धर्मांतरण तब तक होता रहेगा जब तक……

ईसाई मिशनरियां पिछड़े इलाकों में जाकर धर्मांतरण कर रही हैं इसका विरोध करना हमें आता है लेकिन इस बात की कभी चिंता नहीं होती कि पिछड़े इलाकों में जो लोग दीन-हीन हालत में रह रहे हैं उनके बारे में हमें भी थोड़ा सोचना चाहिए. धर्मांतरण एक अभाव का परिणाम है. शहरों में जहां हिन्दुओं की स्थिति मजबूत है वहां धर्मांतरण की घटनाएं क्यों नहीं होती? क्योंकि वहां धर्म का पेट से कोई संबंध नहीं होता. धर्म और उपासना पद्धति अपनाने की आजादी होती है. पिछड़े इलाकों में हमें खुद तो चिंता होती नहीं और अगर कोई मिशनरी आकर उनकी चिंता करता है और उस चिंता की आड़ में उन्हें ईसाई बना लेता है तो अचानक हमारा हिन्दुत्व जाग जाता है.

एक संत विजय कौशल महाराज से मैंने यही सवाल किया था कि क्या भारत में खुद कभी सेवा की कोई परिपाटी नहीं रही है. उन्होंने कहा कि आज जिसे आरएसएस और अन्य संगठन सेवा कार्य समझकर कर रहे हैं वे दरअसल ईसाई मिशनरियों के प्रतिक्रियास्वरूप हैं. मान लीजिए कल को ईसाई मिशनरी देश छोड़ कर चले जाएं तो ये सारे सेवाकार्य बंद हो जाएंगे. प्रतिक्रिया में खड़े किये गये कार्य लंबे समय तक नहीं टिकते. उनकी बातों में दम है. हिन्दुओं में एक दूसरे के प्रति जैसी घृणा और ऊंच-नीच का घातक भेदभाव है उससे यह सब तो होगा ही.

महात्मा गांधी ने भी धर्मांतरण का विरोध किया था. और कोई भी समझदार आदमी इस बात का विरोध करेगा कि आप लालच देकर धर्मांतरण करें. लेकिन यह मौका ईसाई मिशनरियों को किसने दिया है कि वे खुलेआम धर्मांतरण कर सकें? कमजोरी हमारी है और दोष इसाई मिशनरियों को देना कहां तक ठीक है? अगर हमारे ही बीच से उठकर लोग दूसरे धर्म में जा रहे हैं तो हमें बुरा क्यों लगता है. क्या हम इतने तानाशाह हैं कि अपने यहां सम्मान से रहने नहीं देंगे और दूसरी जगह उनको सम्मान मिले तो हम उन्हें जाने नहीं देंगे. यह कौन सी मानसिकता है भाई?

आरएसएस जिसे हिन्दू धर्म की परिभाषा कहता है वह पोलिटिकल हिन्दुत्व है. उसका संबंध केवल वोट बैंक से है. हां इस वोट बैंक को मजबूत करने के लिए वह अन्य कई सारे काम करता है जिसके सहारे किसी राजनीतिक जमात को सत्ता में पहुंचाया जा सके. उसकी परिभाषा को हिन्दुत्व मानना बहुत बड़ी भूल होगी. वह प्रतिक्रयावादी हिन्दुत्व है. हेडगेवार ने इसकी शुरूआत जिस तरीके से की वह तरीका ही छद्म था. उनका उद्येश्य कुछ और रहा होगा लेकिन उन्होंने किसी और बहाने से लोगों को इकट्ठा करना शुरू किया. अगर आरएसएस को हिन्दुत्व के सुरक्षा का प्रहरी न होता तो भारत में आज हिन्दुओं की स्थिति शायद बेहतर होती. जो लोग कहते हैं कि आरएसएस के कारण भारत में हिन्दुओं की स्थिति बेहतर हुई है वे झूठ बोलते हैं. उनकी बहुत सारी चिंताएं जायज हैं लेकिन उनके काम करने का तरीका बिल्कुल ही छद्म और प्रतिक्रयावादी है.

प्रतिक्रिया करना हमारे स्वभाव का हिस्सा नहीं है. आरएसएस लाख कोशिश कर ले लेकिन देश में धर्मांतरण नहीं रूक सकता. क्योंकि धर्मांतर कारण नहीं परिणाम है. कारण जहां हैं उसको खत्म करने के लिए हम सबको विचारधाराओं की खोह से बाहर निकलकर एक समाज के लिहाज से सोचना होगा. हम जो भूल गये हैं उसे याद करना होगा कि हमारे समाज में जो पिछड़े हैं उनको मजबूत बनाना हमारी जिम्मेदारी है. हमारी कमाई का एक निश्चित हिस्सा उनके उत्थान के लिए खर्च होना चाहिए. अगर हम ऐसा नहीं करते धर्मांतरण का विरोध करने का हमें कोई नैतिक हक नहीं है.

