महत्व सही जवाब का नहीं, सही सवाल का है

धर्मपाल

हमारे पैरों के नीचे अपनी कोई जमीन नहीं है। अपने चित्त व काल का अपना कोई चित्र नहीं है। अपनी कोई विश्वदुष्टि नहीं है। इसलिए ठीक-ठाक चलने वाले समाजों के लोग जो बातें सहज ही जान जाते हैं, वही बातें हमें भूल-भूलैया में डाले रखती हैं। राज, समाज व व्यक्ति के आपसी संबंध क्या होते है? किन-किन क्षेत्रों में इनमें से किस-किस की प्रधानता होती है? व्यक्ति-वयक्ति के बीच संबंधों के आधार क्या हैं? शील क्या होता है? शिष्ट आचरण क्या होता है? शिक्षा क्या होती है? सौंदर्य क्या होता है? इस प्रकार अनेक प्रश्न हैं, जिनके उत्तर एक स्वस्थ समाज में किसी को खोजने नहीं पड़ते। अपनी सहज परंपरा से जुड़े और चित्त व काल के अनुरूप चल रहे समाजों में ये सब बातें अपने-आप परिभाषित होती चली जाती हैं। पर हम क्योंकि अपने मानस व काल की समझ खो बैठे हैं, अपनी परंपरा के साथ जुड़े रहने की कला भूल गए हैं, इसलिए ऐसे सभी प्रश्न हमारे लिए सतत खुले पड़े हैं। देश के साधारण लोगों में सही चितंन व सही व्यवहार का कोई सहज विवेक शायद अभी भी बचा ही होगा। लेकिन उन लोगों में भी अब अक्सर दुविधा ही दिखाई देती है। पर अपने भद्र समाज में तो हर स्थान पर हर संदर्भ में विस्मृति और भ्रांति जैसी स्थिति बनी हुई है। सही-गलत का जैसे कोई विवेक ही न बचा है।

मुझे कुछ साल पुरानी एक घटना याद आ रही है। तब आंध्र-प्रदेश के उस समय के राज्यपाल श्रृंगेरी के शंकराचार्य से मिलने गए थे। बातचीत में वर्ण व्यवस्था का कोई संदर्भ आया होगा और श्रृंगेरी आचार्य इस व्यवस्था के बारे में कुछ बताने लगे होंगे। इस पर राज्यपाल ने आचार्य से कहा कि वर्ण व्यवस्था की बात तो मत ही करें। श्रृंगेरी के शंकराचार्य यह सुनकर चुप हो गए। बाद में वे अपने अनुज आचार्य से बोले कि देखो कैसा समय आ गया है? वर्ण पर अब बात भी नहीं की जा सकती।

यह कैसी विचित्र घटना है? बात वर्ण व्यवस्था के सही या गलत होने की नहीं थी। लेकिन राज्यपाल का इस विषय पर चर्चा ही वर्जित करना तो अजीब है। अपनी परंपरा और अपने मानस को समझने वाले किसी समाज में इस तरह की बातचीत की कल्पना भी नहीं की जा सकती। राज्यपाल इतना भी नहीं समझते थे कि समाज संरचना के बारे में धर्माचार्यों को अपने मन की बात कहने से रोका नहीं जाता। और श्रृंगेरी आचार्य भी शायद भूल गए थे कि वे किसी राज्य के प्रति उत्तरदायित्व तो अपनी परंपरा और अपने समाज तक ही सीमित है। अपनी करते रहना उनका कर्तव्य है। वे किसी राज्यपाल को इस अभिव्यक्ति को परिसीमित करने की छूट कैसे दे सकते हैं?

