भारत की इतिहास दृष्टि और परम्परा

समदोंग रिनपोछे
(निर्वासित तिब्बत सरकार के प्रधानमंत्री)

श्री धर्मपाल जी की स्मृति में हम सब यहां इकट्ठा हुए हैं. सबसे पहले तो मैं उनकी स्मृति में श्रद्धासुमन अर्पित करना चाहता हूं. जिन्होंने मुझे यहां आने का अवसर दिया उन सबका मैं आभार व्यक्त करता हूं. मेरे पास ऐसा कोई विषय नहीं है जो धर्मपाल जी के बारे में सामयिक बैठता हो. धर्मपाल जी के साथ मेरा सत्संग बहुत कम था. फिर भी मैं अनुभव करता हूं कि उनके विचारों और दर्शन का मेरी समझ पर गहरा असर हुआ है. निश्चितरूप से मुझे इसका लाभ हुआ है.

बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो अपनी स्वतंत्र बुद्धि और चित्त के माध्यम से चीजों को यथावत देखने की क्षमता रखते हैं. धर्मपाल जी को मैं एक अद्भुद और विलक्षण इतिहासकार मानता हूं. इतिहासकार इसलिए मानता हूं कि इतिहास को देखना एक कठिन काम होता है. बीते हुए वर्षों को जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो वर्तमान का चश्मा हमारी आंखों पर पड़ गया होता है. वर्तमान के चश्मे को छोड़कर पीछे देखने की क्षमता कम लोगों में होती है. क्योंकि इतिहास के ऊपर राजनीति ही नहीं संस्कार का भी आक्रमण हो चुका है जिससे उबरना सरल काम नहीं है. मैं अपने तिब्बत का इतिहास देखता हूं. 2000 साल से भी कम का इतिहास है. यहां की आबादी कभी 60 लाख से ज्यादा नहीं हुई. फिर भी इतने छोटे से देश और छोटे से काल का इतिहास चीन की दृष्टि से कुछ और है, ब्रिटिश इंडिया की निगाह से कुछ दूसरा है और यथास्थिति में कुछ तीसरा है. आज इस इतिहास को यथार्थरूप से देखने की न तो दृष्टि है और न कहने की हिम्मत.

इस तरह आप भारत जैसे विशाल देश के पांच हजार साल पुराने इतिहास को देखते हैं तो समझ में आता है कि यथार्थ को जानना-समझना बहुत मुश्किल है. क्योंकि समय-समय पर असत्य के धुंधलके का मोटा आवरण चढ़ा दिया गया है. इस धुंधलके के पार जाकर उस इतिहास को फिर से जस का तस देखना हिन्दुस्तान में ऐसे इतिहासकार बहुत कम हुए हैं. इतिहास की दृष्टि ही हमने पश्चिम से लिया. इतिहास को लिखने-पढ़ने की पूरी प्रणाली हमने पश्चिम से आयातित कर ली है. अब जब गलत दृष्टि से ही हम इतिहास को देखते हैं तो हमारा भ्रमित होना स्वाभाविक है. इसमें उस व्यक्ति का दोष नहीं है जो गलत इतिहास पढ़कर भ्रमित हो रहा है. यह स्वाभाविक ही है. उनकी चक्षु ही दूषित हो गयी है.

धर्मपाल जी को पश्चिम के इतिहास प्रणाली की जानकारी थी. फिर भी उन्होंने अपने आप को उसके प्रभाव से दूर रखा. उन्होंने अपनी आंखों पर कोई पर्दा नहीं पड़ने दिया. उन्होंने अपनी इसी साफ दृष्टि से बीते हुए समय को देखने और सत्य को प्रस्थापित करने का काम किया है. उनका इतिहास होना उनका आत्मबोध था. इसलिए मैं उन लोगों का समर्थन करता हूं जो धर्मपाल जी को इतिहासकार के रूप में देखना चाहते हैं. मेरा भी यही दृष्टिकोण है.

