काली माई की किरिया, हमन ने मस्जिद नाही तोड़ी

तसलीमा नसरीन
(द्विखण्डित उपन्यास का एक अंश)

अगले दिन आठ दिसंबर को सुबह चाय पीते हुए अखबार पलट रही थी.
बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के बाद अशांत भारत में खूनी दंगा. दो सौ से ज्यादा मरे, कई हजार घायल. आरएसएस, शिवसेना समेत कई कट्टरवादी संगठनों पर प्रतिबंध. मस्जिद के दोबारा निर्माण का फैसला. लोकसभा के विरोधी पक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी का इस्तीफा.

बाबरी मस्जिद ध्वस्त किये जाने की घटना पर राजधानी ढाका समेत समूचे देश में गुस्सा फैला हुआ था. जगह-जगह से तोड़ फोड़ और आगजनी की सूचनाएं मिल रही थीं. 25 लोग गोलियों के शिकार. तीन सौ से अधिक घायल. शेख हसीना का बयान छपा था कि किसी भी कीमत पर शांति कायम रखें. मंत्रीपरिषद की विशेष बैठक में भी देशवासियों से शांत रहने की अपील की गयी थी. बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के विरोध में चटगांव में जमात शिविर द्वारा विभिन्न मंदिरों में तोड़फोड़, आगजनी और लूटपाट. परिस्थिति काफी तनावपूर्ण.

पूरी खबर पढ़ने का वक्त नहीं था. अस्पताल भागना पड़ा. बाबरी मस्जिद हमले के विरोध में पूरे देश में हड़ताल है. हड़ताल होने के बावजूद कई रिक्शे आ जा रहे थे. मैं पैदल-पैदल चलती हुई, शांतिबाग से मालीबाग आ पहुंची. वहां से मैंने एक रिक्शा ले लिया. चूंकि इतनी सुबह-सुबह हड़ताली लोग सड़कों पर नहीं उतरे थे मैं आराम से पहुंच गयी. अस्पताल के इमरजंसी वार्ड में पिछले दिन से ज्यादा भीड़. मार खाए हुए, गोली खाये हुए, छुरा खाये, चोट खाये जख्मी लोगों की भीड़. हड़ताल होने के बावजूद भीड़ में कोई कमी नहीं थी. हड़ताल होने के बावजूद कंधों पर घायलों को उठाये हुए लोग अस्पताल की ओर चले आ रहे थे. आज भी आपरेशन का काम खत्म करके मैं इमरजेंसी में चली आई. एक-एक इंसान की एक-एक कहानी. जो लोग बातचीत करने की हालत में थे उनसे पूछताछ करके मैंने पता कर लिया कि उन पर हमला कैसे हुआ. हाथों में लाठी, कुल्हाड़ी, छुरी लिए आतताइयों ने इन्हें अपना निशाना क्यों बनाया?

सुबोध मण्डल कुछ बोलने-बताने की हालत में नहीं था. वह तकलीफ से तड़प रहा था. उसके सिर से धार-धार खून बह रहा था. कुल्हाड़ी उस सिर फोड़कर अंदर घुस गयी थी. मैंने उसका घाव पोंछकर बैण्डेज लगा दिया. जल्दी से उसको एण्टीटिटनेस का इंजेक्सन लगाकर उसे सेलाईन वाटर चढ़ाया और आक्सीजन का ट्यूब भी फिट कर दिया.

इसके बाद उसे स्ट्रेचर पर लिटाते-लिटाते मैंने उससे पूछा कि क्या वह उन लोगों को पहचानता है जिन्होंने उसके ऊपर हमला किया है. जवाब उसकी पत्नी गायत्री ने दिया. उसने बताया “पहिचाने काहें नहीं हूं. ऊ लोगन हमरे मुहल्ले के ही थे- अब्दुल, रफीक, हलीम, शहीदुल……

“आप लोगों को मारा क्यों? क्या गलती कर दी थी?”

गायत्री ने दबी-दबी जुबान में कहा कि “कहत रहे कि हम लोगन ने मस्जिद तोड़ी है.” इतना कहकर वह फफककर रो पड़ी और मेरा हाथ कसकर थामे-थामे उसने कहा – “ए दिदिया हमन ने कउनो मस्जिद नहीं तोड़ी. मोरी बात का विसवास करें. दिदिया काली माई की किरिया हमन ने मस्जिद नहीं तोड़ी.”

“तुम्हें मालूम है वे लोग किस मस्जिद की बात कर रहे थे.”

“हम का जानूं, कऊन मस्जिद. हमका नाहीं मालूम. हम रिक्शे पर सीता के बप्पा के साथ आ रहे थे, तब तो बहुतेरी मस्जिद देखत आयी, कऊनो मस्जिद टूटी नहीं थी.”

“तुमने बाबरी मस्जिद का नाम नहीं सुना?”

उसने पूरी अनभिज्ञता में अपना सिर हिलाया.

मैंने फिर पूछा – तुम्हे पता है बाबरी मस्जिद कहां है?

गायत्री को नहीं पता था. वह हाथ जोड़कर विनती करती रही कि किसी तरह मैं उसके पति को बचा लूं. उसका पति बाबू बाजार में आलू तरकारी बेचता है. अगर पति को कुछ हो गया तो उसे मय बच्चों को भूखों मरना पड़ेगा. डॉक्टरों ने काफी कोशिश की लेकिन उसके पति को नहीं बचा सके. वह अपने पति के लाश के सामने पथराई सी काफी देर बैठी रही. लेकिन वह ज्यादा देर वहां बैठ भी नहीं सकती थी. और-और घायल आते जा रहे थे. उसे बरामदे से हट जाना पड़ा.

One thought on “काली माई की किरिया, हमन ने मस्जिद नाही तोड़ी

  1. बहुत असरदार भाग अंश है। अत्‍यंत दुख की बात है कि इतनी स्‍पष्‍ट लेखिका को सब कुछ सहना पड़ा है। लेखन में सेंसर लगाने से साहित्‍य जगत का, विशेषकर हम पाठकों का बहुत नुक़सान होगा।

    Like

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s