसा ही था जैसा एंथ्रोपोलोजी में होता है। एंथ्रोपोलोजी पश्चिम की एक विशेष विद्या है। इस विद्या के प्रामाणिक प्रवक्ता और धुरंधर विद्वान माने जाने वाले क्लॉड लेवी स्ट्रॉस के अनुसार इस विद्या की विषय-वस्तु पराधीन, पराजित और खंडित समाज हुआ करते हैं। विजेता समाज विजित समाजों का अध्ययन करने के लिए जो उपक्रम करते हैं, वही एंथ्रोपोलोजी है। एंथ्रोपोलोजी की इस परिभाषा पर इस विद्या के विद्वत्समाज में कोई विशेष विवाद नहीं है। लेवी स्ट्रॉंस धाकड़ विद्वान हैं, इसलिए वे अपनी बात स्पष्ट कह जाते हैं। बाकी विद्वान इसी बात को कुछ घुमा-फिराकर कहते होंगे। पर यह तो साफ है कि एंथ्रोपोलोजी के माध्यम से अपने ही समाज का अध्ययन नहीं हुआ करता, न पराजित और खंडित समाजों के विद्वान इस विद्या को उलटा कर विजेता समाजों का अध्ययन करने के लिए इसे बरत सकते हैं। पर भारतीय विद्वान भारतीय सभ्यता पर ही एंथ्रोपोलोजी कर रहे हैं। भारतीय साहित्य पर अब तक जितना काम हुआ है, और जो हो रहा है, वह सब ऐसा ही काम है। या तो एंथ्रोपोलोजी की जा रही है, या पश्चिम के एंथ्रोपोलोजी-विदों के लिए सामग्री जुटाई जा रही है।

ऐसा नहीं है कि इस काम में परिश्रम या बुद्धि न लगती हो। बहुत विद्वता और बहुत मेहनत के काम अपने विद्वानों ने किए हैं। अभी कुछ बरस पहले महाभारत का टिप्पणी सहित एक संस्करण, अंग्रेजी में क्रिटीकल एडीशन, बनकर तैयार हुआ है। इसे बनाने में चालीस-पचास साल की मेहनत लगी होगी। ऐसे ही रामायण के संस्करण बने होंगे। वेदों और दूसरे अनेक ग्रंथों पर भी ऐसा काम हुआ होगा। फिर अनुवाद हुए हैं। संस्कृत, पाली, तमिल और बहुत-सी दूसरी भारतीय भाषाओं के कई ग्रंथों का अंग्रेजी में अनुवाद हुआ है। यूरोप की दूसरी भाषाओं में भी अनुवाद किए गए हैं। यहॉ की भाषाओं में भी अनुवाद हुए हैं। गीता प्रेस गोरखपुर वाले तो बहुत सारे प्राचीन साहित्य का सरल हिन्दी अनुवाद कर उसे सामान्यजनों तक पहुंचाने का अथक प्रयास किए जा रहे हैं। गुजराती में भी बहुत से अनुवाद हुए हैं। यह सब हुआ है। और यह बहुत परिश्रम और विद्वता का काम ही हुआ है।

पर यह सारा काम भारतीय चित्त व काल की किसी अपनी समझ के धरातल से नहीं, पश्चिम की विश्वदृष्टि के आलोक में ही हुआ है। या फिर खाली भक्ति की रौ में बहकर कुछ पुण्य कमाने की दृष्टि से अनुवाद और टीकाएं होती गई हैं। इसलिए इन सब अनुवादों और संस्करणों आदि से भारतीयता की समझ के प्रखर होने की बजाय आधुनिकता के पूर्वाग्रह ही प्राचीन भारतीय साहित्य का एक भाष्य-सा बनता चला गया है।

