तस्लीमा के खिलाफ जारी फतवे की मूल प्रति

तस्लीमा नसरीन के खिलाफ बांग्लादेश के धर्म और देश विरोधी कार्यकलाप प्रतिरोध कमेटी द्वारा जारी फतवे की मूल प्रति जो वहां के सभापति और गृहमंत्री को सौंपी गयी जिसके बाद तस्लीमा को देश-निकाला दिया गया…….

माननीय स्पीकर
बांग्लादेश जातीय संसद
संसद भवन, शेरे बांग्ला नगर
ढाका

जनाब, सम्मान सहित आपसे निवेदन है कि

1.) बांग्लादेश की जनता अंतस की गहराई से धर्मप्राण है और इस देश की समस्त संप्रदायों की आम जनता सांम्प्रदायिक सद्भाव के मामले में अत्यंत सजग और प्रयासरत है. लेकिन कतिपय गुमराह लोग जनगण की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने को प्रगतिशील की पराकाष्ठा का प्रदर्शन मानते हैं. और जनता की धार्मिक चेतना और सांप्रदायिक सद्भाव को नष्ट करने की हीन कोशिशें लगातार हो रही हैं. उनके इस हीन दुष्कर्म के पीछे इस्लाम, बांग्लादेश की आजादी और सामाजिक सुस्थिति के प्रति शत्रु-मुहाल वर्ग की मदद और साजिश काम कर रही है. यह बात आज कहने के लिए किसी प्रमाण की जरूरत नहीं रह गयी है.

2.) तस्लीमा नसरीन नामक एक कुख्यात लेखिका, क्रमिक रूप से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कलाम, किताबें और उपन्यास लिखकर एकाधार में बांग्लादेश के सभी धर्मों की आस्थावान धार्मिक चेतना पर आघात कर रही है. दूसरी तरफ बेहद चतुर और सुपरिकल्पित तरीके से विभिन्न संप्रदायों में पारस्परिक विद्वेष और द्वंद्व रचने के कुप्रयास में लिप्त है.

3.) झूठे और बनावटी तथ्यों पर आधारित गलत और धूर्त इरादे से प्रेरित उपन्यास लज्जा लिखकर इसके जरिए नसरीन इस देश को सर्वजन स्वीकृत ऐश्वर्य समृद्धि पर कालिख पोत रही है और अंतरराष्ट्रीय जगत में बांग्लादेश की भावमूर्ति छोटा कर रही है. देशी-विदेशी कतिपय सांप्रदायिक महल को मुसलमानों को मुसलमानों के खिलाफ प्रतिहिंसा को उकसा रही है. इसके बावजूद सरकार ने सिर्फ लज्जा उपन्यास को ही निषिद्ध घोषित करके कानून सम्मत इंतजाम नहीं किया जबकि तस्लीमा नसरीन के विभिन्न लेखों में बांग्लादेश की आजादी, सार्वभौमिकता और भौगोलिक अखण्डता के खिलाफ अनगिनत उत्तेजक और उकसानेवाले वक्तव्य मौजूद हैं जो साफ-साफ देशद्रोह हैं. सरकार के इस आचरण से देशप्रेमी जनता बेतरह क्षुब्ध और हताश हुई है.

4.) हालांकि संवैधानिक रूप से देश के प्रचलित कानून में बांग्लादेश में रहनेवाले विभिन्न धर्मावलम्बी लोगों की धार्मिक आस्थाओं पर आघात करना और उन लोगों में पारस्परिक विद्वेष फैलाना दंडनीय अपराध है. लेकिन इस किस्म के धर्मविरोधी क्रियाकलापों के खिलाफ शीघ्र और कठोर दण्ड व्यवस्था का विधान नहीं है इसलिए देशद्रोही और धर्मविरोधी महल समूह लापरवाह तरीके से ऐसी कुतर्क चलाए जा रहे हैं और सामाजिक संघात तथा अस्थिरता की आधारभूमि तैयार कर रहे हैं.

