क्या यही हैं द्विखण्डित के विवादित अंश?

तस्लीमा नसरीन के विवादित हो चुके उपन्यास द्विखण्डित के कुछ अंश मैं यहां दे रहा हूं. मुझे नहीं पता कि ये विवादित अंश हैं या नहीं. लेकिन इन्हें पढ़कर अंदाज लगता है कि वह कौन सी आग है तस्लीमा नसरीन के अंदर जिससे कठमुल्लों को इतनी तपिश का अनुभव होता है.

पारलौकिक मूली
पृष्ठ-54
अवाम द्वारा इरशाद हटाओ आंदोलन के दबाव में आकर राष्ट्रपति इरशाद ने सबके सामने पारलौकिक मूली लटका दी है. बिना कुछ कहे बिना कुछ सुने उन्होंने संविधान में एक नयी बात घुसा दी है जिसका नाम है- राष्ट्रधर्म. यानी राज्यधर्म. अब से इस देश का राज्य धर्म होगा इस्लाम. क्या किसी ने मांग की है कि इस्लाम को राज्यधर्म बनाया जाए? नहीं ऐसी मांग किसी ने भी नहीं की थी. क्या देश के मुसलमानों को धर्म पालन में कोई परेशानी हो रही थी कि इसे जातीय धर्म बनाये बिना लोगों का काम नहीं चल रहा था. नहीं ऐसा भी नहीं था. आराम से काम भी चल रहा था और मुसलमान बहाल तबियत थे. अब तक मस्जिद मदरसे गढ़-गढ़ कर देश का बेड़ा गर्क कर रहे थे. लोगों की आंखो में धूल झोकने के लिए जहां-तहां पीर पैदा हो रहे थे. अब इरशाद खुद ही मजहब का ढोल लेकर मैदान में उतर पड़े हैं.

राष्ट्र को क्या कभी किसी धर्म की जरूरत होती है? इंसान को धर्म की जरूरत होती है, मगर क्या देश कोई इंसान है? देश तो सभी संस्कृति सभी भाषा की हिफाजत के लिए होता है. विविध संप्रदायों के बीच देश अगर किसी एक संप्रदाय का पक्ष ले तो उस देश के लोगों में विरोध जरूर सिर उठायेगा. यह अवश्यंभावी है. गैर-मुसलमान इस देश में हिफाजत को मोहताज होंगे. यह भी अवश्यंभावी है. सभ्यता की तरफ बढ़ते हुए पहला कदम जो उठाया जाता है वह है देश को संप्रदायों से अलग करना. सभी सभ्य देशों में यही होता है. जिस युग में धर्म ही राज्य का मूलमंत्र था उसे अंधकार युग कहते हैं. उस युग में लाखों लाख लोगों को जिंदा जला दिया जाता था. इसके खिलाफ बोलने की आजादी भी नहीं होती थी. मुझे आशंका होती है कि यह देश भी धीरे-धीरे अंधकार के अतल गर्त में समाता जा रहा है. मुझे यह भी आशंका होती है कि धर्मनायक ने कालव्याधि के जो कीटाणु छितराए हैं देश की जनता भयंकर रूप से आक्रांत होनेवाली है.

…………………………………………………………………..
पृष्ठ 63

राष्ट्रधर्म इस्लाम को अगर अलविदा नहीं किया गया तो यह देश गणतांत्रिक बांग्लादेश से इस्लामिक प्रजातंत्र बनने में ज्यादा वक्त नहीं लेगा. धर्म तो कैंसर की तरह होता है. एक बार अगर गर्दन पर सवार हो गया तो हाथ के करीब जो भी पाता है एक के बाद एक ध्वंश करता रहता है. इसका कोई इलाज नहीं है. इस्लाम के अलावा बाकी लोगों को दूसरे दर्जे के नागरिक के तौर पर जिंदगी गुजारनी होगी. अगर कोई इस्लाम की प्रेरणा से अल्लाह के हुक्म का पालन करे और सच्चा मुसलमान बनना चाहे तो वह पाक कुरान से सबक ले सकता है. जहां यह लिखा हुआ है कि यहूदी और ईसाई लोगों के साथ यानी विधर्मियों के साथ किसी किस्म की दोस्ती न रखें. अगर उसने ऐसा किया तो अल्लाह उन विधर्मियों के साथ उन्हें भी दोजख की आग में झोंक देंगे. सिर्फ इतना ही नहीं जहां भी विधर्मी मिलें उन्हें खत्म कर दो. अगर कोई अविश्वासी है तो पहली बार उसका बायां हाथ और दाहिना पैर काटो और दूसरी बार उसका दाहिना हाथ और बायां पैर काट दो. औरतों पर धर्म का बुलडोजर चलेगा. औरत औरत नहीं रहेगी, वह टुकड़ों में बंटी एक मांसपिण्ड में तब्दील हो जाएगी.