उदाहरण के लिए श्री श्रीपाद दामोदर सातवलेकर के पुरूष-सूक्त के अनुवाद व भाष्य को देखिए। उसमें उन्होंने ला दिया है कि ब्रह्मा के तप से जिस राज्य की अभिव्यक्ति हुई उसके ये-ये विभाग थे। पुरूष-सूक्त का भाष्य करते हुए राज्य के बीसीयों विभाग उन्होंने गिना दिए हैं। मानो अंग्रेजी साम्राज्य के विभागीय अफसरशाही वाले राज्य की कल्पना ही पुरूष-सूक्त का संदेश हो। श्री सातवलेकर तो आधुनिक भारत के महिर्ष जैसे माने जाते हैं। उनका परिश्रम, उनकी विद्वता और भारत की प्रज्ञा में उनकी निष्ठा सब ऊंची कोटि की थी। पर आधुनिकता के प्रवाह में वे भी ऐसा बहे कि उन्हें पुरूष-सूक्त में अंग्रेजी राज्य व्यवस्था का पूर्वाभास दिखाई देने लगा। भारतीय साहित्य पर जो बाकी काम हुआ है, वह भी कुछ ऐसा ही है। उनका सार यही निकलता है कि आधुनिक पश्चिम में कोई विशेष वुत्ति या समझ है, तो वही वृत्ति, वही समझ अपने ग्रंथों में पहले से ही थी, और आधुनिक पश्चिम के मुकाबले अधिक सबल-स्पष्ट थी।

पिछले बीस-तीस सालों में ऐसा ही काम और ज्यादा होने लगा है। पर इस सबका क्या लाभ? दूसरों की समझ के अनुरूप, दूसरों के अनुरूप, दूसरों के मुहावरे में ही बताचीत करनी है तो अपने प्राचीन साहित्य को बीच में क्यों घसीटा जाए? बीसवीं सदी की पश्चिमी आधुनिकता को ही प्रतिपादित करना है तो उसके लिए अपने पूर्वजों को साक्षी बनाने की जरूरत नहीं है। अपने पूर्वजों और उनका साहित्य तो अपने भारतीय चित्त व काल के ही साक्षी हो सकते हैं। उन्हें पश्चिमी आधुनिकता का साक्षी बनाकर खड़ा करना तो अनाचार ही है।

अपने यहॉ प्राचीन साहित्य पर होने वाले काम का एक और उदाहरण देखिए। पिछले बहुत समय से, शायद सौ-एक बरस में, हमारे विद्वान लोग इस देश की विभिन्न विद्याओं की विभिन्न भाषाओं में ज्ञात पांडुलिपियों की उपलब्ध सूचियों का एक संकलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस संकलन को बनाने वाले विद्वानों ने लंबी मेहनत के बाद यह जाना है कि संस्कृत, प्राकृत, पाली, तमिल आदि भाषाओं की ज्ञात पांडुलिपियों की दो हजार के लगभग सूचियॉ या कैटालॉग हैं। ये दो हजार कैटालॉग शायद सात-आठ सौ अलग-अलग स्थानों से संबंधित हैं। इनमें से सौ-दो सौ स्थान भारत से बाहर के होंगे। यह केवल कैटालॉगों या सूचियों की बात है। मान लिया जाए कि प्रत्येक सूची में सौ-दो सौ के लगभग पांडुलिपियॉ होंगी, इसका तो अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता।

अब यह कितनी मेहनत, कितनी विद्वता का काम है? सात-आठ सौ स्थानों पर रखी पांडुलिपियों को इकट्ठा कर उनकी एक लंबी समिन्वत सूची बनाना कोई आसान काम तो नहीं रहा होगा। लेकिन हम क्या करेंगे इस सबका? दो-चार लाख पांडुलिपियों की जो यह समिन्वत सूची है वह हमारे किस काम आएगी? यह सूची तो पिछले सौ-डेढ़ सौ साल में संकलित हुई है। कुछ विदेशियों ने बनाई है, कुछ हमारे विद्वानों ने बनाई है। पर हमें तो यह भी नहीं मालूम कि इस सूची में जो पांडुलिपियॉ दर्ज हैं उनमें से कितनी अभी बची हैं और कितनी को खोलकर, अभी भी पढ़ा जा सकता है। इनमें से कितनी माइक्रो फिल्म हो सकती हैं इसका तो शायद कोई ठीक अंदाजा नहीं है।

