भारतीय चित्त मानस और काल

धर्मपाल
गॉंधीजी 9 जनवरी 1915 को अपने दक्षिण अफ्रीका प्रवास से वापस देश लौटे। रास्ते में वे ब्रिटेन में भी रूके थे। उसके बाद, बर्मा और श्रीलंका की बात छोड़ दें तो वे केवल एक बार विदेश गए-1931 की वह यात्रा ब्रिटेन जाने के लिए ही थी। पर भारत से जाते और लौटते हुए वे मिस्र,फ्रांस, स्विट्जरलैंट और इटली में भी कुछ-कुछ दिन ठहरते गए। अमेरिका वाले तब बहुत चाहते रहे कि गॉंधीजी वहॉं भी आएं। लेकिन उनका अमेरिका जाना नहीं हो पाया।

1915 में गांधीजी के मुंबई उतरने से पहले ही देश में उनसे बहुत बड़ी उम्मीदें लगाई जाने लगी थीं। उस समय के संपादकीय आलेखों से लगता है कि उन्हें कुछ अवतार-पुरूष सा समझा जाने लगा था। मुंबई में गॉंधीजी और कस्तूरबा का जैसा स्वागत हुआ, वैसा उस नगर की समृति में पहले किसी का नहीं हुआ था- ऐसा उन दिनों के समाचारपत्रों का कहना है। मुंबई के बड़े-बड़े घरों में गॉंधीजी और कस्तूरबा के सम्मान व स्वागत में अनेक भोज हुए। उन भोज-समारोहों में मुंबई हाईकोर्ट के कई न्यायाधीश और मुंबई के गवर्नर की परिषद के सदस्य भी पहुंचे। मुंबई के सम्पन्न समाज के प्रमुख लोग और बड़े-बड़े उद्योगपति तो उन भोजों में उपस्थित थे ही।

पर तीन में ही गॉंधीजी और कस्तूरबा इस सबसे ऊब गए। 12 जनवरी को हुए एक बड़े स्वागत समारोह में गॉंधीजी ने अपनी उकताहट सबके सामने प्रकट कर ही डाली। इस समारोह में 600 से अधिक अतिथि आए थे, और फीरोजशाह मेहता स्वयं इसके अध्यक्ष थे। समारोह में बोलते हुए गॉधीजी ने कहा कि उन्होंने सोचा था कि देश आकर उन्हें दक्षिण अफ्रीका से कहीं अधिक आत्मीयता का अनुभव होगा। लेकिन पिछले तीन दिनों से मुझे और कस्तूरबा को लग रहा है कि दक्षिण अफ्रीका के भारतीय मजदूरों के बीच जीवन अधिक आत्मीय था। यहॉं तो हम अपने को कुछ पराए-से लोगों के बीच ही पा रहे हैं।
उसके बाद गॉधीजी का रहन-सहन बदलता ही चला गया। उनके कार्यक्रम भी बड़े लोगों के भोज-समारोहों से हटकर अधिकतर साधारण लोगों के बीच होने लगे। और देश के साधारणजन के मानस में उनकी ऐसी पैठ हुई कि जनवरी के अंतिम सप्ताह में, उनके मुंबई उतरने के एक पखवाड़े के भीतर, सौराष्ट्र में लोग उन्हें `महात्मा´ कहकर संबोधित करने लगे। उसके केवल तीन महीने बाद, लगभग एक हजार मील दूर, हरिद्वार के पास गुरूकुल कांगड़ी में भी उन्हें `महात्मा´ कहा जा रहा था।

तब से लेकर अगले पच्चीस-तीस बरस तक देश में सघन आत्म-विश्वास की एक लहर चलती रही। लोगों को शायद ऐसा आभास होता रहा कि उनके कष्टों का निवारण करने के लिए, पृथ्वी का बोझ घटाने उनके बीच उपस्थित है। अधिकांश भारतीयों ने उन्हें कभी देखा भी नहीं होगा। बहुतों ने उनके रहन-सहन व काम-काज के तरीकों को कभी सही भी यही मानते रहे होंगे कि गॉंधीजी जो स्वतंत्रता संग्राम चला रहे थे, उसके सफल होने की कोई संभावना नहीं है। लेकिन फिर भी शायद भी भारतीयों को उनमें एक अवतार- पुरूष और एक दिव्य आत्मा के दर्शन होते रहे।