(द्विखण्डित पुस्तक का हिन्दी अनुवाद वाणी प्रकाशन, दिल्ली ने प्रकाशित किया है. उसी का संपादित अंश. प्रकाशक का दावा है कि इसमें वे सारे अंश भी शामिल हैं जिन पर बांग्लादेश में काफी विवाद हुआ और तस्लीमा को देश छोड़ना पड़ा. )

8 thoughts on “क्या यही हैं द्विखण्डित के विवादित अंश?

  1. विस्फोट में एक और धमाका!!!
    संजय भाई,
    मैं कभी-भी तस्लीमा को एक अच्छा लेखक नहीं मानता मेरे लिए वो एक Publicity hunger वाला व्यक्तित्व ज्यादा दिखता है जैसे हुसैन साहब…
    आग सभी के अंदर होती है पर यह भी देखना एक प्रसिद्ध लेखक या कलाकार का धर्म हो जाता है कि इसका प्रभाव किस रुप में पड़ेगा… और लिखना भी कई प्रकार से होता है एक सीधा प्रहार दूसरा भीतरी… अभी इस समाज को बदलने के लिए थोड़ा प्यार थोड़ा प्रहार ही आवश्यकता है जिसे और ज्यादा लोग समझ सकें बिना कुछ ज्यादा आक्रोश मन में लाये और यही संदेश भी होना चाहिए…।/

    Like

  2. संजय भाई
    बहुत आभार आपकी इस पोस्ट के लिए.मैं बहुत दिनों से तसलीमा के लेखन के बारे में जानना चाहता था,यदि यही सब प्रतिबंधित है तो निश्चित ही सरकार को सभी विध्यालय बंद कर देने चाहिए,क्यों कि यहां जो लिखा है वह तो किसी धर्म विशेष के बारे में नहीं बल्कि कट्टरवाद के बारे मे लिखा है,तसलीमा को साधुवाद

    Like

  3. संजय जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद कि आपने मुझे तसलीमा जी के लेखन के बारे में जानने का मौका दिया…

    अच्छा लगा आपके ज़रिए उन्हें पढकर…

    Like

  4. मुझे तसलीमा जी की केवल एक पुस्तक लज्जा पढ़ने को मिली। कह नही् सकती कि शैली अच्छी लगी।
    वह अन्याय,हिन्दु धर्म के अनुयायियों व उनके मन्दिरों पर प्रहार का कच्चा चिट्ठा था और यह भी बताता था कि चाहे आपने (हिन्दु) बांगलादेश के स्वतंत्रता संग्राम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया हो परन्तु आज के बांगलादेश में आपका कोई स्थान व सम्मान नहीं है । सोचने कि बात यह है कि इस सत्य को भी जग जाहिर करने की आवश्यकता थी । सो संसार में कई और तसलीमाओं की आवश्यकता है ।
    ये पृष्ठ पढ़ाने के लिए धन्यवाद ।
    घुघूती बासूती

    Like

  5. तस्लीमा एक औसत लेखिका हैं। प्रचार प्रिय भी लगती हैं। भारत में एंजॉय कर रही हैं। दरअसल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा उनसे जुड़ा है और मुद्दे का सम्मान होना चाहिए वर्ना उन्हें पढ़ने की ललक अब तक बहुत से लोगों में पैदा नही हुई होगी जो सामान्य से कहीं ज्यादा पढ़ते हैं। यह सही भी है। तस्लीमा अच्छा लिखें या बुरा , उनका विरोध करने वालों ने उन्हें कितना पढ़ा है ये महत्वपूर्ण है। मुझे लगता है विरोध करने वाले कुछ नहीं पढ़ते।

    Like

  6. न इसमें कुछ बैन करने लायक है, न चर्चा करने लायक और न पढ़ने/सराहने लायक।

    Like

  7. तस्लिमा ने माफी माँग ली है. इस्लामवादीयो के जो बुरा लगे वह गलत है, आप खोजते रहो की क्या गलत लिखा है.

    Like

  8. विवादास्पद अंश और भी हैं संजय जी।
    और रही बात उनके पब्लिसिटी की भूखी होने की तो लज्जा पढ़कर पता चल जाता है कि वे सच के लिए लड़ रही हैं। अब सच ही नंगा है तो कोई क्या करे?
    इसी विषय पर मैंने भी कुछ लिखा है। पढ़िएगा।
    http://merasaman.blogspot.com/2007/12/blog-post.html

    Like

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s