गरीबी रेखा के नीचे

जब आप किसी समस्या का अति सरलीकरण करना चाहें तो एक रेखा खींच दीजिए. समस्या वाला हिस्सा अलग हो जाएगा. फिर आप केवल उस हिस्से पर केन्द्रित हो जाते हैं जहां समस्या है. अब आप टुकड़ों में समस्या सुलझाते चले जाईये. हो सकता है किसी दिन आपको संतोष हो जाए कि आपने समस्या को न केवल पहचाना बल्कि उसका समाधान भी कर लिया. लेकिन ऐसी परिस्थितियों में हमेशा यह होता है कि मूल में समस्या अछूती रह जाती है और जिसे सुलझाने का आप दावा करते हैं वह उस हिस्से की समस्या होती है न कि मूल समस्या.

फिर हम आप टुकड़ों में बंटें लोग तो हैं नहीं. हम सबका स्रोत तो एक ही है. इसलिए मूल में समस्या भी एक ही होनी चाहिए. यह तो हमारे बंटवारे की मानसिकता है जो समस्या को अलग-अलग करके देखती है. हम मानें न माने हम एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. और यह पूरा पर्यावरण हमसे जुड़ा हुआ है. यह समग्र है. सर्वात्म में एकात्म है. फिर समस्याएं अलग-अलग कैसे हो सकती हैं? जब उद्गम का स्रोत एक, धरा एक तो समस्याएं अलग-अलग कैसे हो सकती हैं? आप तकलीफ में हों तो मुझे आराम कैसे आ सकता है? क्या केवल एक रेखा खींचकर संवेदनाओं और अनुभूतियों का बंटवारा हो सकता है?

मूल में तो हम ऐसे नहीं हैं. फिर भी हम रेखा खींच देते हैं. इन्हीं रेखाओं में एक रेखा है- गरीबी रेखा. हमारे समाज में एक ऐसी रेखा खिंच गयी है या खींच दी गयी है जो मनुष्य को दो हिस्सों में बांटता है. एक वह जो अमीर है दूसरा वह जो गरीब है. अमीर होने के लिए आपके पास क्या कुछ होना चाहिए इसकी भारतीय परिभाषा पर फिर कभी बात करेंगे लेकिन जो साधन संपन्न हैं वे अपने आप को अमीर मानते हैं. जिनके पास साधन नहीं है वे गरीब लोग हैं. अब अमीर होने के लिए जरूरी है कि गरीब उन साधनों को इकट्ठा करे जिससे वह अमीरों की श्रेणी में आ सके.

लेकिन जिसे हम गरीब कहते हैं क्या वे सचमुच गरीब हैं? या गरीब वे हैं जो अपनेआप को अमीर कहते हैं? अभावग्रस्त कौन है और भावपूर्ण कौन है? यूएनडीपी इन बातों पर कभी सोचता नहीं इसलिए ह्यूमन डेवलपमेन्ट इंडेक्स बनाते समय वह इस बात की गणना करता है कि कितने घरों में टीवी है, कितने घरों में अखबार पढ़ा जाता है, कितने घरों में फ्रीज है और कितने घरों गाड़ी है इत्यादि. कितने लोग अंग्रेजी दवाओं का कितना उपयोग करते हैं. अगर आप औसतन अंग्रेजी दवाओं का हजार रूपये मासिक उपयोग करते हैं तो WHO और यूएनडीपीUNDP दोनों की नजर में आपका स्वास्थ्य इंडेक्स बहुत अच्छा है. आप टीवी रखते हैं तो ही आप मनुष्य होने की श्रेणी में आते हैं. अन्यथा आपको पिछड़ा घोषित कर दिया जाता है.

यूएनडीपी या फिर अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं जो नहीं बोलती वह यह कि ये सब इंडेक्सिंग के पीछे का हेतु क्या है? आप जितना ज्यादा उपभोग करते हैं उतना ही आप दुनियाभर की बड़ी कंपनियों के लिए व्यवसाय तैयार करते हैं. तो अगर आपको विकसित होना है तो आपको कंपनियों को अमीर बनाना चाहिए. यह काम यूएनडीपीUNDP के जिम्मे है कि वह दुनिया में ऐसा माहौल तैयार करे कि कंपनियों को व्यवसाय के लिए आधारभूमि विकसित हो. दुनियाभर की सरकारें उनको इस काम में मदद करती हैं. भारत सरकार भी उन्हीं के बताये दिशानिर्देशों पर सारी योजनाएं बनाती है.