आचार-व्यवहार में सहज विवेक न रख पाने के बहुत से प्रसंग मिलेंगे। श्री पुरूषोत्तम दास टंडन देश के बहुत बड़े और विद्वान नेता थे। स्वराज की लड़ाई में उनकी भागीदारी किसी और से कम नहीं थी। अहिंसा में उनका अटूट विश्वास था। और अहिंसा-पालन की दृष्टि से वे किसी मोची के हाथ के गढ़े चमड़े के जूते पहनने की बजाय बाटा के बने रबड़ के जूते पहनते थे। इसी विचार के और बहुत से लोग रहे होंगे। अब, जीव-हत्या के बारे में इतना सजग रहने की बात तो निश्चित ही बड़ी है। पर अहिंसा केवल जीव-हत्या के निषेध का सिद्धांत तो नहीं है। अहिंसा एक व्यापक जीवन-दृष्टि का अंग है। और उस जीवन-दृष्टि के अनुसार अपनी आवश्यकताओं को अपने आस-पड़ोस के परिवेश से ही पूरा कर लेना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना जीव-हत्या से बचना। इसतिए महात्मा गॉंधी के लिए अहिंसा और स्वदेशी के सिद्धांत एक ही थे। अपने पड़ोस के मोची को छोड़कर बाटा वालों से रबड़ का जूता बनवाने की बात तो अहिंसा और स्वदेशी वाली इस जीवन-दृष्टि के न तत्वबोध से मेल खाएगी, न सौंदर्यबोध से ही।

ग्रामोद्योग और खादी आदि को बढ़ावा देने के लिए हजारों मील दूर बना विशेष सामान बरतने की जो प्रवृत्ति हमारे कुछ भद्र लोगों में आजकल चली है वह भी किसी भी बात के सनातन तत्व और समय-सापेक्ष वाह्य स्वरूप में विवेक न कर पाने का ही उदाहरण है। खादी और ग्रामोद्योग आदि तो स्वदेश के भाव के वाह्य उपकरण मात्र थे। मूल बात तो समाज की जरूरतों को आस-पड़ोस के साधनों और क्षमताओं के माध्यम से पूरा कर लेने की वृत्ति की थी। वह वृत्ति स्वदेशी का तत्व था। उस तत्व को छोड़ हम केवल उपकरणों की पूजा में लग गए हैं।

पर ये तो शायद व्यक्तिगत आचारण भर की बातें हैं। इन बातों में व्यक्तियों से भूल हो जाती होगी। पर हम तो शिक्षा जैसे सामूहिक विवेक के विषय में भी ऐसे ही भूले हुए दिखते हैं। अभी पिछले दिनों सारनाथ में एक गोष्ठी हुई थी। उस गोष्ठी में अनके विद्वान इकट्ठे हुए थे, विद्यालयों के कुलपति थे, दर्शन शास्त्र के ऊंचे प्रोफेसर थे, बड़े-बड़े साहित्यकार थे। वे सब शिक्षा के विषय पर विचार करने के लिए वहॉ पहुंचे थे। सुंदर जगह थी। सारनाथ में बौद्ध ज्ञान का एक बहुत बड़ा संस्थान है, तिब्बतन इंस्टीट्यूट। उसी संस्थान में यह गोष्ठी हो रही थी। और संस्थान के निर्देशक, सम्धोंग रिन-पो-छे, जो स्वयं बहुत ऊंचे विद्वान हैं, वे भी गोष्ठी में बराबर बैठे थे। (तिब्बत में सबसे बड़े आचार्य रिन-पो-छे कहलाते हैं, दलाईलामा भी।)

