भाजपा की कीमत पर आडवाणी की दावेदारी

(रामबहादुर राय)

10 दिसंबर की सुबह राजनाथ सिंह ने संसदीय बोर्ड के एक वरिष्ठ सदस्य को सूचित किया कि शाम को एक बैठक है, आप अवश्य रहिए. पूछने पर कि अचानक यह बैठक क्यों? पहले भाजपा अध्यक्ष ने टाल दिया फिर कहा कि शाम को मैं आपको फोम करता हूं. गुजरात के चुनाव के ठीक एक दिन पहले संसदीय बोर्ड की बैठक का कोई तुक नहीं था. इसलिए सदस्यों को यह समझ में नहीं आया कि इस संसदीय बोर्ड की बैठक का क्या तुक है? सदस्यों को यह नहीं मालूम था कि सुबह मोहनराव भागवत और सुरेश सोनी की लालकृष्ण आडवाणी से भेंट हो चुकी थी. संघ के दो आला-अधिकारियों से बातचीत में निर्णय हो चुका था. संसदीय बोर्ड की इस आनन-फानन बैठक में सिर्फ उस निर्णय पर मुहर लगवानी थी.

बैठक में राजनाथ सिंह ने प्रस्ताव रखा. कुछ लोगों के मन में सवाल रहा ही होगा इसलिए साथ में यह भी कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी इससे सहमत हैं. इसके बाद वहां किसी प्रकार के विवाद की गुंजाईश नहीं थी इसलिए लालकृष्ण आडवाणी को लोकसभा के अगले चुनाव में पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया. इस निर्णय के मर्म को समझने के लिए भाजपा के इतिहास को समझने की जरूरत है. जैसे यह कि 12 साल पहले जो फैसला लालकृष्ण आडवाणी बिना किसी की सलाह के कर सकते थे वैसा ही फैसला राजनाथ सिंह करने में असमर्थ दिखे. याद करिए कि 1995 में लालकृष्ण आडवाणी ने मुंबई में अचानक यह घोषणा कर दी थी कि जब भाजपा की सरकार बनेगी तो अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री होंगे. इस पर बहुत अनुकूल प्रतिक्रिया नहीं हुई थी. महीनों आडवाणी को इस पर सफाई देनी पड़ी थी. लेकिन उस फैसले से वे एक नैतिक नेता बनकर उभरे. नैतिक शक्ति का पहला तत्व त्याग होता है. माना गया कि यह आडवाणी का त्याग है क्योंकि अयोध्या आंदोलन के बाद भाजपा कार्यकर्ता आडवाणी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते थे.

आज की भाजपा पूरी तरह से बदली हुई है. इसे न तो राजनाथ सिंह छिपाना चाहते हैं और न ही यह कोई रहस्य है कि भाजपा में प्रधानमंत्री पद के अनेक दावेदार हैं. कुछ लोग इस अभियान में लगाये गये थे. भोपाल की कार्यसमिति में वाजपेयी का कथित पत्र उसी का एक मामूली हिस्सा था. उस घटना से राजनाथ सिंह और आडवाणी में ऐसी ठनी कि जोर-आजमाईश के दांव-पेंच सोचे जाने लगे. राजनाथ सिंह को अध्यक्ष पद से हटाने की तैयारी हो गयी थी. गनीमत यह हुई कि भैरों सिंह शेखावत अध्यक्ष बनने के लिए राजी नहीं हुए. ऐसे में उन लोगों के लिए यह आसान हो गया कि लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया जाए.

आडवाणी के बारे में उनके “थिंकटैंक” टीम ने बहुत सारे मिथक गढ़े हैं. उन मिथकों से ही आडवाणी की एक छवि बनती है जिसके निहितार्थ रूप में लौह-पुरूष, स्पष्ट सोचवाला, दूरदर्शी राजनेता, महामानव की क्षमतावाला और ऐसी ही अनेक विशेषताओं से विभूषित व्यक्तित्व की छाप साधारण आदमी के मन पर छोड़ने का प्रयास किया जाता है. इसी प्रयास में नया तर्क बीते कुछ महीने में जुड़ा था कि अगला चुनाव आडवाणी के लिए अंतिम अवसर होगा इसलिए उनके लिए ऐसी परिस्थिति बनाई जाए कि वे विकल्प की धुरी बन सकें. गुजरात चुनाव के मौके पर की गयी घोषणा से कई निशाने साध लिये गये हैं. पहला यह कि अगर भाजपा गुजरात चुनाव में जीतती है तो उसमें इस घोषणा का भी असर माना जाएगा. कहा जाएगा कि लालकृष्ण आडवाणी के लिए गुजरात ने अपना जनादेश सुनाया. दूसरा यह कि नरेन्द्र मोदी को दिल्ली का दावेदार नहीं बनने देना है. तीसरा प्रधानमंत्री पद पर चली आ रहीं अटकलबाजी खत्म हो. और चौथा यह कि जो लोग अटल बिहारी वाजपेयी के नाम की ओट में सत्ता के तीर चला रहे हैं, उन्हें ललकारना है.