5.) बांग्लादेश के 90 प्रतिशत इंसान मुसलमान हैं. लेखिका तस्लीमा नसरीन का अपनी विभिन्न किताबों और लेखों के जरिए पवित्र धर्मग्रंथ कुरान, नबी (स.) की हदीस और इस्लामी शरीयत के विभिन्न विधि विधानों के प्रति अवमानना मूलक कटाक्ष लगातार जारी हैं और उसके ऐसे धर्मद्रोही आचरण के खिलाफ देश के प्रतिनिधि, सभी धार्मिक महाल से जबर्दस्त प्रतिवाद के बावजूद सरकार ने इस मामले में कमजोर कानून का आश्रय लेकर रहस्यजनक तरीके से निस्क्रियता की राह ही अपनायी. नतीजा यह है कि इस देश के धर्मप्राण मुसलमान अत्यंत तर्कसंगत कारण से ही वर्तमान कानून और सरकार के प्रति आस्थाहीन हो गये हैं.

6.) लेखिका तस्लीमा नसरीन सिर्फ धर्म पर ही चोट नहीं कर रही हैं, समाज में प्रचलित सार्वजनिक मूल्यों के विपरीत व्यभिचार, अबाध यौन संबंध, विवाह पूर्व और विवाहेत्तर यौन संपर्क, औरत-मर्द के संबंधों के मामले में तथाकथित पुरूषतांत्रिक जुल्मों की फलती-फूलती कल्पित कहानी का प्रचार करके सामाजिक सुस्थिति नष्ट करने के कुप्रयास में भी लिप्त हैं. उनके लेख अश्लीलता (Pornography) के दायरे में आते हैं. वे इस देश के युवा समाज को उच्छृंखलता और नैतिक विनाश की तरफ धकेलने के षण्यंत्र के अलावा और कुछ नहीं हैं.

ऐसी स्थिति में हम देशीप्रेमी और धर्मप्राण इंसानों की आवेग अनुभूति से हृदय से मांग करते हैं कि

1) देशद्रोही और धर्मद्रोही गुनहगारों के खिलाफ मृत्युदंण्ड समेत कठोर सजा के इंतजाम संबंधी कानून बनाना.
2) तस्लीमा नसरीन की तत्काल गिरफ्तारी और उसके खिलाफ मिसाली सजा सुनाना
3. और उसके विभिन्न आपत्तिजनक लेख जब्त करने का इंतजाम किया जाए.

शैखुल हादिस मौलाना अजीजुल हक

धर्म और देश विरोधी कार्यकलाप प्रतिरोध कमेटी

सात मस्जिद

मोहम्मदपुर, ढाका

फतवे के बारे में तस्लीमा नसरीन लिखती हैं ” देश में कुछ महाभयंकर होनेवाला है. मुझे आहट मिल रही है. सब कट्टर नेता एकजुट हो रहे हैं. बड़ी सड़क, छोटी सड़क, गली-मुहल्ले सब जगह सभाएं हो रही हैं. विषय-तस्लीमा नसरीन………मस्जिद-मस्जिद में तस्लीमा के खिलाफ जंग छेड़ने की घोषणा की जा रही है…….तलवार-ढाल सबकुछ सजा लिया गया है…………… इसी तरह मैं अपनी जान हथेली पर लेकर खड़ी रहती हूं. लोगों की बाढ़ को कभी मेरे घर तक पहुंचने का मौका मिल जाए तो…….? मेरे दरवाजे पर तैनात दो अदद सिपाही क्या इस बाढ़ को रोक सकेंगे?”

(नवंबर, 1993)


चौदह साल बीत जाने के बाद तस्लीमा के लिए स्थितियां कमोबेश वैसी की वैसी ही हैं. ऐसा लगता है कि चौदह साल पहले जारी इस धार्मिक फतवे को अमल में लाने का काम अब कुछ भारतीय कट्टरपंथियों ने अपने हाथ में ले लिया है. अल्लाह तस्लीमा नसरीन की हिफाजत करें.

One thought on “तस्लीमा के खिलाफ जारी फतवे की मूल प्रति

  1. बाग्‍ला देश को छोडिये, अपने देश में ही भेडिये घूम रहे है।

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