आईआईएम और आईआईटी ने भारत को बर्बाद किया है

मैं नहीं जानता यह कौन सज्जन हैं जिन्होंने मेरे पिछले पोस्ट पर ऐतराज जाहिर किया है और कहा है कि “It is really unfortunate to see that you are accusing IIT and IIMs. which on India feels proud.” वे मेरा ब्लाग पढ़ते हैं और मेरा ऐसा कहना उन्हें बुरा लगा है लेकिन अब मैं जो कहूंगा उन्हें और भी बुरा लगेगा. मैं उनसे अग्रिम माफी मांगते हुए उन्हीं की बात से शुरू करना चाहूंगा कि भारत को बहुध्रुवीय और बहुआयामी विकास की प्रणाली चाहिए. इसका मतलब होता है कि हर एक को विकसित होने का मौका मिलना चाहिए.

भारतीय समाज या फिर कोई भी समाज जो एक क्रमिक प्रणाली से विकसित होता है वहां ऐसी बहुत सी धाराएं अपनेआप बह निकलती हैं जो समाज के हर वर्ग की जरूरतों को पूरा करती हैं. लेकिन संगठित मानसिकता के लोगों को यह सब बर्दास्त नहीं. पूरी दुनिया उनकी मुट्ठी में होनी चाहिए. आईआईटी और आईआईएम जैसे शिक्षा संस्थान भारत को गुलाम बनाने का काम करते हैं. ये संस्थान ऐसे मजदूर तैयार करते हैं जो विदेशी प्रणाली को देश पर काबिज होने में मदद करती हैं. जो लोग आईआईटी और आईआईएम पर बहुत गर्व करते हैं न तो उन्हें भारत के बारे में कुछ खास मालूम है और न ही इस संस्थानों की स्थापना के बारे में.

बहुत कम लोगों को पीएल-480 गेहूं के आयात के बारे में अब मालूम होगा. उन दिनों दिनमान में काम करनेवाले एक पत्रकार बताते हैं कि भारत सरकार डॉलर में भुगतान करने में सक्षम नहीं था. अमरीका ने कहा कि आप रूपये में भुगतान करना चाहते हैं हम बताते हैं कि आपको यह पैसा कहां लगाना चाहिए. फिर ऐसे बहुत से तकनीकि और व्यावसायिक संस्थानो में पैसा लगाया गया और अमरीका के मर्जी के हिसाब से उनकी रचना की गयी. आईआईटी और आईआईएम उसी पैसे से पैदा हुए हैं.

कितने IITns हैं जो देश के लिए काम करते हैं? सीधे तौर पर किसी को स्वार्थी कहना बुरा लगता ही है लेकिन IITns ने देश को अवसरविहीन करने के जितने रास्ते तैयार किये हैं उतने अंग्रेजों ने भी नहीं किये थे. बड़ी कंपनियों को कारीगर और ऊंचे दर्जे के मजदूर चाहिए तो वह आईआईटी ओर रूख करता है. अगर आप पैसा दे सकते हैं आईआईटीवाला आपके लिए कुछ भी काम करने को तैयार रहता है. अव्वल तो वह देश में रूकता नहीं रूकता भी है तो बड़ी कंपनियों के लिए काम करता है क्योंकि उसको इतना ज्यादा पैसा चाहिए जो छोटे उद्यमी दे ही नहीं सकते. विदेशी कंपनियों को अपने मुताबिक एक शिक्षण संस्थान मिल गया है जहां वे अपने किस्म के मजदूर तैयार कर सकते हैं. हां कुछ जुनूनी लोग यहां भी होते हैं लेकिन उनकी भी वही हालत होती है जो आमतौर पर किसी सच बोलनेवाले की होती है.

आईआईटी से भी ज्यादा खतरनाक शिक्षण संस्थान है आईआईएम. भारत में बाजार के रास्ते शोषण के जो हथियार विकसित किये जा रहे हैं उनमें सबसे ज्यादा योगदान आईआईएम वालों का ही है. जो लोग मेरी बात से असहमत हैं उन्हें कुछ साल इस विषय पर काम करना चाहिए. भारत को समझने की कोशिश करनी चाहिए. अपने धरातल पर खड़े होकर सोचना चाहिए. हमारा अपना क्या है, हमारी अपनी समझ क्या है, भारत क्या है और भारत में विकास की प्रणालियां कैसी हैं. अपने गुनिया को गाली देकर आप टाईवाले इंजीनियर का महिमामण्डन मत करिए. देश को बहुत कीमत चुकानी पड़ेगी. समाज और हर इंसान को इसकी बहुत कीमत चुकानी पड़ेगी.

12 thoughts on “आईआईएम और आईआईटी ने भारत को बर्बाद किया है

  1. संजय भाई, आपने तो नए सिरे पर सोचने का मजबूर कर दिया। मैं तो अभी तक इन्हें देश के औद्योगिक विकास में मददगार ही मानता आया हूं।

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  2. वास्‍तव में कड़वा सच तो यही है। अपने देश के औद्योगिक विकास से ज्‍यादा इन संस्‍थानों के स्‍‍नातक विदेशों के विकास में ज्‍यादा दिलचस्‍पी लेते हैं।

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  3. तिवारी जी आप ने वो बात कही हे जो बात मेने २ साल पहले जर्मन समाचार पत्र मे पढी थी,बिलकुल सच.

