क्या हम एक हिन्दूवादी जिन्ना तैयार कर रहे हैं?

नरेन्द्र मोदी की जीत के बाद विरोधी कहीं दुबक गये लगते हैं और समर्थक कह रहे हैं कि यह गुजरात और गुजरातियों की जीत है. इंटरनेट पर जितना घूमता हूं दुनिया भर के गुजराती समाज के लोग एक स्वर से कह रहे हैं कि मोदी जीता है, गुजरात जीता है. सवाल है तो फिर हारा कौन है? क्या कांग्रेस हारी है? मुसलमान हारे हैं? या फिर मोदी की इस जीत से भाजपा और संघ भी हारा है. मैं तो कोई विश्लेषक नहीं हूं लेकिन एक बात कह सकता हूं कि मोदी की यह जीत कांग्रेस और मुसलमानों को उतनी भारी नहीं पड़ेगी जितना संघ, भाजपा, विहिप और उन गुजरातियों को भारी पड़ेगी जो मोदी की जीत को गुजरात की जीत बता रहे हैं.

जिसको थोड़ा भी इतिहास का ज्ञान होगा वह इस बात में तुरंत तालमेल बैठा लेगा कि जिन्ना भी ऐसे ही रास्ते पैदा हुए थे. जिन्ना खुद में इतने ताकतवर कभी नहीं थे लेकिन विरोधियों ने उन्हें ताकतवर बना दिया था. जिन्ना कहते भी थे कि एक टाईपराईटर की मदद से उन्होंने पाकिस्तान हासिल कर लिया. लेकिन वह केवल टाईपराईटर नहीं था जिसने जिन्ना को इतना ताकतवर बना दिया था. जिन्ना अपने टाईपराईटर पर एक कौम की बात कर रहे थे. वह कौम का नारा था जो देखते ही देखते इतना ताकतवर हो गया कि प्रतिक्रिया में उठायी गई मांग इस देश की सबसे त्रासद हकीकत बन गयी. क्या गुजरात पाकिस्तान को नये संदर्भों में दोहरा रहा है?

जिन्ना बनने के लिए किसी को क्या चाहिए? एक भूभाग जिसकी मांग की जा सके, एक कौम विशेष जिसकी भावनाओं को हवा दी जा सके और एक इन दोनों मांगों को उठानेवाला एक हाड़मांस का पुतला. गुजरात का यह चुनाव केवल राज्य सरकार बनने न बनने का संकेत नहीं है. यह एक मनोवैज्ञानिक युद्ध था जिसमें एक तरफ मोदी और उनका तानाशाही रवैया था तो दूसरी ओर लोकतंत्र, विचारधाराएं, पार्टियां और उनका अपना तथाकथित हिन्दूवादी संगठन संघ और विहिप थे. यह कांग्रेस की हार है तो यह विहिप की भी हार है. यह भाजपा की भी हार है. यह संघ की भी हार है. यह गुजरात की हार है.

नरेन्द्र मोदी मुख्यमंत्री बनें या फिर कोई और यह कोई बड़ा मसला नहीं है. राज्यों में चुनाव होते हैं तो कोई न कोई पार्टी जीतती ही है. कोई न कोई मुख्यमंत्री बनता ही है. लेकिन नरेन्द्र मोदी की इस जीत में उनके विरोधियों का सबसे अधिक योगदान है. निजी दुराग्रहों को धर्मनिर्पेक्षता की शक्ल दे दी गयी. सोहराबुद्दीन का मसला हो या मुसलमानों की सुरक्षा का मामला विरोधी दोनों ही मुद्दों पर दुराग्रहों से भरे हुए थे. अपहरण, वसूली और गुण्डाग्रदी करनेवाल सोहराबुद्दीन इतना निर्दोष भी नहीं था जितना विरोधियों ने उसे साबित करने की कोशिश की. कई पत्रकारों ने तफ्शील से जांच के बाद यह साबित कर दिया है कि सोहराबुद्दीन अपराधी था और व्यापारियों ने तंग आकर पुलिस को राजी कर लिया कि वे उसका एनकाउण्टर कर दें. यह बात तो समझ में आती है कि पुलिस के इस तरह एनकाउण्टर पर सवाल उठाये जाते लेकिन सोहराबुद्दीन को ही निर्दोष और हीरो साबित करके हम क्या बताना चाहते हैं?

