इतिहासकार धर्मपाल

इतिहासकार धर्मपाल (Historian Dharampal) का जन्म जनवरी 1922 में मुजफ्फरनगर (उप्र) के एक संपन्न वैश्य परिवार में हुआ था. बचपन में ही वे महात्मा गांधी के प्रति आकर्षित हो गये, और महात्मा गांधी की सहयोगी मीरा बेन के साथ उन्होंने लंबे समय तक काम किया था. ऋषिकेश के पास पशुलोक की स्थापना में वे मीरा बेन के साथ थे. उन्होंने लंबे समय तक महासचिव के रूप में आवार्ड का काम भी देखा जिसकी स्थापना खुद जय प्रकाश नारायण ने की थी. लेकिन धर्मपाल के प्रयोगात्मक कार्य उनका वह परिचय नहीं दे सकते जिसके लिए धर्मपाल को हम सभी को जानना चाहिए. वे पूरेपन के मनीषी थे. यह दुखद है कि अपनी मृत्यु (24 अक्टूबर 2006) से कुछ महीनों पहले वे कहने लगे थे कि “अब वास्तविकता अब पूरेपन में उनके पकड़ में नहीं आ रही है.” यह धर्मपाल जैसे महान विचारक के लिए बेहद मार्मिक पीड़ा का विषय रहा होगा क्योंकि उनका लगभग सारा बौद्धिक जीवन विभिन्न सभ्यताओं में मनुष्य की नियति को उसके पूरेपन में ही पकड़ने में लगा रहा.

धर्मपाल ने गहरी निष्ठा और लगन से हमारे सामने भारतीय सभ्यता का वह चेहरा उदघाटित किया है जो अंग्रेजी शिक्षा-दीक्षा और अंग्रेजी ढंग की ही राजनीति के कारण खुद हमारे लिए वर्षों से कुहेलिका में डुबा रहा था. इस अर्थ में धर्मपाल ने ठोस आंकड़ों के साक्ष्य से हमारे अतीत का अन्वेषण किया और हमें वह राह दिखाई जिस पर चलकर हम आज भी अपने को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त कर सकते हैं. एक तरह से धर्मपाल एक नये आत्मविश्वस्त भारत के संभावित सूत्रधार हैं. आत्मविश्वस्त भारत जिसमें उसके सभी नागरिकों की मेधा, कल्पना और कौशल की सम्मानजनक जगह हो सकती है. जैसे कि वह अंग्रेजों के पहले से भारत में सदियों तक रहती आयी है.
वे यह मानते थे कि पिछले डेढ़-दो सौ वर्षों में हमारे देश के बौद्धिक नियोजकों और साधारण समुदायों के बीच का रिश्ता पूरी तरह टूट गया है. हम तथाकथित पढ़े-लिखे लोग अपने ही देश के साधारण लोगों के जीवन के आधारों, विश्वासों और आत्मनिर्भरताओं आदि को लगभग नहीं के बराबर जानते हैं. हमने तो अपने मन में अपने ही देश के लोगों की वैसी तस्वीर बना रखी है जैसी अंग्रेज इतिहासकारों और उनके भारतीय वंशजों ने हमें बतायी है. आज हमें अपने देश को उसकी अपनी दृष्टि के आधार पर पुनर्नियोजित करने की जरूरत है जिसे हमारी आधुनिक शिक्षा, हमारा आधुनिक इतिहास लेखन, हमारा आधुनिक समाज विज्ञान करने नहीं दे रहा है.
यह उन्हीं के काम का परिणाम है कि हम आज यह जानते हैं कि सन 1842 तक हमारे देश के कोने-कोने में स्कूलों का जाल फैला हुआ था जिसे खुद महात्मा गांधी ने खूबशूरत वृक्ष का नाम दिया था. उसमें पढ़नेवाले छात्र-छात्राओं में अधिकतर तथाकथित निचली जातियों के और शिक्षक भी लगभग 90 जातियों से आते थे. यह जानने का स्रोत भी उन्होंने अंग्रेजों के उन सर्वेक्षणों से तलाशा जिसे करने के बाद अंग्रेजों ने हमें उल्टी पट्टी पढ़ाई कि हम तो सदैव से मूर्ख ही थे.
धर्मपाल भारतीय जीवन की बुनावट के सत्य को अंग्रेजी झूठ की धुंध से बाहर ले आये. और यह उम्मीद करते रहे कि उनके इस काम को दूसरे विचारक और अध्येता आगे ले जाएंगे. ऐसा बहुत कम हो पाया.
धर्मपाल की प्रमुख पुस्तकें

One thought on “इतिहासकार धर्मपाल

  1. धर्मपाल जी के बारे में बताने के लिये आभार.

    “अंग्रेजों ने हमें उल्टी पट्टी पढ़ाई कि हम तो सदैव से मूर्ख ही थे.”

    मजे की बात है कि आज भी “काले” अंग्रेज उन लोगों से नाराज हो जाते हैं जो अंग्रेजों के इन करतूतों की पट्टी खोल देते है

    Like

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