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  4. संजयजी शोध अद्भुत है। बातें भी सोचने को मजबूर करती हैं। लेकिन, क्या करिएगा इस देश में 90 प्रतिशत बच्चे इन्हीं दोनों संस्थानों में पढ़ने का सपना देखते हैं। अब तो ढेर सारे नए IIT, IIM बन रहे हैं।

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  5. बेशक विकास एक-एक व्यक्ति का और एक समान होना चाहिए. पर ऐसा क्यों नहीं हो पाया ? आपके साथ पले-बढे सभी लोग एक जैसे नहीं हो पाए. समानता उसी तरह पूर्ण नहीं होती जैसे जीवन की कोई भी चीज़ नहीं होती. हाँ
    असमानता कितनी और किस तरह की हो इस पर बात होनी चाहिए. यह सब ऐतिहासिक भी है. पुराने बादशाहों की संपत्ति और मजदूरों की संपत्ति का अन्तर क्या था, इसका अनुमान लगाया जा सकता है. आपकी बात मानें तो आईआईटी ही क्यों सारे इंजीनियरी संस्थान मनुष्य विरोधी हैं. वे उस उद्योग तंत्र की पीठिका तैयार कर रहे हैं, जिसके विचार केन्द्र में संसार के आख़िरी आदमी की फिक्र नहीं है. आईआईएम् इसी उद्योग तंत्र से उपजे कारोबार के प्रबंध की शिक्षा देते हैं. स्वाभाविक है वे भी मनुष्य विरोधी हैं. दिक्कत यह है कि जो ख़ुद को मनुष्य समर्थक मानते हैं वे इसी व्यवस्था में जन्मे और बढे हैं. गांधी ने मशीन का विरोध किया. पश्चिमी सभ्यता को निंदनीय बताया, पर वे इन विचारों को पश्चिम से ही लेकर आए. उन्होंने जिस राज्य की स्थापना के लिए संघर्ष किया, उसके स्वरूप को लेकर उनकी धारणा क्या थी? अपने वक्तव्यों में आजादी के बारे में परेशानी ज़ाहिर करते रहे, पर क्या वे इतने नासमझ थे. उन्हें क्या पता नहीं था कि कैसी राज-व्यवस्था आने वाली है. उन्हें अंग्रेजी राज से मुक्त होने की जल्दी थी. वे जीवित रहते तो क्या भारत का आर्थिक विकास किसी और तरह का होता? औद्योगिक विकास, अमेरिका, विश्व बैंक, ग्लोबलाइजेशन वगैरह को कोसना तभी ठीक है जब आप कोई वैकल्पिक व्यवस्था सामने रखें. सामने ही न रखें उस ताकत को रेखांकित करें और लीड करें जो आपके विचारों को लागू करे.

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  6. लगे रहो बाबा, तुमसे बड़ी उम्मीदें है। मैं चाहूंगा कि इस लेख का इंट्रो भूमिका भड़ास पर डालकर आगे पढ़ने के लिए लिंक आपके ब्लाग का दे दिया जाये ताकि ये बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे। गज़ब का विषय और बहस है।
    जय भड़ास
    यशवंत

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  7. Mr Tiwari I appreciate your flow of
    writing,great ability to ask questions? but this writing of yours is misguiding people.
    IIT and IIMs produce leaders.And it
    is proven fact that not only in India they have earned respect all over the world for their leadership
    skills. It is the problem of the system that you not able to give opportunity in the country. It was in the past if you are aware about the present then you must have gone through the facts that most of these bright sons are rejecting the worldwide offers because the opportunity and scope of work are increasing day by day. some of the students are started their own work to uplift the society and job opportunity for mass ,I think this is also part of social work only remain as critics does not help the society either. you never find all the members of same community similar. you do agree that all the journalist are not similar,all the doctors are not similar,even all the unemployed are not similar.similarly in the case of IITians and IIMs alumni all are not similar as far as priority of work is concern. I belive most of them are solution provider rather than problem creator.
    I like your article please inform,motivate and educate people through your article without any study never misguide people.

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  8. क्या खूब लिखते हैं आप और जानकारियाँ कहाँ से जुटाकर लाते हैं? कम्पनियों के कुचक्र के खिलाफ़ तो मैं भी हूँ आज ही आपका ब्लॉग सब्स्क्राईब कर रहा हूँ, यदि कोई सन्दर्भ लगा तो क्या मैं अपने ब्लॉग पर उपयोग कर सकता हूँ?

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  9. Likhane wala Donkey hai… Lagta hai Isaka Khud ka IIT OR IIm main Selection nahi ho paya hai…. kya sare IIt’ns INDIA ke bahar hai…? India main Ek bhi nahi… Pahale LEkhak Khud ka Is Desh main YOGDAN bataye…. Jin Students main Brain (Dimag) hai…ve hi baha tak pahuchate hai….Is desh ko NETAOn ne Barbad kiya hai… I Think jab tak Dolor ka RATe Rs. se kam nahi hoga…. Tab tak desh se log Bahar jate rahenge… Pahale Dollor ka rate kam kren…. Aap Ak tarfa baat bol rahe hai….

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  10. दीपक भाई अपना ईमेल तो छोड़ते कि आपके सवालों का जवाब दे देता यह डंकी.

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