दरिद्र और नकलची होकर भी हम "इलिट" की तरह क्यों व्यवहार करते हैं?

मैं अक्सर कंपनियों के खिलाफ लिखता और बोलता हूं. यह कोई भावावेग नहीं है, मैं पिछले दस सालों से कंपनियों के काम-काज के तरीकों को ही जानने समझने में लगा हूं. और जितना मैं इसको जानता गया मुझे लगने लगा कि भारत नयी तरह की मानसिक गुलामी का शिकार होता जा रहा है. यह नयी प्रकार की दासता है बहुत खतरनाक क्योंकि यहां आपके सामने कोई दुश्मन नहीं है. आप अपने ही दुश्मन हैं. आपकी अपनी ही बुद्धि फिर गयी है. अंग्रेजी में कहना हो तो कहेंगे आपके माईंड की कंडिशनिंग हो गयी है.

कारपोरेट कल्चर में कई शब्द हैं जिनका ठीक अर्थ आपको समझ में आ जाए तो आपको कंपनियों से नफरत हो जाएगी. जैसे उनकी शब्दावली में एक शब्द है- टैप द मार्केट. यानी जो कुछ सामने दिख रहा है उसको दबोच लो. इस दबोच लेने के लिए कंपनियां जो रणनीति अख्तियार करती हैं उसको कहा जाता है मार्केटिंग प्लानिंग और एक्सक्यूजन. कंपनियों की नजर में किसी भी वस्तु, व्यक्ति का तब तक कोई अस्तित्व नहीं है जब तक कि उस व्यक्ति और वस्तु के साथ कंपनियों का फायदा न जुड़ जाए. मान लीजिए आप रीठे से अपना बाल धो लेते हैं तो आप पिछड़े हुए प्राणी हैं. लेकिन आप रीठेवाले शैंपू से बाल धोते हैं तो आप विकसित जीव हो जाते हैं. क्योंकि यह शैंपू कोई कंपनी बनाती है इस तरह अब आपकी जिंदगी में एक कंपनी का दखल हो गया.

इसलिए कंपनियों के प्रभाव से क्रांति लाने वाले दोस्त लोग सलाह दे रहे हैं चिंतन करो, विश्वास करो, ऐसे बाजार को गाली मत दो. मैं बाजार को कभी गाली नहीं देता लेकिन एक सवाल जरूर पूछता हूं आपका अस्तित्व बाजार के लिए है या आप बाजार के लिए जी रहे हैं. दुर्भाग्य से आज जिसे व्यवसाय कहा जाता है वह शातिर, धूर्त और बेईमान लोगों का कुनबा है जो व्यावसायिक प्लानिंग के नाम पर लोगों को लूटने, ठगने की योजनाएं बनाता है. मल्टी लेवल मार्केटिंग (MLM) इसका बहुत अच्छा उदाहरण है. मैं देखता हूं मार्केटिंग गुरू कहे जानेवाले लोग कितने संवेदनहीन होते हैं जो सुबह से शाम तक यही योजना बनाते रहते हैं भोली-भाली जनता जो अपने हिसाब से जी रही है उसको कैसे लूटा जाए.

असल में भारत को बर्बाद करने वाली दो संस्थाएं हैं. पहली है आईआईटी(IIT) और दूसरी है आईआईएम(IIM). यह मैं मानता ही हूं लेकिन जब आईआईएम के कुछ छात्र और आईआईटी के कुछ प्रोफेसरों ने मेरी बात से इत्तेफाक जाहिर किया तो मुझे लगा कि ऐसा सोचनेवाला मैं अकेला नहीं हूं. आईआईटी ने इस देश की तकनीकि को खत्म कर दिया और आईआईएम इस देश की बाजार व्यवस्था और मार्केटिंग को खत्म करके विदेशी मॉडल स्थापित कर रहा है. यह बहुत बड़ा झूठ है कि भारत की अपनी कोई बाजार व्यवस्था नहीं है. भारत जैसी उन्नत बाजार व्यवस्था दुनिया के कितनी देशों में होगी मुझे नहीं मालूम. इस विषय पर विस्तार से सोचने की जरूरत है. हमारी हीन भावना ने कभी हमें अपनी बाजार व्यवस्था की ओर ताकने ही नहीं दिया. फिर दोष भी इतने आ गये कि लगा इसे खत्म ही कर दो. लेकिन उसकी जगह जो नया रहा है वह क्या है?

वह उस शाहूकारी बाजार व्यवस्था से सौ गुना अधिक शोषक और दमनकारी व्यवस्था है. नयी बाजार व्यवस्था आपको ऐसा रक्त पिपासु बना देती है जो अपने ही लोगों का खून चूसकर ऐशो-आराम की चीजें इकट्ठा करता है. कंपनियां लोगों को जड़ और बुद्धिहीन बनाती हैं. मनुष्य के स्वाभाविक विकास को रोक देती हैं और आप ऐसी नाजायज और गैरजरूरी बातों में उलझ जाते हैं कि आपको पता ही नहीं चलता कि आपके होने का कुछ और मतलब भी हो सकता है. मानों आप कंपनियों के लिए जी रहे हैं. यही आपके जीने की सार्थकता है. सुना है यूरोप और अमरीका में दो सौ साल बाद अब जाकर होश आया है कि हमें मनुष्य होने का प्रमाण देना चाहिए. गाँधी शांति प्रतिष्ठान में एक अमरीकी मिला था. बड़ी देर बात करने के बाद उसने एक सवाल किया जिससे हम सब निरूत्तर हो गये. उसने कहा कि आपकी सारी बातें ठीक हैं. लेकिन यह बताईये जो समाज एक कमरे में सिमटकर बैठ गया हो उसको कुछ कहें भी तो कैसे? उसके पास आप पहुंच ही नहीं सकते. वह दिन भर टीवी देखता है. इंटरनेट पर घूमता है. और ये ऐसे माध्यम हैं जिनका उपयोग कंपनियां अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए करती हैं.

असल में आज हम लोग जिस बाजार व्यवस्था में सम्मान खोज रहे हैं वह थोथी है और इस व्यवस्था के सहारे हम जितना सम्मान खोजेंगे पूंजीपति और बड़े पूंजीपति होते चले जाएंगे. यह बहुत शातिर मार्केटिंग तकनीकि है कि बाजार के सामान को आपकी हैसियत के साथ जोड़ दिया जाए. अब आपको सम्मानित महसूस करना है तो आपको बाजार को अमीर बनाना ही होगा. क्या हम ऐसा व्यवहार करने के योग्य हैं? विदेशी तकनीकि, पैसे, सोच, समझ और रणनीति के सहारे क्या हम इलिट होने का दिखावा भर नहीं कर रहे हैं? क्या उधार के पैसे और नकल के ज्ञान से सचमुच कोई व्यक्ति संपन्न अनुभव कर सकता है?

2 thoughts on “दरिद्र और नकलची होकर भी हम "इलिट" की तरह क्यों व्यवहार करते हैं?

  1. Do u really think commercialism is bad. What will say u to the thousands of ppl working in the so called emotionless MN companies which are paying our paycheck. W/o which we still would be living in villages and u wouldnt’ be writing here…

    Think seriously and do reply.

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  2. I am your regular reader and most of your article has some serious message but this article of yours is written without any thought process.It is really unfortunate to see that you are accusing IIT and IIMs. which on India feels proud. They are the people who always think about the progress of country through technology and services.
    Mr Tiwari world is changing very fast and in India there are various
    diversity. one formula never be applicable in India. only various progress in all different field can bridge the gap.
    Please feel proud about the power of progress in India.

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