विशेषज्ञ का मतलब होता है कुएं का मेंढ़क

जिस दबड़े(Cabin) में बैठकर मैं काम करता हूं वहां एक वाक्य लिख रखा है- “जो अपने मुताबिक जीवन जी रहा है, वही सफल है.” सफलता नापने का यह मेरा अपना पैमाना है. क्योंकि मैं आपकी नजर में सफल नहीं होना चाहता. मैं अपनी नजर में सफल होना चाहता हूं. अपनी नजर में ऊंचा उठना चाहता हूं. आप मेरे बारे में क्या सोचते हैं इससे मुझे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. खुद के बारे में मेरी कैसी धारणा है, इससे मुझे फर्क पड़ता है.

मैं देखता हूं लोग दूसरों की नजर में बड़ा बनना चाहते हैं. हर कोई चाहता है कि दूसरा कोई उसे बड़ा माने. व्यक्ति चाहे जैसा हो, चाहता यही है कि उसका व्यक्तित्व बहुत अच्छा हो. हमारे बहुत से संस्थान व्यक्तित्व विकास (Personality Devlopment) के नाम पर पैसा पीटते हैं. और हमें यह झूठ पढ़ाते हैं कि आपको कैसे हंसना चाहिए, कैसे बोलना चाहिए, कैसे उठना चाहिए, कैसे बैठना चाहिए. आपके मन में भले ही किसी के लिए अंदर से गुस्सा भरा हो लेकिन ऊपर से आप हंसते हुए ही बात करिए. अगर आप थोड़ा आधुनिक जीवन जीते हैं तो ऐसी नकली हंसी आपको सब-ओर दिख जाती होगी. फिर भी बात यहीं तक हो तो ठीक है. लेकिन एक बार हम व्यक्ति और व्यक्तित्व में फर्क करना सीख जाते हैं तो अपने ही अंदर इतने विभाजन पैदा कर लेते हैं कि मूल ही खो जाता है.
यह विभाजन हमें पेशेवर बनाती है और यह पेशेवराना अंदाज हमें विशेषज्ञता की ओर ले जाता है. अगर कोई केन्द्र को पकड़ ले और कहे कि वह विशेषज्ञ है तो बात समझ में आ सकती है. लेकिन संकट है. जिसको केन्द्र मिल जाता है वह यह समझ जाता है कि आप विशेषज्ञ हो ही नहीं सकते. किस बात के विशेषज्ञ? जो है ही नहीं उसका विशेषज्ञ कोई कैसे हो सकता है? लेकि यहां तो केन्द्र की भी बात नहीं है. जो थोड़ा-बहुत जान जाता है वह अपने आप को विशेषज्ञ घोषित कर देता है. परिधि पर मंडरानेवाले जीव ही अक्सर अपने आप को विशेषज्ञ घोषित करते हैं झोलाछाप डॉक्टर की तरह.

“विशेषज्ञता हमें अल्पज्ञ बनाती है. हमें सीमित करती है. हमारा दमन करती है और हमारे अंदर एक ऐसा झूठा अहंकार भर देती है जिसके आगोश में हम प्रतिपल घुटकर मरते रहते हैं.”

विशेषज्ञता हमें अल्पज्ञ बनाती है. हमें सीमित करती है. हमारा दमन करती है और हमारे अंदर एक ऐसा झूठा अहंकार भर देती है जिसके आगोश में हम प्रतिपल घुटकर मरते रहते हैं. यह अंत इसलिए शुरू हो जाता है क्योंकि हमारा सीखना बंद हो जाता है. आप अपने आस-पास देखिए हर समय सबकुछ बदल रहा है. एक क्षण पहले जो था वह अगले क्षण नहीं होता है. कल जो था वह आज नहीं है, और आज जो है वह कल नहीं रहेगा. हम स्वयं हम नहीं रहते. हमारे विचार वही नहीं रहते. वे तो क्षण-क्षण बदलते रहते हैं. कल हम जिसे ठीक मानते थे, आज उन्हीं में हमें खोट नजर आने लगा है. कल मैं जिसे अच्छा इंसान समझते थे आज वह हमें धोखेबाज लगता है. हमारी चेतना के हर तल पर नित परिवर्तन होता रहता है.
ऐसे में कोई विशेषज्ञ हो जाए तो क्या कहना चाहिए? मैं तो मानता हूं विशेषज्ञ का एक अर्थ होता है जड़ता. ठहर जाना. और अपने आप को एक हिस्से में समेट लेना. जो लोग विशेषज्ञ होते हैं उनका उपयोग दूसरे लोग भले ही कर लेते हों लेकिन वे खुद कभी खुलकर नहीं जी पाते. ऐसा करते हुए उनकी विशेषज्ञता आड़े आती है.

जीवन तो पूर्णता है. थोड़ी-बहुत जानकारी रखकर विशेषज्ञा का ढोल पीटने से अच्छा है कि हम जीवन को पूर्णता में देखें. हमारे हर प्रकार के ज्ञान का एक ही स्रोत है. स्रोत से नाता ठीक बना रहे तो विशेषज्ञता की जरूरत नहीं होगी. पेट पालने के लिए हम सबको कुछ न कुछ करना ही होता है. कोई डाक्टर बन जाता है, कोई इंजीनियर, कोई वकील तो कोई कुछ और. यह सब करते हुए इसी में उलझ जाना जीवन के असली लक्ष्य को खो देने जैसा है. हमारा पेशा हमारे ऊपर भारी हो जाए तो हमसे ज्यादा बदकिश्मत इंसान कौन हो सकता है?

8 thoughts on “विशेषज्ञ का मतलब होता है कुएं का मेंढ़क

  1. मान्यवर, सदियों से पेट हमारी हर चीज़ पर भारी रहा है….आपकी बातें सर्वथा सत्य हैं, लेकिन चारा क्या है?

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  2. ज़बरदस्त.. पूरी सहमति..
    आप के दफ़्तर में जब सफलता का यह सूत्र देखा था.. तो ही बहुत अच्छा लगा था..

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  3. “जीवन तो पूर्णता है. थोड़ी-बहुत जानकारी रखकर विशेषज्ञा का ढोल पीटने से अच्छा है कि हम जीवन को पूर्णता में देखें.’

    आपके कथन का अनुमोदन करता हूँ. इसी कारण मैं “होलिस्टिक” (पूर्णता की ओर उन्मुख) चिकित्सा पद्धतियों का प्रचार करता हूँ.

    आज कई दिनों के बाद आपके चिट्ठे पर आने का मौका मिला. अच्छा लगा. यह नया अवरण बहुत गजब है. बधाई !

    मेकाले का कथन आपको कहां मिला. उसी का एक अन्य कथन मैं ने एक लेख में दिया है जो जल्दी ही सारथी पर आयगा.

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  4. बहुत दूर तक मैं आपसे सहमत हूँ…आपका सूत्रवाक्य भी काम का है….मैं उसी पर अब तक अमल कर रहा हूँ…जब प्लॉप हो जाएगें तो देखा जाएगा…

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  5. “जो अपने मुताबिक जीवन जी रहा है, वही सफल है.” — बहुत सच है और इसी बात पर चलने में जीवन जीने का आनन्द है. हाँ कार्यक्षेत्र में इस बात को किस प्रकार लागू किया जाए यह सोचने वाली बात है..

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  6. संजय भाई सूत्र भी अच्छा है , आपका चिन्त भी बढ़िया। सहमत हैं।
    हैडर बहुत अच्छा लग रहा है। बधाई।

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