विस्फोट

जवाहर लाल कौल हिन्दी के सम्मानित पत्रकार हैं. उस समय वे रामजन्मभूमि परिसर में ही मौजूद थे जब विवादित ढांचा गिराया गया. रामजन्मभूमि विवाद पर उन्होंने एक किताब लिखी “विस्फोट” जिसे राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया था. उसी विस्फोट पुस्तक से छह दिसंबर का आंखों-देखा हाल. . . .

6 दिसंबर 1992 यानी मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष द्वादशी. सुबह छह बजे से ही कारसेवक बड़ी संख्या में अपने शिविरों से निकलकर रामजन्मभूमि परिसर की ओर आने लगे थे. रामकथाकुंज और फैजाबाद से आनेवाली सड़क के रास्ते कारसेवकों का दबाव काफी ज्यादा था. नौ बजे से पहले ही विवादित क्षेत्र के नीचे विशाल जनसमूह दिखने लगा था. नौ बजे लालकृष्ण आडवाणी, भाजपा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी, राजमाता सिंधिया और दूसरे नेताओं के आने पर खलबली जरूर मची लेकिन पूजा-अर्चना की तैयारी के साथ ही वह थम भी गयी. इस बीच विश्व हिन्दू परिषद के नेता और प्रमुख संत भी आ चुके थे. पास में ही मानव भवन धर्मशाला की ओर से कारसेवकों का एक दल आग्रह करने लगा कि उन्हें परिसर में जाने दिया जाए. वे दरअसल वहां भगवा झंडा लगाना चाहते थे. वे नारे लगाने लगे, कुछ युवक नाचने भी लगे. लेकिन उस समय मानस भवन से देखनेवाले पत्रकार यह नहीं देख पाये कि यह नृत्य एक भूकंप की पूर्वसूचना है. फिलहाल तो आयोजकों ने माईक पर संयम रखने की अपील की और नाचनेवाले युवकों को वहां से खदेड़ दिया.
लेकिन पंद्रह मिनट बाद ही फिर तेज नारेबाजी के साथ कारसेवकों में आगे आने की होड़ शुरू हो गयी. दरअसल दक्षिण के प्रसिद्ध संन्यासी विश्वेशतीर्थ अपने बहुत से समर्थकों के साथ आ पहुंचे थे. इससे बजरंग दल और संघ के स्वयंसेवकों का नियंत्रण कुछ ढीला पड़ गया था. अबकी बार कारसेवकों ने बड़ी संख्या में एक दूसरा ही नारा लगाना शुरू कर दिया. “मिट्टी नहीं खिसकाएंगे, ढांचा ही गिरायेंगे.” मानस भवन में पहले से खड़े कारसेवक उनका उत्साह बढ़ा रहे थे. माईक से लालकृष्ण आडवाणी और राजमाता सिंधिया ने फिर अनुरोध किया कि कारसेवक ऐसा कुछ न करें जो तय कार्यक्रम के विरूद्ध हो. लेकिन इसका उतना असर नहीं हुआ. कुछ स्वयंसेवकों ने उन्हें खदेड़ना शुरू किया जो विवादित क्षेत्र में घुस गये थे. इस हाथापाई में कुछ कारसेवक गिर गये. मानस भवन के कारसेवकों में इसकी उलटी प्रतिक्रिया हुई. वे चिल्लाकर कारसेवकों को आगे बढ़ने के लिए कहने लगे. पीएसी और स्थानीय पुलिस आगे आई और कारसेवकों पर लाठियां बरसाने लगी. प्रशासन ने अचानक रामलला के दर्शन पर रोक लगा दी तो मामला और बिगड़ गया. क्रोध की लहर फैल गयी और नेताओं के खिलाफ नारे लगने लगे. भीड़ ने पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया. शुरू में सीआरपीएफ और पीएसी के जवान ढांचे को घेरे रहे और लाठियों का प्रयोग भी किया. लेकिन अब तक ढांचा चारों ओर से घिर चुका था और सभी ओर से पथराव करती भीड़ आगे बढ़ रही थी. सबसे पहले पीएसी के जवान वहां से हटने लगे. फिर ढांचे की सुरक्षा के लिए तैनात अर्धसैनिक बलों की टुकड़ियां वहां से हटने लगीं.