पृथ्वी के कष्टों का निवारण करने के लिए अवतार-पुरूष जन्म लिया करते हैं, यह मान्यता भारतवर्ष में अत्यन्त प्राचीन समय से चली आ रही है। रामायण, महाभारत और पुराणों के रचना-काल से तो ऐसा माना ही जा रहा है। द्वापर का अंत आते-आते धर्म का इतना हास होता है कि पृथ्वी अपने ऊपर के बोझ से पीिड़त होकर विष्णु से इस बोझ को किसी प्रकार हल्का करने की प्रार्थना करती है। तब देवों की ओर से एक बड़ी व्यूह रचना होती है और विष्णु स्वयं श्रीकृष्ण आदि के रूप में पृथ्वी पर उतरते हैं। महाभारत का युद्ध पृथ्वी के बोझ को हल्का करने की इसी प्रक्रिया का एक उदाहरण है। ललित-विस्तर आदि बौद्ध-चरितों में गौतम बुद्ध के पृथ्वी पर अवतरण के भी ऐसे ही कारण दिए गए हैं। इसी प्रकार समय-समय के प्रश्नों के समाधान के लिए अनेक अवतार होते रहते हैं।

इसलिए 1915 में भारत के लोगों ने सहज ही यह मान लिया कि भगवान् ने उनका दु:ख समझ लिया है, और उस दु:ख को दूर करने के लिए व भारतीय जीवन में एक नया संतुलन लाने के लिए महात्मा गॉंधी को भेजा गया है। गॉंधीजी के प्रयासों से भारतीय सभ्यता की दासता का दु:ख बहुत कुछ कट ही गया। लेकिन भारतीय जीवन में कोई संतुलन नहीं आ पाया। गॉंधीजी 1948 के बाद जीवित रहते तो भी इस नए संतुलन के लिए तो कुछ और ही प्रयत्न करने पड़ते।

जो काम महात्मा गॉंधी पूरा नहीं कर पाए उसे पूरा करने का प्रयास हमें आगे-पीछे तो आरंभ करने ही पड़ेंगे। आधुनिक विश्व में भारतीय जीवन के लिए भारतीय मानस व काल के अनुरूप कोई नया संतुलन ढूंढ़े बिना तो इस देश का बोझ हल्का नहीं हो पाएगा। और उस नए ठोस धरातल को ढूंढ़ने का मार्ग वही है जो महात्मा गॉंधी का था। इस देश के साधारणजन के मानस में पैठकर, उसके चित्त व काल को समझकर ही, इस देश के बारे में कुछ सोचा जा सकता है।

गॉंधीजी के लिए यह समझ और पैठ सहज ही थी। हमें उसे पाने के लिए अनेक बौद्धिक प्रयत्न करने पड़ेंगे। पर हमें यह जनना तो पड़ेगा ही कि इस देश के साधारणजन इसे किस दिशा में ले जाना चाहते हैं? वर्तमान की उनकी समझ क्या है? भविष्य का कैसा प्रारूप उनके मन में है? जिन साधारण लोगों के बल पर इस देश को एक नया संतुलन दिया जाना है, वे लोग हैं कौन? उनका स्वभाव क्या है? उनकी आदतें कैसी हैं? उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं? इच्छाएं-अकांक्षाएं क्या हैं? वे अपने बारे में क्या मानते हैं? और वे संसार को कैसे देखते हैं? या फिर वे भगवान् को नहीं मानते, तो किसे मानते हैं? काल को मानते हैं? दैव को मानते हैं? या कुछ और ही उनके मन में है क्या? जनसाधारण की अच्छे जीवन की कल्पना के अनुरूप और उनके सहयोग से इस देश को कुछ बनाना है तो यह सब तो जानना ही पड़ेगा।