नरेन्द्र मोदी की जीत के लिए सबसे ज्यादा तीस्ता सीतलवाड़ जैसे लोग और मीडिया के वे धुरंधर जिम्मेदार हैं जिनका न गुजरात से कुछ लेना-देना है और गुजरातियों से. पत्रकारिता जब पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो जाती है तब हम अनजाने ही ऐसे काम कर जाते हैं जिसका परिणाम बाद में बहुत भयावह निकलता है. ऐसे लोगों को जरूर बधाई मिलनी चाहिए जिन्होंने मोदी को ही मुद्दा बना दिया. अब ऐसे हालात में गुजराती लामबंद हो गये तो इसमें अन्यथा क्या है?

भारत विभाजन के लिए अगर जिन्ना जिम्मेदार थे तो कांग्रेस ? आज भी हम यह सवाल उठाते ही हैं कि कांग्रेस ने वे कौन सी ऐतिहासिक गलतियां की जिसके कारण विभाजन संभव हो गया? क्या मोदी की जीत के संदर्भ में हम इस तरह का सवाल नहीं उठा सकते?

11 thoughts on “क्या हम एक हिन्दूवादी जिन्ना तैयार कर रहे हैं?

  1. सही मौके पर सटीक बात। मोदी की जीत ने हमारे लोकतंत्र की कमियों को उजागर किया है। दिखा दिया है कि इस लोकतंत्र के भीतर अधिनायकवादी ताकतों के फलने-फूलने की पूरी गुंजाइश है। हमें इस पहलू पर भी सोचना होगा कि भारत में असली लोकतंत्र का स्वरूप क्या हो सकता है। हम पश्चिम की अनुकृति नहीं कर सकते। इसलिए हमें अपनी परंपरा पर आधारित भारतीय लोकतंत्र का खाका बनाना होगा।

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  2. सोचो यदि मोदी हारे होते तो हम आज मीडिया की पीठ थपथपा रहे होते पर मीडिया की तमाम नकारात्मक प्रचार के बाद आज भी वे जीते.कारण साफ है कि जनता को अब छद्म धर्मनिरपेक्षता नहीं भाती यह प्लास्टिक की टाफी अब रसहीन हो चली है

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  3. बहुत ही विचारणीय लेख लिखा है।आज हमारी दिशा किस ओर है…हम कैसा सोच रहे हैं?…इस पर विचार करना बेहद जरूरी है…कहीं हमारी यह सोच कोई गंभीर समस्या का बीज तो नही बो देगी?जिस के काँटे हमारे अपनो को ही सहने पढेगे\

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  4. भाई संजय, सही सवाल उठाए हैं। आपकी बात को और आगे बढ़ा पाया तो मुझे ख़ुद को अच्छा लगेगा। शुक्रिया

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  5. संजय जी , बढ़िया लिखा है। हो सकता है इस बार वो आशंकाएं साकार न हो पाएं…. आशावादी बने रहना चाहिए। मीडिया के मनोनुकूल नतीजे न आने का यह मतलब तो नहीं कि गुजरात की जनता को मतदान की तमीज़ नहीं….

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  6. गुजरात की जनता बेवकुफ है. जाने दिजीये क्यों दिल जलाते है.

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  7. संजय जी बस ऐसे ही बेवकूफ़ी करते रहने की जरूरत है ..क्योकी भाइ पोअडे लिखे कहलाने पर तो बस वाम पंथ का ही हक है जी

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  8. संजयजी
    आपके विचार एक अलग जमीन की बात कर रहे हैं। निश्चित तौर पर मोदी की जीत एक ऐसी जीत है जो, व्यक्ति पूजा की ओर जा रही है। और, ये स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सचमुच खतरनाक है। लेकिन, लोकतंत्र हो या राजशाही दमदार नेतृत्व के बिना बात बनती नहीं है। जिन्ना के बनने की परिस्थितियां अलग थीं। मोदी गुजरात से बाहर निकलेंगे तो, उनको अलग फॉर्मूला लाना पड़ेगा और तब पार्टी, संघ परिवार सब चाहिए होगा। और, मोदी के पास न तो कोई जमीन है जिसकी वो मांग कर सकें। न तो कोई कौम है जो, पूरी की पूरी उनके साथ चल सके। और, जहां तक हाड़ मांस के पुतले की बात है तो, उसकी दहाड़ कल से आंसू में बदल गई है। देखिए आगे क्या होता है

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