ध्वनि प्रकाश है या प्रकाश ही ध्वनि

मैंने अब तक यही पढ़ा था कि ध्वनि और प्रकाश दोनों दो घटनाएं हैं. लेकिन अब अनुभव आता है कि ध्वनि से प्रकाश पैदा नहीं होता, ध्वनि ही प्रकाश है. प्रकाश ध्वनि का परिणाम नहीं है, कारक है. इन दोनों का दो अस्तित्व नहीं है. प्रकाश के मूल में ध्वनि है. आवाज है. शब्द है. हर तरह के प्रकाश के साथ अलग-अलग तरह के शब्द जुड़े हुए हैं. या कह सकते हैं कि अलग-अलग शब्द अलग-अलग प्रकाश पैदा करते हैं. वे प्रकाश तरंग निर्मित करते हैं. वे तरंगे विचार बनती हैं. वे बिचार स्थूल आकार लेते हैं तो पंचमहाभूतों की रचना होती है. वे पंच महाभूत जब एकाकार होते हैं तो शरीर बनता है, सृष्टि बनती है. वे भारतीय विद्वान जिन्होंने अंतरर्यात्रा की है वे सही कहते हैं कि ऊंकार नाद से समूची सृष्टि अस्तित्व में आयी है. अस्तित्व के मूल में शब्द ही हैं. और उन शब्दों के मूल में एक ही शब्द है.

हमें लगता है कि हम प्रकाश देख रहे हैं. लेकिन क्या सचमुच हम कभी प्रकाश देख पाते हैं? प्रकाश तो एक क्रिया का परिणाम है. वह क्रिया कौन सी है? अगर वह किसी नाद का परिणाम है तो हम उसे सुन क्यों नहीं पाते. क्या नाद भी सूक्ष्म होते हैं? क्या मूल नाद मौन है? या फिर वही मूल नाद सभी प्रकार के शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त हो रहा है? तुलसीदास जी जिस महाअस्तित्व की ओर संकेत करते हैं कि “बिनु पग चलई सुनई बिनु काना” वह वही है और वह वही भर नहीं है?

हम जितने भी तरह के शब्द उत्पन्न करते हैं उससे उसी प्रकार की प्रकाश रचना होती है. हमारे द्वारा पैदा की गयी कोई भी ध्वनि कभी निरर्थक नहीं होती. उसका हमारे मन-मष्तिष्क और वातावरण पर प्रभाव होता है.

One thought on “ध्वनि प्रकाश है या प्रकाश ही ध्वनि

  1. ह्म्म.. सोचने वाली बात है.. आप भी इस पर और सोचिये.. कुछ और अच्छा निकल सकता है..

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