स्वाभिमानी समाज की शब्दावली में कर्ज शब्द नहीं होता

मध्य प्रदेश का बड़वानी जिला अपने प्रसिद्ध जैन तीर्थ के लिए जाना जाता है. इसी बड़वानी जिले में मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर एक छोटा सा गांव है अजंदी. कुल 100 परिवारों का गांव हैं. पाटीदार समाज के लोगों की बहुलता है. भारत के भूमण्डलीकण के 15 सालों की उपलब्धि की चर्चा हम लोग करते हैं लेकिन कभी बड़वानी जैसे प्रयोगों की ओर नहीं ताकते जो केवल विकास ही नहीं बल्कि अपने आप में एक नया जीवन दर्शन सबके सामने रखते हैं. हो सकता है उन्होंने भारत सरकार के भारत निर्माण के बारे में न सुना हो लेकिन 100 परिवारों के इस समूह ने जो कर दिखाया है वह इस बात की ओर संकेत है कि भारतीय समाज की समृद्धि के बीज शायद भूगर्भ में आज भी शेष हैं जिससे रह-रह कर पौध निकल आती है.

10 साल पहले यहां के लोगों ने आपस में मिलकर तय किया कि वे गांव और समाज के विकास के लिए मिलजुल कुछ करेंगे. तय किया गया कि हम जो कुछ पैदा करते हैं उसका सौंवा हिस्सा समाज के नाम पर निकालकर अलग रखेंगे. मुख्य रूप से यहां गेहूं, कपास, सोयाबीन और मिर्च की खेती होती है. व्यक्तिगत रूप से अलग किया गया यह सौंवा हिस्सा धीरे-धीरे एक जगह जमा होने लगा. सालभर में जो कुछ जमा होता उसके लिए एक कोश बना दिया गया. धन हो तो विकार उसके साथ चला ही आता है. यह विकार न पनपे इसलिए कोष भगवान राम के नाम पर तैयार किया गया. अब निजी जीवन का यह सौंवा हिस्सा किसी व्यक्ति का नहीं बल्कि सबका है. और जो सबका होता है उसका मालिक तो कोई अलौकिक शक्ति ही होती है. इंसान तो सिर्फ ट्रष्टी होता है.

दस सालों में इस कोष से मंदिर का जीर्णोद्धार ही नहीं किया गया एक सार्वजनिक धर्मशाला बनवायी गयी जिसका उपयोग पूरा गांव और जरूरत होने पर आस-पास के लोग भी करते हैं. अब तक 35 लाख रूपये से भी अधिक कोष में इकट्ठा हो चुका है. अब उसी मालिक का भव्य मंदिर बनाया जा रहा है जिसकी प्रेरणा से यह कार्य शुरू हुआ. आज यह गांव 35 लाख की मिल्कियतवाला गांव है जो साझा संपत्ति है. गांव के बड़े-बुजुर्ग इस कोष का उपयोग करने के रास्ते बताते हैं. जहां व्यवसाय नहीं बल्कि जरूरतों का ध्यान रखा जाता है. लेकिन सबसे चौंकानेवाली और प्रेरक बात है इनके द्वारा किया जा रहा धन का पुनर्वितरण. यह पैसा कर्ज के रूप में बंटता है लेकिन वैसे नहीं जैसी कर्ज की हमारी अवधारणा बन चुकी है.

2001 से 2004 के बीच मध्य प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में सूखा पड़ा. यहां भी सूखा पड़ा. पाटीदार समाज ने तय किया कि कर्ज पर ब्याज चार प्रतिशत नहीं बल्कि दो प्रतिशत लिया जाएगा. चार सालों तक यही व्यवस्था चली. स्थिति बेहतर हुई तो पुनः कर्ज पर व्याज बढ़ाकर चार प्रतिशत कर दिया गया. इसके लिए न प्लानिंग कमीशन की मंजूरी लेने की जरूरत थी और न ही प्रेसवालों को बयान जारी करना पड़ा कि हम ऐसा कर रहे हैं. उनका समाज, उनकी जरूरतें और उनके ही द्वारा बनाये गये रास्ते. जब आप अपने लिए ही काम कर रहे हों तो किसी और को बताने की जरूरत ही क्या है?