लेकिन अपने लोगों के चित्त व मानस को समझने की यह बात लगता है हमें अच्छी नहीं लगती। गॉंधीजी का भारत के साधारणजन के साथ एकाकार होकर उन्हीं के चित्त की बात को शब्द देते जाना भी हम भद्रजनों को कभी सुहाता नहीं था। भारतीय चित्त व मानस से हमें डर-सा लगता है। हम यह मानकर चलना चाहते हैं कि भारतीय मानस कुछ है ही नहीं। वह तो एक साफ स्लेट है, जिस पर हम भद्र लोगों को आधुनिकता से सीखकर एक नया आलेख लिखना है।

पर शायद हमें यह आभास भी है कि भारतीय चित्त वैसा साफ-सपाट नहीं है, जैसा मानकर हम चलना चाहते हैं। वास्तव में तो वह सब विषयों पर सब प्रकार के विचारों से अटा पड़ा है। और वे विचार कोई नए नहीं हैं। वे सब पुराने ही हैं। शायद ऋग्वेद के समय से वे चले आ रहे हैं। या शायद गौतम बुद्ध के समय के कुछ विचार उपजे होंगे, या फिर महावीर के समय से। पर जो भी ये विचार हैं, जहां से भी आएं हैं, वे भारतीय मानस में बहुत गहरे पैठे हुए हैं। और शायद हम यह बात जानते हैं। लेकिन हम इस वास्तविकता को समझना नहीं चाहते। इसे किसी तरह नकार कर, भारतीय मानस व चित्त की सभी वृत्तियों से ऑंखे मूंदकर, अपने लिए कोई एक नई दुनिया हम गढ़ लेना चाहते हैं।

इसलिए अपने मानस को समझने की सभी कोशिशें हमें बेकार लगती हैं। अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी के भारत के इतिहास का मेरा अध्ययन भी भारतीय मानस को समझने का प्रयास ही था। उस अध्ययन से अंग्रेजों के आने से पहले के भारतीय राज-समाज की, भारत के लोगों के सहज तौर-तरीकों की एक समझ तो बनी। समाज की जो भौतिक व्यवस्थाएं होती हैं, विभिन्न तकनीकें होती हैं, रोजमर्रा का काम चलाने के जो तरीके होते हैं, उनका एक प्रारूप- सा तो बना, पर समाज के अंतर्मन की, उसके मानस की, चित्त की कोई ठीक पकड़ उस काम से नहीं बन पाई। मानस को पकड़ने का, चित्त को समझने का मार्ग शायद अलग होता है।

पर भारतीय राज-समाज की भौतिक व्यवस्थाओं को समझने का मेरा वह प्रयास भी अधिकतर लोगों को विचित्र ही लगा था। 1965-66 में जब मैंने अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी के दस्तावेजों को देखना शुरू किया तो दिल्ली के एक मित्र ने कहा “भई तुम ये क्या गड़े मुर्दे उखाड़ने लगे हो? कुछ ढंग का काम क्यों नहीं करते?´´ और बहुत लोगों ने कहा कि आप अठारहवीं सदी की ये जो बातें करते हैं वे माना कि ठीक हैं। उस समय भारत में खेती अच्छी होती होगी। बढ़िया लोहा बनता होता। लोगों को चेचक आदि से बचाव के टीके लगाना आता होगा। प्लास्टिक सर्जरी होती होगी। लोगों की राज-समाज की अपनी सक्षम व्यवस्थाएं रही होंगी। पंचायत रही होंगी। यह सब सुनकर तो अच्छा ही लगता है। इन बातों से आत्म-विश्वास और आत्म-गौरव का भाव भी शायद देश में कुछ-कुछ जागता हो, पर आजकल के संदर्भ में तो ये कोई बहुत काम की बातें नहीं हैं। यह सब जानकारी आज किस काम आने वाली है? यह सब जानने का लाभ क्या है? ऐसा अक्सर लोग पूछते रहते हैं।

इसी तरह का सवाल श्री चंद्रशेखर ने उठाया था। उनके घर मैं गया था। वे पूछने लगे आप यह अठारवीं सदी को लेकर क्या बैठे हैं? अब तो बीसवीं-इक्कीसवीं की बात होनी चाहिए। और भी बहुत से अनुभवी व परिचित लोग यही बात और अधिक जोर देकर करते रहते हैं। लगता है हम जैसे सभी भारतीय ही किसी तरह बीसवीं-इक्कीसवीं सदी में पहुंचने की बातें करने लगे हैं।