जिन पांडुलिपियों को पढ़ा ही नहीं जा सकता तो उनकी ये सूचियॉ हम किसलिए बना रहे हैं? वैसे तो ऐसा माना जाता है कि भारतीय भाषाओं की कुल पचास करोड़ की आस-पास पांडुलिपियॉ इधर-उधर पड़ी होंगी। जो साहित्य हमारे पास आसानी से उपलब्ध है उसी को हम देख-समझ नहीं सकते तो इन पचास करोड़ की बात तो निरर्थक ही है।

यह ठीक है कि विद्वता के क्षेत्र में ऐसे काम भी हुआ करते हैं। ठीक-ठाक चलते समाजों में ऐसी विद्वता समा भी जाती है। जिन पंडित लोगों को कवित्त ही करने होते हैं, उन्हें अपने कवित्त करने दिया जाता है। और सक्षम समाज इस प्रकार की विद्वता को कभी-न-कभी कहीं काम पर लगा देते हैं। लेकिन उन समाजों में भी अधिकतर काम तो मुख्य धारा में, एक विशेष दिशा में, एक-दूसरे को समर्थन देते हुए, एक-पर-एक को जोड़ते हुए ही किए जाते हैं। हमारे यहॉ तो भारतीय विद्या पर होने वाले कामों की कोई मुख्य धारा ही नहीं है, कोई दिशा ही नहीं है। सारे का सारा काम ही जैसे कोई मानसिक ऐयाशी हो।

पर हमारे पास तो इस तरह की कोशिशों के लिए न साधन हैं, न समय। हमें अपने चित्त व काल को समझना है, अपने दो पैरों पर खड़े होने के लिए कोई धरातल बनाना है, तो इस तरह की दिशाहीन विद्वता से कुछ नहीं बनेगा। उसके लिए तो अपने पूरे साहित्य को देख-समझकर जल्दी से एक मोटा-मोटा चित्र बनाना होगा। बाद में उस चित्र में विभिन्न रंग भरते जाएंगे, रेखाऐ सुस्पष्ट होती जाएंगी। पर हमें अपनी दृष्टि से अपने को और विश्व को देखने की एक दिशा तो मिल जाएगी, अपना कोई धरातल तो होगा। अपनी दिशा ढूंढ़ने के काम कोई सदियों में नहीं किए जाते। ये काम तो दो-चार साल में पूरे किए जाते हैं, और ऐसे किए जाते हैं कि छह-सात महीनों में ही अपनी कोई रूपरेखा उभरने लगे।

अपने पुराने साहित्य का अध्ययन कर इस तरह की कोई रूपरेख बना लेने की बात तब मैं करता हूं तो मित्र लोग कहते हैं कि भई आप इसमें मत पिड़ए। यह तो समझ नहीं आएगा। इसे जानने के लिए तो संस्कृत पढ़नी पड़ेगी। अंग्रेजी में पढ़कर या हिन्दी में पढ़कर तो सब गलत ही समझ बनेगी। पढ़ना ही है तो संस्कृत पढ़ो। पहले संस्कृत सीख लो।

लेकिन संस्कृत जानने वाले कितने लोग हैं इस देश में? यहॉ तो अब संस्कृत में डॉक्टरेट भी संस्कृत सीखे बिना ही मिल जाती है, अंग्रेजी में प्रबंध-ग्रंथ लिखकर ही संस्कृत की डॉक्टरेट हो जाती है। अब संस्कृत पढ़ने वाले विद्वान तो शायद जर्मनी में ही मिलते हैं। जापान के कुछ विद्वान भी पढ़ते होंगे रूस-अमेरिका वाले भी शायद पढ़ते हों। हमारे यहॉ के आधुनिक विद्वानों में तो संस्कृत में कोई विशेष लिखना-पढ़ना नहीं होता। हजार-पॉच सौ संस्कृत जानने पंडित शायद बचे हों, इधर-इधर। लेकिन यह संभव है पारंपरिक विद्याधाराओं से जुड़े परिवारों में चार-छह लाख लोग अभी भी संस्कृत समझ व पढ़ सकते हों।

