जीवंत समाज प्रतिरोध करता है

ज्ञानदत्त पाण्डेय जी कहते हैं इंन्क्रीमेन्टल इंप्रूवमेन्ट हो तो उसका विरोध करने का क्या तुक है? इस अंग्रेजी शब्द का अनुवाद करें तो यह उस उम्दा बनावट की तरह होगा जहां आप रद्दे पर रद्दा रखते हुए एक बेहतर भवन खड़ा करते हैं. मैं सतत विकास और अक्षय विकास जैसे बनावटी शब्दों का सहारा नहीं लूंगा. ये सब अंग्रेजी के अनुवाद हैं जो नकल करके हमने उसी तरह अपनी शब्दावली में शामिल कर लिया है जैसे इस बात को कि विकास के लिए हमारे पास एक ब्ल्यू-प्रिंट होना चाहिए. एक रूपरेखा होनी चाहिए. यह सभ्य समाज की निशानी है. कोई भी प्रगतिशील समाज अपने विकास के लिए कुछ तो रूपरेखा तैयार करता है? क्या भारतीय समाज के पास कोई रूपरेखा है?

भारतीय समाज के पास तो रूपरेखा है जो तमाम हमलों के बावजूद बना हुआ है, लेकिन भारत देश के पास इस तरह की कोई अपनी रूपरेखा नहीं है. जब से भारत सरकार का शासन शुरू हुआ है उसने अपने यहां कभी देखा ही नहीं. कभी हम रूस की रूपरेखा उठा लाये तो कभी अमेरिका की और आजकल नया-नया उदाहरण चीन है. हम हर बात में चीन का उदाहरण देने लगे हैं. हम क्या हैं, हमारी सोच क्या है और हमारी जरूरत क्या है इसका विचार कभी ठीक से हुआ ही नहीं. नकल का एक अंतहीन सिलसिला चला आ रहा है. इसी बीच कुछ लोग ऐसे होते हैं जो भैरवी राग छेड़ देते हैं कि यह सब जो हो रहा है वह ठीक नहीं है. हमें अपने हिसाब से ही सोचना चाहिए. अपनी जरूरतों के हिसाब से नीतियां बनानी चाहिए और उसका पालन करना चाहिए.

ज्ञानदत्त पाण्डेय जिस इंन्क्रीमेण्टल इंप्रूवमेन्ट की बात कर रहे हैं वह इसी प्रक्रिया से आता है. आज जो कुछ हमारे देश में हो रहा है उसकी प्रक्रिया बिल्कुल उलट है. यहां पहले आविष्कार होता है आपको यह बताया जाता है कि यह आपकी जरूरत है. समाज द्वारा नियंत्रित व्यवस्था और बाजार द्वारा संचालित व्यवस्था में यही फर्क होता है. समाज जरूरत के हिसाब से उपकरणों को ईजाद करता है बाजार उपकरणों के हिसाब से जरूरतों का निर्माण करता है. सत्ता हस्तांतरण के बाद से ही हमनें यह भ्रम पाल रखा है कि भारत एक आजाद देश है और हम कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र हैं. सार्वभौम और संप्रभु राष्ट्र जैसे शब्दों को इतनी बार घुट्टी की तरह मथ लिया है कि सचमुच यह भ्रम होने लगा है कि हम एक आजाद मुल्क हैं.

हकीकत में हम ज्यादा सूक्ष्म गुलामी में जकड़ते जा रहे हैं. पहले शरीर पर बंधन का आभास था इसलिए बुद्धि से लड़ लेते थे. अब बुद्धि में ही हेर-फेर हो गया है इसलिए बेड़ियां भी उत्थान की सीढ़ियां लगने लगी हैं. अगर हम यह मान लें कि हम भारतीय नहीं हैं तो कहीं से कोई पीड़ा नहीं होगी. सुन्न पड़ गये चमड़े पर कितने भी आपरेशन करो उसे क्या फर्क पड़ेगा. सुन्न तो सुन्न. लेकिन अगर उसमें तनिक भी प्राण होगा तो वह प्रतिरोध करेगा. अपने होने का प्रमाण देगा. कोई भी समाज इसी तरह से व्यवहार करता है. अगर वह जीवंत है तो उसमें प्रतिरोध होगा. वह आसानी से आंख मूंदकर सबकुछ स्वीकार नहीं करता. उसकी जांच-परख की एक प्रक्रिया होती है.