पर यह बीसवीं-इक्कीसवीं सदी है किसकी? हमारी तो यह सदी नहीं है। भारत के जो साधारण लोग हैं, जिनकी अवस्था देखकर हम दु:खी होते रहते हैं और जिनकी भलाई के नाम पर यह सब ताम-झाम चलता है, उनकी तो यह सदी नहीं है। जवाहरलाल नेहरू की मानें तो वे साधारण लोग तो अभी सत्तरहवीं-अठारहवीं सदी में ही रह रहे हैं। जवाहरलाल नेहरू ऐसा कहां करते थे, और वे इस बात को लेकर बहुत परेशान थे कि अपने लोग अठारहवीं सदी से बाहर निकल ही नहीं रहे, बीसवीं में आ नहीं रहे।

पर वे साधारणजन तो शायद पश्चिम की अठारहवीं सदी में भी न हों। हो सकता है कि वे अभी किसी पौराणिक युग में ही रहे हों। काल और युग की अपने यहॉं जो कल्पना है, उसी दृष्टि से वर्तमान को देख रहे हों। कलियुग में रहते हुए किसी अवतार-पुरूष के आने की अपेक्षा में हों। उनकी मान्यताओं के अनुसार तो पश्चिम की इस बीसवीं सदी में ही महात्मा गॉंधी के रूप में एक अवतार-पुरूष यहॉं आऐ भी थे। पर शायद उन्हें किसी दूसरे-तीसरे के आने की उम्मीद है, और शायद उसी की बातों में वे मग्न हों।

अगर यह सच है कि इस देश के साधारण लोग तो अपनी पौराणिक कल्पना के कलियुग में ही रह रहे हैं तो इसी कलियुग को समझने की कोशिश करनी पड़ेगी। बीसवीं सदी का राग अलापते रहने से तो हमारा काम नहीं चल पाएगा। हमारे लोग इस सदी में नहीं हैं तो यह अपनी सदी है ही नहीं। वैसे भी यह पश्चिम की ही सदी है। हो सकता है जापान वालों को भी कुछ-कुछ अपनी ही सदी लगती हो, पर मुख्य रूप से तो यह यूरोप और अमेरिका की ही सदी है। और , क्योंकि, हम यूरोप या अमेरिका या जापान के साथ अपने संपर्क को तोड़ नहीं सकते, इसलिए उनकी इस बीसवीं सदी को भी शायद कुछ समझना पड़ेगा। पर यह समझना तो अपने साधारण लोगों की दृष्टि से ही होगा न? अपने काल के आधार पर ही दूसरों के काल को समझा जाएगा न? समझने की प्रक्रिया का यह सामान्य क्रम उलटा तो नहीं जा सकता। हमें तो कलियुग की दृष्टि से ही बीसवीं सदी को समझना पड़ेगा, बीसवीं सदी की दृष्टि से कलियुग को समझना तो हो ही नहीं सकता।

हममें से कुछ लोग शायद मानते हों कि वे स्वयं भारतीय मानस, चित्त व काल की सीमाओं से सर्वथा मुक्त हो चुके हैं। अपनी भारतीयता को लॉंघकर वे पश्चिमी आधुनिकता या शायद किसी प्रकार की आदर्श मानवता के साथ एकात्म हो गए हैं। ऐसे कोई लोग हैं तो उनके लिए बीसवीं सदी की दृष्टि से कलियुग को समझना और भारतीय कलियुग को पश्चिम की बीसवीं सदी के रूप में ढालने के उपायों पर विचार करना संभव होता होगा। पर ऐसा अक्सर हुआ नहीं करता। अपने स्वाभाविक देश-काल की सीमाओं-मर्यादाओं से निकलकर किसी और के युग में प्रवेश कर जाना असाधारण लोगों के बस की भी बात नहीं होती। जवाहरलाल नेहरू जैसों से भी नहीं हो पाया होगा। अपनी सहज भारतीयता से पूरी तरह मुक्त वे भी नहीं हो पाए होंगे। महात्मा गॉंधी के कहने के अनुसार भारत के लोगों में जो एक तकाZतीत और विचित्र-सा भाव है, उस विचित्र तर्कातीत का शिकार होने से जवाहरलाल नेहरू भी नहीं बच पाए होंगे। फिर बाकी लोगों की तो बात ही क्या है। वे तो भारतीय मानस की मर्यादाओं से बहुत दूर जा ही नहीं पाते होंगे।