गोष्ठी के प्रारम्भ में ही यह प्रश्न उठा कि जिसे हम शिक्षा कहते हैं, उसकी कोई परिभाषा है क्या? मैंने ही प्रश्न उठाया कि हम किसे शिक्षा कहते हैं? लिखने-पढ़ने की कला ही शिक्षा है क्या? या कुछ और है? उस समय तो इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं मिला। पर बाद में चौथे दिन, गोष्ठी समाप्त होने से कुछ ही पहले, श्री सम्धोंग रिन-पो-छे से बोलने के लिए कहा गया तो वे इस प्रश्न की ओर मुड़े। उन्होंने कहा कि इस गोष्ठी में चार दिन जो बातें होती रही हैं, उन्हें मैं तो समझ नहीं पाया, क्योंकि मैं तो इस `एजुकेशन´ शब्द के अर्थ को ही नहीं जानता। वैसे अंग्रेजी मुझे ज्यादा आती भी नहीं। हॉं, शिक्षा´ शब्द को तो मैं समझता हूं। और हमारे यहॉ इस शब्द का अर्थ प्रज्ञा, शील और समाधि के ज्ञान से होता है। इन तीन को जानना शिक्षा है। बाकी जो तकनीकें हैं, भौतिक विज्ञान हैं, शिल्प और कलाएं आदि हैं, वे शिक्षा में नहीं आतीं। वे कुछ दूसरी चीजें हैं। उन्हें हमारे यहॉ शिक्षा नहीं माना जाता।

शिक्षा की यह परिभाषा यदि सही है, यदि प्रज्ञा, शील और समाधि के ज्ञान को ही अपने यहॉ शिक्षा माना गया है, तो इसे तो समझना पड़ेगा न? और यह भी देखना पड़ेगा कि इस दृष्टि से हमारे यहॉ कितने लोग शिक्षित हैं। हो सकता है बहुत नहीं हों। हो यकता है केवल आधा प्रतिशत लोग ही प्रज्ञा, शील और समाधि में शिक्षित हों, या शायद पांच प्रतिशत तक ऐसे लोग निकल आएं। लेकिन मान लीजिए कि आधा प्रतिशत ही शिक्षा की इस परिभाषा की कसौटी पर शिक्षित निकलते हैं। पर ये आधा प्रतिशत भी बाकी संसार में प्रज्ञा, शील और समाधि को जानने वालों के मुकाबले पॉंच-दस गुना अधिक बैठते होंगे। शिक्षा की अपनी इस मान्यता के अनुसार हम विश्व के सबसे अधिक शिक्षित लोगों में से होंगे।

या फिर प्रज्ञा, शील और समाधि के ज्ञान को हम शिक्षा नहीं मानते। शायद आचरण और व्यवहार की कला को, जीविका चला पाने की क्षमता को हम शिक्षा मानते हैं। उस दृष्टि से देखें तो भारत के 60-65 प्रतिशत लोग शिक्षित ही निकलेंगे। और अधिक भी शिक्षित हो सकते हैं। पर हो सकता है कि इस दृष्टि से देखने पर हम जैसे 5 प्रतिशत लोग कुछ अशिक्षित ही निकलें। क्योंकि हम जैसों को तो न आचरण आता है, न व्यवहार आता है, न जीविका चलाने की कोई कला आती है।

लेकिन शायद हम आचरण, व्यवहार और काम-धंधे चलाने की क्षमता को भी शिक्षा नहीं मानते। अक्षर ज्ञान को ही शिक्षा मानते हैं, और उस दृष्टि से देखकर पाते हैं कि भारत के 60,70 या 80 प्रतिशत लोग अशिक्षित ही हैं। लेकिन शिक्षा के माध्यम से कैसा अक्षर-ज्ञान हम लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं?
मान लीजिए किसी को खाली भोजपुरी ही लिखनी-पढ़नी आती है उसे हम शिक्षित मानेंगे या अशिक्षित? शायद वह हमें अशिक्षित ही दिखाई देगा। हम कहेंगे कि भई इसे अक्षर ज्ञान तो है, पर भोजपुरी का अक्षर-ज्ञान तो है, पर भोजपुरी का अक्षर-ज्ञान तो कोई अक्षर-ज्ञान न हुआ। इसे तो अच्छी नागरी हिंदी भी नहीं आती। नागरी हिंदी न आए तब तक हम इसे शिक्षित कैसे मान लें?

