इस भीड़ का एक तंत्र है

रातभर की थोड़ी अस्तव्यस्त यात्रा के बाद आज सुबह काशी में हुई. जागते हुए. पहले मुगलसराय फिर वहां से किसी ट्रेन के माध्यम से बनारस. गंगा डांक कर इस ओर हुए तो अजान और हनुमान चालीसा दोनों सुनाई दिये. सुबह के साढ़े पांच बजे काशी भले ही जाग गया हो बनारस सो रहा था. हम भी आकर अपने लाज में सो गये. जब उठे तो कुछ काम किया. अब इंटरनेट कैफे की खोज शुरू की तो एक कैफे ऐसा मिल गया है जहां यूनिकोड की-बोर्ड काम करता है. पहले से आठ दस भाषाएं उसमें जुड़ी हुई हैं. मैंने हिन्दी जोड़ दी. और मजे से यह पोस्ट लिख रहा हूं.

बनारस उठता है तो हड़बड़ाया हुआ सा लगता है. सच कह रहा हूं. धक्का-मुक्की, रेलमपेल, धर्म-आध्यात्म और धंधा व्यवसाय सब एक दूसरे के साथ ऐसे जुड़े हुए हैं कि एक संभालो तो दूसरा छूटने लगता है. दूसरा संभालने भागो तो पहला बुलाने लगता है. ऐसे में थोड़ी हड़बड़ी हो जाना स्वाभाविक ही होता है. दिनभर सड़कों पर टहलते हुए भीड़ के तंत्र और उसकी व्यवस्था के बारे में ही सोचता रहा. यहां एक बड़ी अच्छी बात है. यहां संवाद बनाना बहुत आसान है. यहां के सामान्य लोगों का भी मानसिक स्तर और समझ बहुत ऊंची है. खासकर छोटे दुकानदारों और रिक्शेवालों की. हो सकता है इनमें कुछ बदमाश भी छिपे हों लेकिन अधिकांश बहुत अच्छे हैं. उनके साथ सबसे अच्छी बात यह है हर तरह के मेलजोल के बावजूद वे अपनी सीमा का उल्लंघन नहीं करते. ऐसा जबर्दस्त अघोषित आत्मानुशासन यहां के वातावरण की शुद्धता को परखने के लिए काफी है.

जहां थोड़ा आधुनिकता का असर आ गया है वहां एक सीमारेखा भी बन गयी है. लेकिन जहां शास्वत काशी अविरल प्रवाहित है वहां कोई चिंता नहीं. एक औरत को एक रिक्शेवाले से मोलभाव करते सुना “बोल तोहईं का चाही?” यानी किराया कितना चाहिए. क्या जबर्दस्त शब्दावली है. रिक्शेवाले पर अपनी मर्जी थोपने या अपने फायदे से ज्यादा उसकी जरूरतों का ध्यान है. मानों कोई मां अपने बच्चे से पूछे कि बेटा तुम्हे क्या चाहिए? न उस महिला ने कोई वोकेशनल ट्रेनिंग कोर्स कर रखा था और न ही उस रिक्शेवाले की कोई रिश्तेदारी थी जो नखरे दिखा रहा था. यह तो इस जमीन की तासीर का कमाल है कि वे स्वभाव से ही दूसरे के ख्याल रखनेवाले होते हैं. और भी बहुत सी खूबियों से भरा है यह छोटा सा शहर…….कुछ समझ पाया तो फिर लिखूंगा.

5 thoughts on “इस भीड़ का एक तंत्र है

  1. साथी
    बनारस को इस तरह देखने का अंदाज अच्छा है।

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  2. दस दिनों के अपने बनारस-काशी प्रवास के बाद मै इस शहर को एक ही शब्द मे अक्सर पारिभाषित करता आ रहा हूं और वह शब्द है “अलमस्त”
    मेरे पसंदीदा शहरों मे से एक है यह!

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  3. भारत के इस शहर से रुबरु कराने के लिए धन्यवाद, कभी मौका लगा तो हम भी देखेंगें

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  4. वाकई मस्त शहर है और लिखा भी मस्त है…देर से पढ रहा हू..पर याद आ गया बनारस…इस शहर से एक अजीब सा नाता है

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