रीढ़विहीन मोदी और जंग लगे लौहपुरूष

बहुत सारे लोग यह साबित करने में लगे हुए हैं नरेन्द्र मोदी बहुत स्वाभिमानी नेता हैं. वे गुजरात के गौरव हैं. वे बहुत कद्दावर हैं. हिम्मतवाले आदमी हैं आदि. जो लोग नरेन्द्र मोदी को समझना चाहते हैं उनके लिए सिर्फ इतना कहना पर्याप्त होगा कि वे भारत के मुशर्रफ हैं. मुशर्ऱफ की तरह नरेन्द्र मोदी पर कभी विश्वास नहीं किया जा सकता. राजनीति में पीठ में छूरा मारने को राजनीतिक कौशल कहा जाए तो मोदी इस कला में माहिर खिलाड़ी हैं. बहुत सारे लोग नरेन्द्र मोदी के उस कर्म को नहीं जानते जिसके चलते वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे. जब वे मुख्यमंत्री बनाये गये थे तो वह निर्णय वैसा ही था जैसे कोई भिखारी आपके दरवाजे पर आकर बैठ जाए और लाख भगाने पर भी भागे नहीं तो टालने के लिए आप उसे कुछ दे ही देते हैं. नरेन्द्र मोदी का गुजरात का मुख्यमंत्री बनना भी वैसी ही घटना थी.

गुजरात के तत्कालीन राजनीतिक संकट से निपटने के लिए किसी नये नाम की तलाश हो रही थी. उसमें कांशीराम राणा का नाम सबसे ऊपर था. लेकिन भाजपा की इस उधेड़बुन से अलग उसी का एक महासचिव खुद मुख्यमंत्री बनने के लिए कुछ और ही गणित कर रहा था. वह भाजपा नहीं बल्कि संघ के नेताओं को खुश कर रहा था कि उससे बढ़िया नेतृत्व गुजरात को कोई नहीं दे सकता. तब संघ में भाजपा के बारे में फैसले करनेवाले एक सह-सरकार्यवाह के दरवाजे के सामने झंडेवाला में मोदी प्रतिदिन जाकर बैठ जाते. सुबह-शाम उनका यही काम था. यह सिलसिला 14-15 दिनों तक चलता रहा. अंत में आजिज आकर उस सह-सरकार्यवाह ने कहा कि ठीक है अगले चुनाव तक आपके नाम पर कोई आपत्ति नहीं होगी.

उस समय भी बात सिर्फ टालनेवाली ही थी. लेकिन गोधरा और उसके बाद की घटनाओं ने सब-कुछ पलट दिया. अब वह सरकार्यवाह भी कुछ नहीं कर सकते थे जिनके इशारे से मोदी को गुजरात की गद्दी मिली थी. गोधरा के बाद हुई हिंसा को सबसे पहले दिल्ली के एक समाचार चैनल ने सबसे पहले मुद्दा बनाया था. महीनों तक अभियान की तरह मोदी के खिलाफ प्रचार किया गया. लेकिन इस प्रचार में मोदी बदनाम जरूर हुए लेकिन वे भाजपा में उस जगह पहुंच गये जहां से तानाशाही और लोकतंत्र का फर्क खत्म हो जाता है.

इसलिए इस बात में कोई दम नहीं है कि मोदी कोई कद्दावर नेता हैं. वे एक रीढ़विहीन और अवसरवादी नेता हैं जो अपने फायदे के लिए किसी की भी बलि ले सकते हैं. इसका ताजा प्रमाण है गुजरात में दो सांसदों की बर्खास्तगी और काशीराम राणा तथा केशुभाई को नोटिश. कोई भी कह सकता है कि राजनीति में तो यह सब चलता ही है. लेकिन जो कोई यह कहे उसके पहले उसे इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह तथाकथित अनुशासित भाजपा के बारे में बात कर रहा है. ऐसे रीढ़विहीन मोदी क्या शीर्ष भाजपा नेतृत्व के लिए भी खतरा हो सकते हैं?

इस बात में पूरी सच्चाई है कि आडवाणी द्वारा प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के पीछे जरूर कहीं न कहीं नरेन्द्र मोदी का भय है. यह भय बताता है कि भाजपा अंदर से कितनी खोखली हो चुकी है और आडवाणी कितने हवा-हवाई नेता हैं. आडवाणी जो नहीं हैं वही उनके बारे में सबसे ज्यादा प्रचारित किया जाता है. मसलन आडवाणी कहीं से संगठन-प्रिय व्यक्ति नहीं हैं लेकिन उनके बारे में यह भ्रम चहुंओर फैला हुआ है कि वे बहुत अच्छे संगठनकर्ता हैं. आडवाणी जरा भी आस्तिक नहीं हैं. इसके बारे में उनके करीबी पत्रकारों ने कई बार लिखा है कि किस तरह वे भारत के रीति-रिवाजों और परंपराओं को दकियानूसी धारणाओं से ज्यादा कुछ नहीं मानते. फिर भी उन्हें हिन्दूवादी नेता समझा जाता है. राम मंदिर आंदोलन अनमने में किया गया सौदा था फिर भी उन्हें मंदिर आंदोलन का अगुआ कहा जाता है. आडवाणी कभी भी निचले स्तर के कार्यकर्ताओं से मिलने में उत्साहित नहीं रहते फिर भी उन्हें अच्छा संगठनकर्ता समझा जाता है. आडवाणी भाजपा से ज्यादा अपनी चाटुकार मंडली को महत्व देते हैं फिर भी उन्हें भाजपा का तारणहार कहा जाता है. इसी चाटुकार मंडली के एक सदस्य के कहने पर वे जिन्ना की तारीफ कर आये थे. वे कहीं से भी कठोर फैसले लेनेवाले व्यक्ति नहीं है फिर भी चाटुकार मंडली ने उनके बारे में लौह पुरूष की उपमा गढ़ रखी है. वे विशुद्ध सत्तालोलुप इंसान हैं फिर भी उनके बारे में यह धारणा फैली हुई है कि सत्ता का कोई मोह नहीं है.

ऐसे अडवाणियों और मोदियों के हाथ में कितना सुरक्षित है गुजरात और कितना सुरक्षित होगा देश यह तो आनेवाला समय ही बताएगा. गृहमन्त्री रहते आडवाणी ने साबित कर दिया है कि वे भारत में किसी भी और व्यक्ति से ज्यादा अमरीका और पश्चिमीकरण के पैरोकार हैं. अगर देश के दुर्भाग्य से वे किसी दिन प्रधानमंत्री बन गये तो सारा देश इस बात को अनुभव कर लेगा. सौभाग्य से वह दिन आता दिखाई नहीं देता.

One thought on “रीढ़विहीन मोदी और जंग लगे लौहपुरूष

  1. एक ओर कुआं दूसरी ओर खाई। चलें कल देखा जाये क्या होता है!

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