कुछ आदरणीय लोग यह सवाल उठाते हैं कि धर्मपाल जी को किस परंपरा में रखा जाए. यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है. लेकिन मेरा दृष्टिकोण इस बारे में थोड़ा भिन्न है. परंपरा के विषय में मैं अपना यह दृष्टिकोण क्षमा-याचना सहित आपके सामने रखना चाहता हूं. धर्मपाल जी परंपरा के आदमी थे. जब कोई परंपरा का आदमी हो जाता है तो वह किस परंपरा का है यह सवाल नहीं उठता है. परंपरा एक ही होती है. कुमारस्वामी जी ने परंपरा के तीन लक्षण बताए हैं. पहला लक्षण है- परमस्रोत से उद्गम होना, दूसरा गुरू शिष्य परंपरा से उसका निर्वहन हो और तीसरा, काल परिवेश के अनुकूल और तर्कसंगत हो. यह परंपरा की परिभाषा है. परंपरा में अंधविश्वास की कोई जगह नहीं होती. यह साधारण चित्त से भी अनुमान लगा लेने की बात भी नहीं होती.

आधुनिक विज्ञान मनुष्य के कुंठित चित्त के प्रयोगों का परिणाम है. क्या होता है? 100 प्रयोग करते हैं और उसमें से 80-90 सही बैठता है तो अनुमान लगाया जाता है कि वह सही होगा. उसको जाना नहीं है सिर्फ मान लिया है. ऐसी मानी हुई अवधारणाओं में गलती और दुष्परिणाम की गुंजाईश हमेशा रहती है. जैसे भगवान को सर्वज्ञान माना गया है. इसी प्रकार वेद की परंपरा है. वेद मनुष्य द्वारा रचित नहीं है, वह परमस्रोत से उद्गम हुआ है. वह वैश्विक ज्ञान का भण्डार है. उसको समझने में, उसकी टीका करने में गलती हो सकती है लेकिन उस ज्ञान में कहीं कोई दोष नहीं है.

धर्मपाल जी परंपरा विद्या में जीनेवाले व्यक्ति थे. इसलिए उनके बारे में यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि वे किस अनुशासन को मानते थे. आजकल ज्ञान के सामने सबसे बड़ी चुनौती विशेषज्ञ लोग हैं. आपकी आंख में दर्द है तो किसी और के पास जाईये और आपके दांत में दर्द है तो किसी और के पास जाईये. जरूरत इस बात की है कि हम यह समझें कि मनुष्य का शरीर एक संपूर्ण संरचना है. इसको इतना खंडित करने की जरूरत क्या है कि हमें इसको टुकड़े-टुकड़े में देखना पड़े? इसलिए विशेषज्ञ का एक मतलब कुएं का मेढक भी होता है. वह अपनेआप को इतने सीमित दायरे में समेट लेता है कि वह पूर्ण ज्ञान से वंचित रह जाता है.

आज हमारी मानसिकता आधुनिकता की कुंठा से व्याप्त है जिसे अंग्रेजी में माईंट कंडिशनिंग कहते हैं. हम सोचते तो हैं अपनी परंपरा से लेकिन वर्तमान वातावरण का प्रभाव तो मन पर होता ही है. इसलिए परंपरा में सोचे गये ज्ञान पर आधुनिक वातावरण की कंडिशनिंग हावी हो जाती है. जैसे आजकल एक कमीशन बना है- नालेज कमीशन. हम उसका अनुवाद कर लेते हैं ज्ञान आयोग. जबकि नालेज और ज्ञान दोनों दो भिन्न बातें हैं. नालेज एक प्रकार की परिकल्पना है जबकि ज्ञान सचमुच जाना हुआ होता है. फिर आजकल ज्ञानवाले लोग मिलते कहां हैं? सभी नालेजवाले लोग मिलते हैं. अगर धर्मपाल के बारे में संस्था बनाने के बारे में सोचते हैं तो एक ज्ञानवाला आदमी चाहिए जो उस संस्था को उसी तरीके से चला सके. नालेजवाला आदमी आ गया तो सब गड़बड़ हो जाएगा.

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