पर फिर कोई कहेगा कि खाली नागरी हिंदी से भी क्या होता है, अच्छी संस्कृत आनी चाहिए। कोई और कहेगा कि संस्कृत से भी कैसे चलेगा? अंग्रेजी आनी चाहिए, और वह भी शेक्सपीयर वाली ही आनी चाहिए। या आक्सफोर्ड में जो अंग्रेजी पढ़ाई जाती है, या बीबीसी पर जो बोली जाती है, वही अंग्रेजी आनी चाहिए। फिर कोई कहेगा कि हॉ वैसी अंग्रेजी तो इसे आती है। पर अमेरिका में तो यह अंग्रेजी बेकार है। अमेरिका वालों की तो अंग्रेजी ही दूसरी है, और आज संसार में जो चल रही है वह तो अमेरिकी अंग्रेजी है। वह इसे नहीं आती तो इसे अक्षर-ज्ञान तो नहीं हुआ ठीक से। इसे शिक्षित कैसे मान लें?
इस सबके बाद अब हममें से कुछ अमेरिकी-अंग्रेजी सीख जाएंगे तों कोई और कहेगा भई अब तो अमेरिका वालों के दिन भी लद गए। अब तो किसी और के दिन आ रहे हैं। शायद जर्मनी वालों के दिन आ रहे हों, या शायद रूसियों के ही आ रहे हों। हो सकता है कि अफ्राका वालों में से किसी के दिन आ जाएं। या अरबों के ही आ जाएं। तब कहेंगे कि उनकी जो भाषा है उसका अक्षर-ज्ञान हो, तो हम अपने लोगों को शिक्षित मानेंगे। उसके बिना तो हम सब अशिक्षित ही हैं।

यह हम किस चक्कर में फंस गए हैं? इस तरह दुनिया की बहता हवाओं के साथ झुक-झुककर हम कहॉ पहुंचेंगे? हमें इस चक्कर से निकलना है तो अपना कोई स्थिर धरातल खोजना पड़ेगा। अपने चित्त व काल को समझकर, अपने साहित्य की संपूर्णजा का अनुमान-सा लगाकर, एक सैद्धांतिक ढॉचा तो हमें बनाना ही पड़ेगा, ताकि सही-गलत के विवेक का कोई आधार हमें मिल जाए। आचरण की, व्यवहार की, और रोजमर्रा के विभिन्न संबंधों की कुछ सहज परिभाषाएं हो पाएं। अपने हिसाब से चल निकलने का कोई रास्ता निकल पाए।

हो सकता है कि जो सैद्धांतिक ढॉचा हम बनाएंगे, वह बहुत सही या बहुत टिकाऊ नहीं होगा। शायद पॉच-सात साल में अस बदलना नड़ेगा। पर सैद्धांतिक ढॉचे तो सब ऐसे ही होते हैं। ये सब तो व्यक्ति के अपने उपक्रम हैं, परमात्मा के दिए सनातन सत्य जैसे तो वे हो नहीं सकते। सैद्धांतिक ढॉंचे दुरस्त होते रहते हैं, बदलते रहते हैं। भौतिक विज्ञान के मूल सिद्धांत बदल जाते हैं, राजनीति विज्ञान की मौलिक परिभाषाएं बदल जाती हैं, दर्शन-शास्त्र की दिशा बदल जाती है। इस सबमें सनातन तो कुछ नहीं होता। और यदि कुछ सनातन होता है, सैद्धांतिक ढॉंचे के आधार में कुछ मूलभूत सत्य होता है, तो वह सनातन सत्य ढॉंचे के बदल जाने से प्रभावित नहीं हुआ करता। वह तो रह ही जाता है। पर संसार के काम अस्थायी, काम-चलाऊ सैद्धांतिक ढॉचों के आधार पर ही चला करते हैं। वैसा ही एक काम-चलाऊ ढॉंचा हमें अपने चित्त व काल की अपनी समझ का भी बना लेना है।