भारत के बड़े लोगों ने आधुनिकता का एक बाहरी आवरण सा जरूर ओढ़ रखा है। पश्चिम के कुछ संस्कार भी शायद उनमें आए हैं। पर चित्त के स्तर पर वे अपने को भारतीयता से अलग कर पाए हों, ऐसा तो नहीं लगता। हॉं, हो सकता है कि पश्चिमी सभ्यता के साथ अपने लंबे और घनिष्ठ सम्बन्ध के चलते कुछ दस-बीस-पचास हजार, या शायद लाखेक लोग, भारतीयता से बिल्कुल दूर हट गए हों। पर यह देश तो दस-बीस-पचास हजार या लाख लोगों का नहीं है। यह तो अस्सी करोड़ लोगों की कथा है।

भारतीयता की मर्यादाओं से मुक्त हुए ये लाखेक आदमी जाना चाहेंगे तो यहॉं से चले ही जाएंगे। देश अपनी अस्मिता के हिसाब से, अपने मानस, चित्त व काल के अनुरूप चलने लगेगा तो हो सकता है इनमें से भी बहुतेरे फिर अपने सहज चित्त-मानस में लौट आएं। जिनका भारतीयता से नाता पूरा टूट चुका है, वे तो बाहर कहीं भी जाकर बस सकते हैं। जापान वाले जगह देंगे तो वहॉ जाकर रहने लगेंगे। जर्मनी में जगह हुई तो जर्मनी में रह लेंगे। रूस में कोई सुंदर जगह मिली तो वहॉं चले जाएंगे। अमेरिका में तो वे अब भी जाते ही हैं। दो-चार लाख भारतीय अमेरिका जाकर बसे ही हैं। और उनमें बड़े-बड़े इंजीनियर, डॉक्टर, दार्शनिक, साहित्यकार, विज्ञानविद् और अन्य प्रकार के विद्वान भी शामिल हैं।
पर इन लोगों का जाना कोई बहुत मुसीबत की बात नहीं है। समस्या उन लोगों की नहीं जो भारतीय चित्त व काल से टूटकर अलग जा बसे हैं।


समस्या तो उन करोड़ों लोगों की है जो अपने स्वाभाविक मानस व चित्त के साथ जुड़कर अपने सहज काल में रह रहे हैं। इन लोगों के बल पर देश को कुछ बनाना है तो हमें उस सहज चित्त, मानस काल को समझना पड़ेगा। और भारतीय वर्तमान के धरातल से पश्चिम की बीसवीं सदी का क्या रूप दिखता है, उस बीसवीं सदी और अपने कलियुग में कैसा और क्या संपर्क हो सकता है, इस सब पर विचार करना पड़ेगा। यह तभी हो सकता है जब हम अपने चित्त व काल को, अपनी कल्पनाओं व प्राथमिकताओं को, और अपने सोचने-समझने व जीने के तौर-तरीकों को ठीक से समझ लेंगे.

2 thoughts on “भारतीय चित्त मानस और काल

  1. यह शायद संयोग ही है कि सुबह यहाँ बोलोनिया के स्थानीय पुस्तकालय से गाँधी जी की १९३१ की इटली यात्रा की किताब ले कर आया और अब आप के चिट्ठे में गाँधी जी की यात्रा के बारे में पढ़ा. सुनील दीपक

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  2. बहुत विचारोत्‍तेजक लेख प्रस्‍तुत किया है आपने। धर्मपालजी निरंतर शोधपूर्ण लेखों के माध्‍यम से हमें भारत की आत्‍मा से साक्षात्‍कार कराते रहे।

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