दोपहर होते-होते कारसेवक ढांचे के प्रांगण में प्रवेश कर चुके थे. एक कारसेवक एक गुंबद पर चढ़ गया था. उसकी देखा-देखी कई कारसेवकों ने चढ़ाई शुरू कर दी. कहीं से रस्से भी वहां पहुंच गये जिनका उपयोग चढ़ाई करने में किया गया. आधे घंटे में लगभग चालीस पचास कारसेवक तीनों गुंबदों पर चढ़कर उन्हें तोड़ने लगे थे.

इसी दौरान नीचे भी बहुत कुछ होने लगा था. कुछ कारसेवकों ने गर्भगृह से रामलला और दूसरे देवताओं की मूर्तियां वहां से हटा लीं. मानस भवन में कारसेवकों और पत्रकारों में झड़पें होने लगीं. कुछ कारसेवक चाहते थे कि पत्रकार फोटो न लें. लेकिन फोटोग्राफर और विडियोग्राफर अपने व्यावसायिक अधिकार की दुहाई दे रहे थे. यह विवाद जल्द ही मारपीट और छीना-झपटी में बदल गया. कैमरे टूटने लगे और कई पत्रकारों को चोटें भी आईं.
दोपहर एक बजे तक पूरे परिसर में कारसेवक घुस आये थे. पुलिस बेबस या उदासीन खड़ी देखती रही. पास में बने पुलिस पोस्ट में भी कारसेवक भर गये थे. अर्धसैनिक बलों के जवान भी वहां से हटकर सुरक्षित स्थानों की ओर चले गये. जिला अधीक्षक ने जिस रैपिड एक्शन फोर्स को फैजाबाद पुलिस मुख्यालय से बुलवाया था वह यहां तक पहुंची ही नहीं. अयोध्या-फैजाबाद मार्ग पर कई जगह आग लगा दी गयी जिससे यह मार्ग पूरी तरह से अवरूद्ध हो जाए. सड़क पर जगह-जगह तेल बहा दिया गया था. यही हाल दूसरे रास्तों का भी था. भीड़ जगह जगह रास्ता रोके खड़ी थी. कई जगह कारसेवक सड़क पर ही लेट गए थे.

गुंबद टूटने से पहले ही कुछ कारसेवक जल्दबाजी में नीचे गिरकर घायल हो गये थे. लेकिन इससे कारसेवकों का जोश कम नहीं हुआ. गुंबद तोड़ने की जैसे प्रतिस्पर्धा लग गयी थी. सवा दो बजे पहला गुंबद टूटकर गिर गया. इसके साथ ही दर्जन भर कारसेवक भी गिरकर घायल हो चुके थे. नीचे खड़े कारसेवकों और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने तुरंत फौजी रेडक्रास की भूमिका निभानी शुरू कर दी. स्ट्रेचरों का काम खाटों से लिया जाने लगा था और सायरन की जगह संघ की शाखाओं में इस्तेमाल की जानेवाली सीटियां प्रयोग की जा रही थीं.
तीन बजे दूसरा गुंबद गिरा और लगभग साढ़े चार बजे तीसरा गुंबद भी गिर गया. कारसेवकों ने ढांचे की चारदीवारी को पहले ही तोड़ दिया था. यह नजारा देखनेवालों में सुप्रीम कोर्ट के पर्यवेक्षक तेजशंकर भी थे. उन्हें यह देखने के लिए भेजा गया था कि अयोध्या में कारसेवा के नाम पर कोई निर्माण तो नहीं हो रहा है. लेकिन अयोध्या में उस दिन निर्माण नहीं ध्वंश हुआ.