और यह काम हमें स्वयं ही करना पड़ेगा। बाहर वाले आकर हमें ऐसा कोई ढॉचा बनाकर नहीं दे सकते जो हमारे सहज चित्त व काल के अनुरूप बैठता हो। वे चाहते हों तो भी यह काम नहीं कर पाएंगे। ये काम तो यहीं के लोगों को करने हैं।

भारत के सनातन सत्य का कोई छोर पकड़ लाने की बात मैं नहीं कर रहा। बात तो कोई ऐसा धरातल तैयार करने की है जहॉ खड़े होकर सही प्रश्न पूछे जा सकें। प्रश्न उठाने लगेंगे तो उत्तर भी निकलते आएंगे। या शायद उत्तर नहीं मिलेंगे। पर प्रशनों के उठने से सही रास्ते का कुछ विवेक तो होने लगेगा। सामान्य आचार-व्यवहार में भ्रांति की स्थिति तो नहीं रहेगी।

मद्रास के श्री शिवरमण तो कहते हैं कि प्रश्न पूछते जाना ही भारतीय सत्य-साधना का मूल है। उनका मानना है कि उपनिषदों में उत्तर तो कोई बहुत ठीक नहीं हैं, पर प्रश्न बहुत बड़े हैं। स्मृतियों में भी उनका कहना है कि प्रश्न बहुत ऊंचे हैं। और फिर अपने सभी प्राचीन ग्रंथों में प्रश्नोत्तर के माध्यम से ही तो सब कुछ कहा जाता है।

बाल्मीकि रामायण में एक प्रसंग है। रामचंद्रजी जब चित्रकूट से आगे बढ़ते हैं तो रास्ते में खूब अस्त्र-शस्त्रों से लैस होते चले जो हैं। तब सीता उन्हें कहती हैं कि यह क्या हो गया है अपको? वन में तो ऐसे नहीं रहा जाता। आप तो हिंसा की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। यह तो अच्छा नहीं है। रामचंद्रजी सीता की बात का जवाब जरूर देते हैं। पर वह कच्चा-सा जवाब है। महत्व सीताजी के प्रश्न का ही है। उत्तर का नहीं। बात हिंसा-अहिंसा की वृत्तियों पर और उनके सही संदर्भों पर चितंन करने की है, किसी अंतिम समाधान पर पहुंचने की नहीं।

ऐसे ही नारदपुराण में महिर्ष भरद्वाज और भृगु के बीच एक संवाद है। भरद्वाज पूछते हैं कि आपके अनुसार चतुर्वर्ण-व्यवस्था में एक वर्ण दूसरे वर्ण से सर्वथा भिन्न होता है। पर इस भिन्नता का आधार क्या है? टट्टी, पेशाब और पसीना तो सभी को आता है रक्त, पित्त और कफ आदि भी सभी के शरीर में रचे रहते हैं। फिर उसमें भिन्नता कैसी है? भृगु कहते हैं कि आरंभ में तो सभी एक वर्ण थे। फिर अपने-अपने कर्मो से वे भिन्न होते गए। फिर भरद्वाज पूछते हैं कि कोई ब्राहा्रण या क्षत्रिय या वैश्य या शूद्र कैसे बनता है? भृगु कहते हैं कि कर्मों और गुणों से ही इस प्रश्न का निर्णय होता है। और इस तरह संवाद चलता रहता है।

यहॉं भी प्रश्न का कोई अंतिम समाधान तो नहीं हुआ। पर समाज संरचना के बारे में प्रश्न पूछते रहने, इस विषय पर चिंतन करते रहने, और समय व संदर्भ के अनुरूप कुछ स्थायी-अस्थायी समाधान निकालने रहने का यह तरीका ही शायद भारतीय तरीका है। इसमें महत्व सही सनातन उत्तर पाने का नहीं, सही सटीक प्रश्न उठाने का है। प्रश्न उठाते रहने के उस तरीके को हमने कहॉं खो दिया है? उन बड़े प्रश्नों को उठाना ही हम एक बार फिर शुरू कर दें तो हमारा सहज विवेक लौट ही आएगा।

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