सुबह आकाशवाणी में जो समाचार आते हैं उन्हें सुनने-समझने वाले भी शायद ज्याद नहीं हैं। मैंने श्री रंगनाथ रामचंद्र दिवाकर से एक बार पूछा था कि इन समाचारों को सुनने वाले दस लाख लोग होंगे क्या? वे बुजुर्ग थे, विद्वान थे, लंबे समय तक जनजीवन में रहे थे। उनका कहना था कि नहीं, इतने लोग तो नहीं सुनते होंगे। पिछले दिनों तमिल पत्र दिनमनी के पूर्व संपादक और वयोवृद्ध विद्वान श्री शिवरमण से भेंट हुई, उनसे मैंने पूछा कि दक्षिण में तो संस्कृत पढ़ने-पढ़ाने की परंपरा रही है, यहॉ ठीक से संस्कृत जानने वाले कितने होंगे? उनका कहना था कि एक भी नहीं। फिर कहने लगे हो सकता है हजारेक लोग निकल आएं जो अच्छी संस्कृत जानते हों। इससे ज्यादा जो नहीं।

तो अपने देश में अगर संस्कृत की यह अवस्था है, संस्कृत यहॉ रही ही नहीं, संस्कृत जानने वाले ही नहीं रहे तो अपने चित्त व काल की रूपरेखा बनाने के लिए हम संस्कृत के लौट आने की प्रतीक्षा तो नहीं कर सकते। जिस अवस्था में हम हैं, वहीं से चलना पड़ेगा। जो भाषाएं हमें आती हैं, उन्हीं के माध्यम से कुछ जानना पड़ेगा। विद्वता का शायद यह तरीका न होता हो। पर अभी आवश्यकता प्रकांड विद्वता की नहीं, किसी प्रकार इस भटकाव से बाहर निकलने की है। अपनी कोई दिशा ढूंढ़ने की है। स्थिर होकर खड़े होने और अपने ढंग से विश्व को समझने के लिए धरातल तैयार करने की है। वह धरातल तैयार हो जाएगा तो प्रकांड विद्वता के लिए भी रास्ते निकल आएंगे। संस्कृत पढ़ने-सीखने का भी सुभीता हो जाएगा। उस सबके लिए समय है। पर अपना धरातल ढूंढ़ने के काम को पूरा करने के लिए तो बहुत समय अपने पास नहीं है। कितनी देर तक पूरी सभ्यता अधर में लटकी खड़ी रह सकती है?

2 thoughts on “अपना अध्ययन भी विदेशी निगाह से

  1. जहाँ तक मुझे लगता है, व्यावहारिकता के धरातल पर रहने से कोई भी सभ्यता समय के साथ साथ परिवर्तित जरूर हो सकती है पर ख़त्म कभी नहीं हो सकती. जो झुकता नहीं वो अक्सर टूट जाया करता है. चीजो का महत्त्व समझना, उनसे प्रेरणा लेना, अतीत की गलतियों को दोबारा न दोहराना… इससे ज्यादा और क्या कहा जाए इतिहास के बारे में. इतिहास पीछे नहीं खींचता, बल्ल्की हमेशा आगे देखने और बढ़ते रहने की प्रेरणा देता है.. फ़िर चाहे कोई लुप्तप्राय भाषा हो, संस्कृति हो, या कुछ और आचार व्यवहार. परिवर्तन प्रकृति का नियम है और उसे कोई एक व्यक्ति नही बनता या मिटाता. ये बनते भी युगों में हैं और मिटते भी युगों में ही हैं. जो लोग भाषा के पीछे लकीर पीटते रहते हैं वो स्वयं भले ही कोई संस्कृत के प्रकांड विद्वान बन जाए, हो सकता है उन्होंने दो चार ग्रन्थ भी लिख डाले हो संस्कृत में, लेकिन उनसे अगर ये पूछा जाए की उन्होंने दूसरो के लिए क्या किया तो वो क्या जवाब देंगे? इतने परम ज्ञान के बाद भी अक्सर ऐसे लोग नितांत संताप में जीवन व्यतीत करते हैं सिर्फ़ यह सोचते हुए की “ये नई पीढ़ी न जाने किस रह पर जा रही है…”

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