विवादित ढांचे का गिरना पूरे अभियान का पहला चरण था. राम मंदिर के दूसरे चरण पर काम शुरू हो चुका था. कारसेवक बाहरी दीवार टूटने के साथ ही मलबा हटाने का काम शुरू कर चुके थे. साढ़े चार बजे मीर बाकी द्वारा लगवाया गया पत्थर कुछ कारसेवक लेकर वहां से चले गये. गुंबद के ऊपर बने पत्ते के कमल के आकार के टूटते ही जैसे पूरी अयोध्या में बिजली सी कौंध गयी हो. शंख बजने लगे. घंटे और घड़ियालों की आवाज से पूरा अयोध्या मुखर हो उठा. यह सब केवल कारसेवक ही नहीं बल्कि स्थानीय मंदिरों में दूर-दूर तक यही हो रहा था. इस जुनूनी आलम में चोटी के नेता कहां चले गये किसी को नहीं मालूम. क्योंकि अब यहां पुलिस, पर्यवेक्षकों के अलावा कोई दर्शक नहीं था. सब कुछ न कुछ काम कर रहे थे.

तीसरे गुंबद के गिरने के साथ ही दो घंटे के अंदर रामलला की मूर्ति की पुनस्थापना कर दी गयी. इतने ही समय में यहां से मलबा हटाया जा चुका था और भूमि समतल हो चुकी थी. बाकी गुंबदों का मलबा भी तेजी से हटाया जा रहा था. रात को ही रामलला के ऊपर एक शामियाना लगा दिया गया. कुछ कारसेवक पत्थर का फर्श बना रहे थे तो कुछ चारों ओर ईंट की दीवार. यह काम अगले अड़तालीस घंटे तक चलता रहा. ढांचे के ढह जाने के तीस घंटे के अंदर ही नये राम मंदिर का निर्माण हो चुका था. वैसे यह मंदिर पत्थरों की पक्की फर्श पर बिना छत के ईंट की दस फुट ऊंची चारदीवारी ही है जिसके ऊपर एक शामियाना खड़ा किया गया है. मंदिर तक जाने के लिए कुछ सीढ़ियां भी बना दी गयीं जिन पर लिखा है – हिन्दू विजय दिवस, छह दिसंबर, 1992.

दरअसल बाबरी ढांचे को ढहाने के बाद अस्थायी मंदिर का निर्माण ज्यादा महत्वपूर्ण घटना है. बाद की घटनाओं से यह बात साबित हो जाती हैं कि न तो मंदिर अस्थायी है और न ही उससे निकलनेवाली तरंगे. छह और सात दिसंबर की रातें अयोध्या के लिए अभूतपूर्व थीं. अयोध्या ने तीन दिन के अंदर ध्वंस और निर्माण का कभी न भुलाया जानेवाला इतिहास लिख दिया था.

5 thoughts on “विस्फोट

  1. बीबीसी की तर्ज पर इसके साथ अगली सन्दर्भ कड़ी में बाबर द्वारा मंदिर को तुड़वाकर मस्जिद बनाए जाने का ऐतिहासिक विवरण भी दें तो निष्पक्ष पत्रकारिता कही जाएगी।

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  2. किसी काम को करने में शताब्दियाँ लगा दें तो वह काम व्यर्थ हो जाता है. बाबरी गिराने में बहुत देर कर दी थी.

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  3. छह और सात दिसंबर की रातें अयोध्या के लिए अभूतपूर्व थीं.
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    निश्चय ही। इसके परिणाम दूरगामी होंगे। भारत का धार्मिक रसायन शास्त्र बदल दिया है इस घटना ने।

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  4. बाबरी ढांचा के ध्‍वस्‍त होने के बाद ही इस देश में भारत केन्द्रित बहस की शुरूआत हुई। बुद्धिजीवियों को जमीनी अहसास हुआ। छद्म धर्मनिरपेक्षता धराशायी हुआ। राष्‍ट्रवाद प्रबल हुआ। सचमुच 6 दिसंबर को राष्‍ट्रीय पुनर्जागरण का शंखनाद हुआ था। विचारोत्‍तेजक लेख प्रस्‍तुत करने के लिए आपको हार्दिक साधुवाद।

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  5. लोगों के अलग-अलग विचार होंगे लेकिन मेरा यही मानना है कि यह एक शर्मनाक घटना थी। लेख पढ़वाने के लिये शुक्रिया!

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