दातुन करना पिछड़ापन है तो ब्रश करना?

सालभर पहले की बात है. कोलगेट-पामोलिव कंपनी के आला अधिकारी तमिलनाडु के एक गांव का दौरा करने गये थे. यह उस सर्वेक्षण का हिस्सा था जिसमें इस बात की जांच चल रही थी कि कंपनी के कोलगेट ब्राण्ड का देश में कितना प्रभाव हुआ है. गांव में कई बुजुर्गों के दांतों की जांच की गयी. बुजुर्गों के दांत दुरूस्त निकले. वे चना-मटर जैसी ठोस चीजें भी खा रहे थे और गन्ना भी चूस रहे थे लेकिन उन्होंने कभी ब्रश नहीं किया था. ब्रश करना तो दूर उन्होंने कभी कोलगेट का नाम भी नहीं सुना था. अधिकारी वापस चेन्नई लौट आये. कई दिनों तक इसी बात पर बहस होती रही कि बिना कोलगेट के भी दांत स्वस्थ रह सकते हैं क्या?

कोलगेट 200 साल पुरानी कंपनी है और इसकी शुरूआत विलियम कोलगेट ने न्यूयार्क में की थी. आज मल्टीब्राण्ड बन चुकी यह कंपनी शुरूआती दिनों में मोमबत्ती और साबुन बनाती थी. अकेले भारत में यह 9500 मिलियन रूपये का कारोबार कर रही है. पिछले 70 सालों से वह देश में व्यापार कर रही है और आज देश के 35 लाख दुकानों पर सीधी अपनी पहुंच रखती है. यह सब उसकी इस रणनीति का परिणाम है कि हर मुंह में कोलगेट का ब्रश घुसना चाहिए. बहुत हद तक वे इस रणनीति में सफल भी हैं. लेकिन यह सफलता केवल कोलगेट की रणनीति और व्यावसायिक चातुर्य की वजह से नहीं आयी है. इसके लिए उन बहुत सारे लोगों ने ज्ञात-अज्ञात रूप से मदद की है जो आधुनिकता के पैरोकार हैं. आप जानना चाहते हैं कैसे?
सबसे पहले बात करते हैं फिल्मों की. ज्यादातर हालीवुड की नकल करनेवाली हमारी हमारी फिल्म इंडस्ट्री ने यह बात हमारे दिमाग में घुसा दी कि गंवई का मतलब होता है दातुन करना. अब हमारे अवचेतन मन में यह बैठ गया है कि दातुन करनेवाला आदमी तो गंवई और पिछड़ा होता है. इसी तरह हजारो-लाखों बार देखे गये विज्ञापनों से हमने यह मान लिया है कि दांत के विशेषज्ञ लोग कहते हैं कि कोलगेट करने से दांत मजबूत होता है. बिना किसी वैज्ञानिक उपकरण के हम उन कीटाणुओं को भी देख सकते हैं कि इनका स्वरूप कैसा होता है. यह सब एक मनोवैज्ञानिक आक्रमण है जिसमें आखिरकार हम पराजित हो जाते हैं. और मान लेते हैं कि हमें अपने दिन की शुरूआत राम नाम से नहीं बल्कि कोलगेट से करनी चाहिए.

लेकिन आखिरकार हम क्या करते हैं? सुबह-सुबह उस प्लास्टिक को चबाते हैं जो निसंदेहरूप से खतरनाक होता ही है. इस प्लास्टिक के टुकड़े जिसे ब्रश कहा जाता है, पर पेस्ट का कुछ हिस्सा लगा दिया जाता है. पेस्ट बनाने के लिए आमतौर पर कैल्शियम डाई फास्फेट के लिए मरे हुए जानवरों की हड्डियों का चूरा, आपको आदत लग जाए इसके लिए आर्सेनिक नामक रसायन और झागवाला बनाने के लिए डिटर्जेन्ट मिलाया जाता है. थोड़ी मात्रा में निकिल और सीसा भी मिलाया जाता है जिससे यह तापमान रोधी हो जाए और गर्मी में पिघले नहीं और सर्दी में जमे नहीं.

आप ही बताईये मूर्ख कौन बन रहा है? पिछड़ा हुआ कौन है? वह जो दातुन करता है या फिर वह जो सुबह-सुबह बाथरूम में ब्रश रगड़ता है?
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उपयोगी लिंक
दांतो की देखभाल, हल्दी के साथ अन्य वनस्पतियां

5 thoughts on “दातुन करना पिछड़ापन है तो ब्रश करना?

  1. आपने तो झकझोर दिया साहब.
    अब तो शायद इसे बंद ही करना पड़े.
    जानकारीपूर्ण लेख के लिए धन्यवाद.

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  2. वाकई चौंकाने वाली जानकारी है पर क्‍या करें हम जैसे शहरातियों के सामने कोई विकल्‍प भी तो नहीं. आपके पास कोई विकल्‍प हो तो अवश्‍य अवगत कराएं.

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  3. संजय जी ,आप की बात एक दम सही है।ब्रुश करने से फायदा कम ही होता है। जबकि गाँव के दातुन करने वाले के दाँत ज्यादा मजबूत और देर तक साथ देते हैं।

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  4. भैया नीम के पत्ते सुखाओ और करो दातुन देखें कैसे कोई दांत खराब होता है

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