नंदीग्राम पर कब्जे की कहानी

अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में ईस्ट मिदनापुर और वेस्ट मिदनापुर के सीपीएम काडरों की सम्मिलित बैठक हुईं. उस बैठक में ईस्ट मिदनापुर के सांसद और एक राज्यमंत्री भी शामिल थे जो वेस्ट मिदनापुर से चुनकर आते हैं. बैठक का मुख्य विषय था कि 11 महीने से नंदीग्राम सीपीएम के “कब्जे” में नहीं है. उसे वापस कैसे हासिल किया जाए. ध्यान रखिए यहां सीपीएम अपने कब्जे की योजना बना रही है, राज्य सरकार नहीं. पुलिसिया प्रयोग के परिणाम मार्च में अच्छे नहीं आये थे इसलिए राज्य सरकार पर्दे के पीछे से सारे आपरेशन को अंजाम देना चाहती थी. जाहिर है इसके लिए खून-खराबे पर उतारू क्रुद्धदेव पूरी मदद कर रहे थे. सीपीएम सेना तैयार हो चुकी थी. तीन जिलों से कॉडर बुलाए गये जो बंदूक और परंपरागत हथियार चलाने में माहिर थे. पश्चिम मिदनापुर, उत्तर 24 परगना और बंकुरा के ये रणबांकुरे अब आपरेशन नंदीग्राम के लिए तैयार थे.

जनवरी में विरोध की पहली खबरें आने के बाद से ही नंदीग्राम में भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी के लोगों ने अपने बचाव में वे एहतियाती कदम उठा रखे थे जिससे सरकार उनके साथ जोर-जबर्दस्ती न कर सके. जमात-ए-उलेमा-हिन्द के मौलाना मदनी से मुलाकात के बाद बुद्धदेव ने यह संकेत दे दिया था नंदीग्राम में अल्पसंख्यकों की रक्षा होगी. शेखर गुप्ता से बातचीत के दौरान मदनी ने स्वीकार किया था कि उन्हें बुद्धदेव पर भरोसा है. लेकिन जैसा कि पश्चिम बंगाल में प्रचलित है कि बुद्धदेव के दो चेहरे हैं उन्होंने 14 मार्च की हार के बाद अपने उसी दूसरे चेहरे का प्रयोग किया. 14 मार्च के बाद देश का ध्यान दूसरी ओर हट गया तो बुद्धदेव और उनके कॉडर को तैयारी का समय मिल गया.

अगले साल पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव हैं. नंदीग्राम का इलाका सीपीएम के एंटेना से बाहर चला जाए यह कैसे हो सकता था. अक्टूबर में तैयारियों को अंतिम रूप दिया गया. बहुत पहले से बर्दवान के कोल माफियाओं से मिलकर कॉडर ने अपनी तैयारी शुरू कर दी थी. कोल माफिया के पैसे से बिहार और पश्चिम बंगाल के पुरूलिया से हथियार खरीदे गये. प्रदेश के कई डकैत गिरोहों को एडवांस में पैसा देकर नंदीग्राम में लड़ने के लिए तैयार किया गया. उन्हें गोली-बंदूक और अन्य असलहे उपलब्ध करवाये गये. डकैत गिरोहों को आश्वासन दिया गया कि हमले के बाद जो लूट का सामान होगा वे अपने साथ ले जा सकते हैं. चंद्राकोना, गारबेटा, नारायणगढ़ और केशियारी से काडरों के साथ-साथ डकैतों को भी इकट्ठा किया गया.

नंदीग्राम में जो लूटपाट हुई है उसके निशान बाद में ओंदा में देखने को मिले. ओंदा में ऐसी एक मोटरसाईकिल पकड़ी गयी थी जो नंदीग्राम से गायब हुई थी. जगह-जगह से कॉडर और डकैत हथियारों से लैस धीरे-धीरे खेजुरी के आस-पास जमा होने लगे थे. बंकुरा से आनेवाला कॉडर बालीचक स्टेशन पर ही उतर गया. वहां से वह सड़कमार्ग से वह खेजुरी पहुंचा. इसी तरह दूसरे गैंग भी धीरे-धीरे करके खेजुरी के आस-पास जमा होने लगे थे. 2 नवंबर से सरकार ने पुलिस को वहां से हटाना शुरू कर चुकी थी. इसी बीच यह पक्का होने पर कि हमले की तैयारी पूरी हो चुकी है 4 नवंबर को डीवाईएफआई ने खेजुरी के पास हरिया नामक जगह पर एक सभा की. सभा में मांग की गयी कि नंदीग्राम से जिन्हें बाहर निकाल दिया गया है उन्हें फिर से अपने घर लौटने दिया जाए.

असल में यह भी उसी हमले की तैयारी का हिस्सा था.
यहां के आगे नंदीग्राम में क्या हुआ यह सारा देश जानता है.
6 नवंबर को नहरों के रास्ते से हमले की शुरूआत. पहला निशाना संतेगाबाड़ी.
7 नवंबर को कॉडर ने दूसरे गांवों की ओर कूंच किया.
9 नवंबर को माकपा गुंडो का सोनाचुरा पर कब्जा
11 नवंबर को नंदीग्राम के सभी 30 गांव माकपा द्वारा फतह.
12 नवंबर को माकपा ने एक विजय जूलूस निकाला. इसमें सबसे आगे उन महिलाओं और बच्चों को रखा गया जिन्हें इस संक्षिप्त गृहयुद्ध में विजित किया गया था.

(विभिन्न स्वतंत्र रपटों पर आधारित)

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