यह गांव उनके लिए भी एक उदाहरण है जो यह मानते हैं कि बिना कर्ज की व्यवस्था को मजबूत बनाए देश का विकास नहीं हो सकता. योजनाएं तो प्लानिंग कमीशन को ही बनानी चाहिए. सरकार को और जवाबदेह होना चाहिए और वित्तिय कंपनियों को ज्यादा से ज्यादा कर्ज बांटना चाहिए. एक लाख किसान मर गये उसके मूल में एक ही बात थी कि उन्होंने बड़ी वित्तीय कंपनियों से कर्ज लेकर खेती में निवेश किया और फसल ठीक नहीं होने पर सारा नुकसान उन्हें ही उठाना पड़ा. वित्तीय कंपनियों ने कर्ज दिया था इसलिए उन्हें वापस चाहिए ही था. उन्होंने दबाव बनाना शुरू किया तो आत्महत्याओं का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जो अभी भी जारी है. सरकार ने राहत के नाम पर सिर्फ इतना किया है कि कुछ इलाकों में कर्ज वसूली पर थोड़े वक्त के लिए रोक लगा दिया था. कुछ जगहों पर ब्याज माफ कर दिया था और वित्तीय कंपनियों को जो पैसा देना था वह सरकार ने खुद जमा कर दिया.

वित्तीय कंपनियों को ब्याज का पैसा सरकार से मिल गया और मूल जस का तस बना हुआ है जिसे किसी न किसी दिन उस किसान के वंशजों को चुकाना ही पड़ेगा. तो विकास के इस खेल में सबसे ज्यादा फायदे में कौन रहा? जाहिर सी बात है कंपनियों को सबसे अधिक फायदा हुआ. उनके मूल धन पर उगाही जारी है. सरकारी इंडेक्स में हमारी जीडीपी में दशमल कुछ प्रतिशत का इजाफा हो गया होगा क्योंकि कंपनियों का सारा एकाउंट आडिट होता है. इसलिए सरकार ने जो क्षतिपूर्ति की वह एक तरह का व्यवसाय हो गया. क्योंकि यह व्यवसाय आडिटेड है इसलिए यह हमारी जीडीपी में जुड़ गया होगा. सरकार भी खुश हो जाती है कि आखिरकार जीते-जी न सही मरकर ही किसानों ने उसके विकास इंडेक्स में कुछ इजाफा कर दिया.

बड़वानी के पाटीदार हमें रास्ता दिखा रहे हैं कि असल में किसी भी सभ्य और स्वाभिमानी समाज की शब्दावली में कर्ज शब्द नहीं होना चाहिए. स्वाभिमानी समाज में दूसरे की जरूरतों को पूरा करने के लिए जो शब्द संजोकर रखा गया है वह है मदद. समाज का कोई हिस्सा कमजोर हो जाए तो उसे मदद करके उबार लिया जाता है कर्ज देकर दबाया नहीं जाता. इसीलिए एक अघोषित व्यवस्था हर तरह के समाज में होती थी कि अपनी कमाई का एक निश्चित हिस्सा आप समाज के लिए खर्च करेंगे. अब पढ़े-लिखे लोग तो कर्ज लेने का गणित सीख गये हैं, जो अभी भी पढ़ाई के प्रभाव से दूर हैं वे बड़वानी के पाटीदारों की तरह ही खुद से अपने उत्थान की सीढ़ियां बनाते हैं. उन्हें किसी कर्ज देनेवाली सरकार और बैंक की आवश्यकता नहीं होती.

One thought on “स्वाभिमानी समाज की शब्दावली में कर्ज शब्द नहीं होता

  1. संजय जी, आपने बड़ा ही प्रेरक लेख प्रस्तुत किया है. इसे सभी को पढ़ना चाहिए. मध्यप्रदेश का मैं भी हूँ और वहाँ की ग्वालियर-रीवा पट्टी के किसानों की हालत तो महाराष्ट्र के किसानों से भी बदतर है. सूखे का यह लगातार चौथा साल है. वे इसलिए जी रहे हैं कि मौत आती नहीं. आत्महत्या कराने जैसा कर्ज का बोझ भी नहीं है क्योंकि व्यावसायिक खेती का यहाँ प्रचलन नहीं है. धान-गेहूँ-चना-मसूर-अरहर-मटर-तिली-सरसों जैसी फसलें ही यहाँ प्रमुखता से होती हैं जिनके बीज ‘बाढी’ पर उधार मिल जाते हैं. फिर भी सरकारी सोसाइटियों के कर्ज चुकाने में यहाँ का किसान असमर्थ है. किसान कार्डों के जरिये सरकार ने उन्हें भी शहरी इलाकों के क्रेडिट कार्डों जैसे चक्रव्यूह में डाल दिया है.

    बड़वानी के पाटीदारों से हर गाँव सबक ले सकता है. प्रयास करना चाहिए कि ज्यादा से ज्यादा पंचायतें वहाँ जाकर उनके काम के तरीके को समझ सकें.

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