5 thoughts on “धर्मांतरण तब तक होता रहेगा जब तक……

  1. बंधु चलो कुछ तो आप जैसे लोग हैं जो हिंदु समाज का चिंतन करते हैं,जहां तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का प्रश्न है,संघ पूरे जोर शोर से इसी काम में लगा है कि समाज में दलित ,वनवासी सभी तक हम पहुंचे और उनकी प्रगति के बारे में सोचें.इसके लिए वनवासी कल्याण आश्रम और सेवा भारती जैसे अन्यान्य संगठन पूरे तन मन से लगे हहै

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  2. संजय जी एक बार बांसवाड़ा में मैं एक स्‍टोरी कर रहा था, वहां ईसाईयों के संग आरएसएस जैसे संगठन धर्मांतरण के कार्य में लगे हुए थे। लेकिन आप विश्‍वास नहीं करेंगे कि जिन्‍होंने ईसाई धर्म अपना लिया था । उनकी वाणी में किसी के लिए कोई बुरा शब्‍द नहीं था जबकि जिन्‍होंने हिन्‍दू धर्म में वापसी की थी वो लोग जमकर पादरियों को कोस रहे थे । मुझे यह समझ में अब तक नहीं आ पाया है कि धर्म क्‍या प्रेम सिखाता है या नफरत

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  3. संजयजी, बहुत परेशान हो रहा हूं आपको पढकर। आप भी छद्म सेकुलरिस्‍टों की भाषा में लेखन करने लगे है। रा.स्‍व.संघ से असहमत हुआ जा सकता है। उसकी कडी आलोचना हो सकती है। लेकिन संघ के बारे में कामरेडों की तरह लिखना ठीक नहीं है।

    आपने लिखा है- आरएसएस जिसे हिन्दू धर्म की परिभाषा कहता है वह पोलिटिकल हिन्दुत्व है. उसका संबंध केवल वोट बैंक से है. हां इस वोट बैंक को मजबूत करने के लिए वह अन्य कई सारे काम करता है जिसके सहारे किसी राजनीतिक जमात को सत्ता में पहुंचाया जा सके. उसकी परिभाषा को हिन्दुत्व मानना बहुत बड़ी भूल होगी. वह प्रतिक्रयावादी हिन्दुत्व है. हेडगेवार ने इसकी शुरूआत जिस तरीके से की वह तरीका ही छद्म था. उनका उद्येश्य कुछ और रहा होगा लेकिन उन्होंने किसी और बहाने से लोगों को इकट्ठा करना शुरू किया. अगर आरएसएस को हिन्दुत्व के सुरक्षा का प्रहरी न होता तो भारत में आज हिन्दुओं की स्थिति शायद बेहतर होती. जो लोग कहते हैं कि आरएसएस के कारण भारत में हिन्दुओं की स्थिति बेहतर हुई है वे झूठ बोलते हैं. उनकी बहुत सारी चिंताएं जायज हैं लेकिन उनके काम करने का तरीका बिल्कुल ही छद्म और प्रतिक्रयावादी है.

    प्रतिक्रिया करना हमारे स्वभाव का हिस्सा नहीं है. आरएसएस लाख कोशिश कर ले लेकिन देश में धर्मांतरण नहीं रूक सकता. क्योंकि धर्मांतर कारण नहीं परिणाम है.,,

    संजयजी, जब भौतिकवाद चरम पर हो, कॅरिअर की आपाधापी और गलाकाट प्रतिस्‍पर्धा जोरों पर हो, ऐसे समय में रा.स्‍व.संघ जिस निष्‍ठा के साथ समाज कार्य कर रहा है वैसा उदाहरण मिलना मुश्किल है। गरीबी, अशिक्षा देखकर द्रवित होकर लेख लिख लेना, सेमिनार का आयोजन कर लेना, प्रतिरोध रैली निकाल लेना बहुत आसान है लेकिन जहां गरीबी है, जहां अशिक्षा है, वहां प्रत्‍यक्ष जाकर कार्य करना मुश्किल बात है और रा.स्‍व.संघ इसी कार्य को कुशलतापूर्वक कर रहा है। यही संघ की विशेषता है, जिस कारण वह निरंतर उत्‍कर्ष की ओर है। गांधीजी धर्मांतरण को ठीक नहीं मानते थे। संघ उन्‍हीं की बातों पर अमल कर रहा है। कुछ लोग तनाव पैदा कर संघ को बदनाम करने में जुटे रहते है जिससे कुछ भ्रांतियां उत्‍पन्‍न होती है।
    आज दसियों हजार उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त स्‍वयंसेवक तमाम अभावों को सहकर गांवों में दलितों और आदिवासियों के बीच काम कर रहे है।
    वर्तमान में विभिन्न क्षेत्रों में संघ से प्रेरित 35 अखिल भारतीय संगठन कार्यरत हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, वैकल्पिक रोजगार के क्षेत्र में लगभग 40 हजार सेवा कार्य चल रहे हैं। राष्ट्र के सम्मुख जब भी संकट या प्राकृतिक विपदाएं आई हैं, संघ के स्वयंसेवकों ने सबसे पहले घटना-स्थल पर पहुंच कर अपनी सेवाएं प्रस्तुत की हैं।
    इतने बडे आंदोलन के बारे में ठीक से पडताल कर लिखना चाहिए, ऐसा मेरा निवेदन है।

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  4. पश्चिम बंगाल और गुजरात के कंडला में तूफान के बाद जब लाशे सड़ रही थी ( लाशों की स्थिती इतनी बुरी थी कि हाथ पकड़ा जाये तो शरीर से हाथ ही अलग हो जाता था) कोई उनका अंतिम संस्कार करने वाला नहीं था तब आर एस एस ने किस प्रतिक्रियास्वरूप उन लाशों का अंतिम संस्कार करवाया था?

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