गरीबी रेखा भी एक ऐसी ही विभाजन रेखा है जो यह बताती है कितने लोग कंपनियों के प्रभाव में आ गये हैं और कितनों को अभी आना है. हमारी पत्रकार बिरादरी, बुद्धिजीवी तबका और नीति-निर्माता चिल्ला-चिल्लाकर अपने आप को ही गाली देते हैं कि हम बहुत पिछड़े हुए हैं क्योंकि हम ह्यूमन इंडेक्स में बहुत नीचे हैं. हम तनिक भी इस बात का अंदाज नहीं होता कि हम किसे गाली दे रहे हैं और क्यों? क्या कोई आसमान में मुंह करके थूंकता है कि वह थूंक अपने ही मुंह पर वापस आ गिरे? लेकिन इस देश का पढ़ा-लिखा समाज इस बात का अभ्यस्त है. दुनिया की कंपनियों की लाबिंग करनेवाली संस्थाओं के कहने पर हम अपने ही लोगों को गाली देते हैं, उनको पिछड़ा बताते हैं और अपने ही मुंह पर थप्पड़ मारकर विद्वान बन जाते हैं.

जो अभावग्रस्त हैं उनको अभावग्रस्त कौन बनाता है? हम सब अपने ही लोगों को लूटते हैं और फिर गाली देते हैं कि हमारे देश में इतने गरीब हैं. गरीबी हटाने के नाम पर हम लूट की योजनाएं बनाते हैं और थोड़े और गरीब समाज में जोड़ देते हैं. खेती-बाड़ी अपने बूते हो तो विकास नहीं है. लेकिन आप कंपनियों की बनाई खाद, कंपनियों के बनाये उपकरण और कंपनियों के द्वारा बेचे जा रहे बीज का उपयोग करने लगें तो आप विकसित हो जाते हैं. लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में होता यह है कि समाज का एक बड़ा हिस्से के हाथ से रोजी छिन जाती है. कारीगर गायब होने लगते हैं और मजदूर पैदा होने लगता है. उद्यमशीलता का नाश होने लगता है और व्यवसाय का बोलबाला हो जाता है.

इस देश में कोई गरीब नहीं है. जो गरीब दिखते हैं एक-दो पीढ़ी पहले तक वे समाज के किसी हिस्से की अनिवार्य जरूरत थे. अब हमने यूएनडीपी और न जाने कितनी विदेशी सलाहकार संस्थाओं के कहने पर ऐसी अर्थव्यस्था विकसित कर दी कि वे बेकार ही हो गये. हर कोई शहर की ओर भाग रहा है. गांव में जो रह गये वे भी अपने उद्यम से कट गये. अपने संस्कारों से मुक्त हो गये. अपने ज्ञान की धरोहर से अलग हो गये. अब तो हर किसी को टाई पहननी है. अंग्रेजी बोलनी है और लूटपाट के उस खेल में शामिल होना है जिसे व्यवसाय कहा जाता है. हम अपनी ही जड़ों से कट गये हैं फिर भी हमारी गलढिठाई देखिए कि हम चिल्लाकर कह रहे हैं कि विकास हो रहा है.

6 thoughts on “गरीबी रेखा के नीचे

  1. हमारी गलढिठाई देखिए कि हम चिल्लाकर कह रहे हैं कि विकास हो रहा है.
    **************************
    अच्छा क्या हो रहा है और क्या होना चाहिये? मैं पुन: पूछना चाहूंगा – भविष्य का क्या ब्ल्यूप्रिण्ट होना चाहिये?

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  2. “जो अभावग्रस्त हैं उनको अभावग्रस्त कौन बनाता है? हम सब अपने ही लोगों को लूटते हैं और फिर गाली देते हैं कि हमारे देश में इतने गरीब हैं.”

    आप ने एकदम सही बात कही है !

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