आज जिसे विकास बताकर देश को मूर्ख बनाया जा रहा है इसकी पृष्ठभूमि बहुत पहले बन गयी थी. शायद सौ-सवा सौ साल पहले जब यूरोप के बाजार विशेषज्ञों ने अपने विश्वविद्यालयों और तकनीकि संस्थानों में पूरब के लोंगों को प्रवेश देना शुरू किया. उनका आंकलन था कि किसी समाज में पैठ बनानी है तो उसमें बौद्धिक भेद पैदा करना बहुत जरूरी है. पूरब में पश्चिम की यह स्थाई घुसपैठ थी. हमारे ही बीच से कोई विदेश पढ़कर लौटता है तो वह हमारे बीच का होने के बावजूद हमारा नहीं होता. वह वहां की विद्या के साथ लौटता है और हम उसके नयेपन के नाम पर आंख मूंदकर स्वीकार कर लेते हैं और कोई जांच-परख भी नहीं करते. ऐसा इसलिए क्योंकि यह बतानेवाला कोई बाहरी नहीं है. हमारे ही बीच का कोई अपना है. हमारे ही जैसे रंग-रूप वाला.

अंग्रेज तो बाहरी दरवाजा धड़ाम से बंद करके चले गये लेकिन वे कभी भी गये नहीं. वे यहीं रहे. सिर्फ उन्होंने अपना लिबास बदल लिया. रंग-रूप बदल लिया. काम करने का तरीका बदल लिया और अपने अंश उन्होंने कई-कई रूपों में हमारे बीच स्थापित कर दिया. उनकी चिकित्सा, उनका विज्ञान, उनकी शिक्षा, उनकी बाजार व्यवस्था, उनकी शासन व्यवस्था, उनकी संस्कृति, उनका मनोरंजन सबकुछ हमने अंगीकार कर लिया. हम मानने लगे कि हम यही हैं. हमारा अपना क्या है हमारे पास? आज हम कुछ भी करें करने का तरीका हमारा अपना होता ही नहीं है. अब तो हंसने-बोलने और लहजे में भी हमने अपने तरीकों को छोड़ दिया है. हम अपनी खुशी भी बड़े पाश्चात्य तरीके से जाहिर करते हैं. हम अपने त्यौहारों का पुछल्ला जरूर पकड़े हुए हैं लेकिन उसके मनाने के तरीके भी हमारा अपना नहीं रहा.

यह सब होता चला गया और हमारी चेतना लगातार दबती चली गयी. समाज का जो सक्रिय वर्ग है वह पूरी तरह से अंग्रेज है. जो मूलरूप से भारतीय सोच-समझ से जीवन जीता है उसे पिछड़ा घोषित कर दिया गया है. उसके विकास की योजनाएं बन रही हैं. जिसका सीधा सा मतलब है कि हम तो मानसिकरूप से गुलाम हैं ही उन्हें भी गुलामी की बेड़ी में जकड़ देना चाहते हैं जो अभी अपनी जरूरते अपने हिसाब से पूरी कर लेते हैं. ऐसे जीवंत समाज की तकनीकि, समझ और ज्ञान-विज्ञान सबकुछ नष्ट करने की कसम खा रखी है हमने.

6 thoughts on “जीवंत समाज प्रतिरोध करता है

  1. आख़िर हमें समझना होगा की यह विकास है क्या और किनके लिए है.?

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  2. सही है। इस स्थिति में बदलाव के लिए ठोस उपायों की भी चर्चा कीजिए।

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  3. आपका लेख बहुत कुछ सोचने को बाध्य करता है ।
    घुघूती बासूती

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  4. समाज का जो सक्रिय वर्ग है वह पूरी तरह से अंग्रेज है—-

    बात सही है । पर क्या वाकई वह वर्ग सक्रिय है ? या सक्रियता का छलावा है ? और वाकई जो सक्रिय हैं वे बेकार और फिज़ूल लगते हैं ।न जाने विकास की कौन सी मुख्यधारा में इन्हें मिलाना चाहते हैं। आदिवासियों से उनके जंगल,ज़मीन छीनकर उन्हें मज़दूरी करवा कर पूंजीपति और आधुनिक सामंतों के खज़ाने भरवाना चाहते हैं । आपकी चिंता बिलकुल जायज़ है ।

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  5. संजय जी.. बोल हल्ला के लिए लिखा गया आपका लेख बहुत पसंद आया. अनुभव का इतना परिष्कृत स्वरूप मैंने कम ही देखा है.. जैसा आप में है

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