जाहिर है लालकृष्ण आडवाणी का एक अतीत है. उसके दो हिस्से हैं. पहला चमकदार हिस्सा है जो प्रेरित करता है. वह उनके त्याग और तपस्या का दस्तावेज है. पर यह भी हकीकत है कि यह ऐसा अतीत है जिसपर हाल के विवाद, लांछन और आरोपों की छाया पड़ गयी है. इसी का परिणाम है कि वे ऐसे नेता की श्रेणी में पहुंच गये हैं जो किसी भी प्रकार से सत्ता में पहुंचने की ताक में गिद्धदृष्टि लगाये रहते हैं. भारतीय जनता पार्टी की राजनीति भोथरी हो गयी है. उसे धारदार बनाने वाला कोई नेता फिलहाल नहीं है. अब आडवाणी में भी वह कूबत नहीं बची है कि वे कोई उफान-तूफान पैदा कर सकें.
रामबहादुर राय जाने-माने पत्रकार हैं.
(फोटो-साभार)

3 thoughts on “भाजपा की कीमत पर आडवाणी की दावेदारी

  1. अपने राय साहब क्या गोविन्दजी को चाहते हैं?’पत्रकारों के बीच नेता और नेताओं के बीच पत्रकार’- उनके बारे में यह कथन रामबचन पाण्डेजी का है। अब यह रामबचन कौन हैं सो जाने माने पत्रकार बताएंगे !

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  2. मुझे लगता है आडवानी भाजपा को बेहतर बना पायेंगे। सभी उनके साथ नहीं हैं पर देर सबेर साथ आ जायेंगे।

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  3. रामबहादुर राय स्‍वाभिमानी पत्रकार हैं। अच्‍छी पडताल करते है। लेकिन उनका यह लेख एकांगी प्रतीत होता है। उनका कहना है कि भारतीय जनता पार्टी की राजनीति भोथरी हो गयी है। उसे धारदार बनाने वाला कोई नेता फिलहाल नहीं है। अब आडवाणी में भी वह कूबत नहीं बची है कि वे कोई उफान-तूफान पैदा कर सकें।
    भारतीय राजनीति की मेरी समझ के मुताबिक, स्‍वतंत्र भारत में लालकृष्ण आडवाणी जैसा प्रतिभाशाली राजनेता पैदा नहीं लिया। वे अद्भुत है। नेताओं की दो कैटेगरी होती है। एक, जो क्षेत्र पर अच्‍छी पकड रखते है और दूसरे,जिनकी बौदिधकता प्रखर होती है। लालकृष्ण आडवाणी रेयर है। उनका दोनों क्षेत्रों पर असामान्‍य अधिकार है। ध्‍यान दीजिए, वह कौन है जिन्‍होंने कांग्रेस के वर्चस्‍व को तोडा, सांस्क्रितिक राष्‍ट्रवाद को प्रखर किया, छद्म धर्मनिरपेक्षता को ध‍राशायी किया, वामपंथियों को चुनौती दी, जिनके नेत्रित्‍व में भाजपा के सांसदों की संख्‍या 2 से 181 हो गयी, जिन्होंने पांच बार रथयात्रा का आयोजन कर अखिल भारतीय जन-मन को छुआ, जिन्‍होंने जनसंघ के अध्‍यक्ष के रूप में जयप्रकाश नारायण को पार्टी अधिवेशन में आमंत्रित कर पार्टी का प्रशंसक बना लिया, जिनकी ईमानदारी-नैतिक निष्‍ठा असंदिग्‍ध है। भाजपा की ओर से आडवाणीजी की प्रधानमंत्री पद के प्रत्‍याशी के रूप में घोषणा से कार्यकर्ताओं का उत्‍साह दुगुना हो गया है। एनडीए नेताओं ने जिस तरह से बयान दिए है और अखबारों ने जो संपादकीय लिखे है, उससे साबित है आडवाणीजी के मुकाबले आज कोई नेता नहीं है। 80 साल की आयु में भी उनकी सक्रियता युवाओं को लजा देती है। रायसाहब का यह लेख हताश और निराश मन की व्‍यथा है कुछ और नहीं।

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