गोमांस भक्षण का सच

जब मैं 1971 में भारतीय विदेश सेवा के लिए चुना गया तो मेरे पिताजी ने मुझसे यह प्रतिज्ञा करवाई कि मै गो मांस नही ग्रहण करूंगा क्योकि यह हिंदू धर्म के विरुद्ध है और इसे वेद द्वारा निषिद्ध किया गया है। हालांकि उन्होने मुझे अन्य मासांहार से नही रोका। आज इस मुद्दे के विवादास्पद होने के साथ ही आधुनिक चिकित्सा शास्त्र ने भी यह माना है कि गो मांस खाने से कई गंभीर संक्रामक, (एक से दूसरे व्यक्ति तक फैलने वाली) वंशानुगत (एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक फैलने वाली) और ला-ईलाज बीमारियां मसलन एड्स होने की संभावना रहती है। इस तरह गो मांस इतना घातक है कि इससे वंश का नाश भी हो सकता है।

अमूमन अधिकतर राजदूत जो हमे रात्रीभोज पर आमंत्रित करते थे, इस बात का पूरा ख्याल रखते थे कि हमे गो मांस न परोसा जाए, क्योकि उन्हे मालूम था कि हिंदुओ के लिए यह निषिद्ध है। हेलसिंकी मे जब मै स्विस राजनयिक के घर गया तो उन्होने इस बात का ध्यान रखते हुए हमारे लिये खाने पर मछली की व्यवस्था की थी। जिस तरह हिंदू गो मांस नही खाते है वैसे ही मुसलमान सुअर। इस पृष्ठभूमि मे जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डी. एन. झा का गो मांस भक्षण के समर्थन मे हिंदुस्तान टाइम्स मे 17 और 18 दिसंबर 2001 को छपे लेख तथा अल्लाहुअकबर. नेट के लेखो को जिसमे गो हत्या के समर्थन मे वैदिक ऋचाओ का हवाला दिया गया था, को पढ़ा तो बहुत आश्चर्य हुआ।

ऋग्वेद की आठ ऋचाएं गौ की आराधना मे लिखी गयी हैं, जबकि अथर्ववेद की 24 ऋचाओ मे बैल (ऋषभ) को देवता मान कर उसकी प्रार्थना की गयी है। ऋग्वेद की (viii.101.15 वी)ऋचा मे साफ तौर पर गो वध से मनाही की गई है।

इस विषय के संबंध मे दो चीज को कभी नही भूलना चाहिए कि- सभी हिंदू धर्मशास्त्रो मे वेदो की स्थिति सर्वोच्च की है, तथा वेदो मे गाय के लिए अघन्या शब्द का बार-बार प्रयोग किया गया है। वेद के VI.43 वें निरुक्त में अघन्या शब्द की व्याख्या करते हुए ऐसी प्राणी जिसकी हत्या न की जाए बताया गया है। कम से कम ऐसी 16 ऋचाएं है जिसमे गाय के लिए अघन्या शब्द का प्रयोग किया गया है। ऋग्वेद की आठ ऋचाएं गौ की आराधना मे लिखा गया है, जबकि अथर्ववेद की 24 ऋचाओ मे बैल (ऋषभ) को देवता मान कर उसकी प्रार्थना की गयी है। ऋग्वेद की (viii.101.15 वी)ऋचा मे साफ तौर पर गो वध से मनाही की गई है।

एच.एच.विल्सन ने इसका अनुवाद करते हुए लिखा है- वह(गाय)रुद्र की मां,वसुओ की पुत्री और अमृत का वासस्थान है। अन्य चार ऋचाओ मे भी गाय को नही मारने, तथा हानि नही पहुंचाने का निर्देश दिया गया है। इसके साथ ही इसकी कम से कम सात ऋचाओ मे अगिन् से प्रार्थना किया गया है कि वह मांसभक्षी रक्षसो को जिंदा जलाए या उसकी हत्या कर दे। ऋग्वेद की X.87.1 और X.87.19 ऋचाओ के निहितार्थ भी कुछ ऐसे ही है। इस तरह यह स्पष्ट होता है कि वेदो मे न केवल गोवध से मनाही की गई है, बल्कि गो हत्या करने वालो को दंडित करने का प्रावधान भी किया गया है।

वैदिक ऋचाओ मे कुछ शब्दो के प्रतिकात्मक प्रयोग हुआ है, जिसका गो वध का समर्थन करने वाले लोग गलत अर्थ निकालकर अर्थ का अनर्थ कर दिया करते हैं। जैसे हम अक्सर स्त्री की सुंदरता का वर्णन करने के लिए चंद्रमुखी और मृगनयनी शब्दों का प्रयोग करते है। लेकिन यहां इन शब्दो का प्रयोग प्रतीकात्मक होता है। इसका मतलब यह नही होता कि उस स्त्री का चेहरा चांद से मिट्टी ला कर बनाया गया है। ठीक इसी तरह जब हम किसी के बारे मे कहते है कि उसका सांड जैसा शरीर है, तो इसका कतई यह मतलब नही होता कि उस व्यक्ति ने ऐसा बनने के लिए सांड़ का मांस खाया है। अंग्रेजी मे बुल लाइक ग्रेन जैसी लोकोक्तियो का चलन है इसका मतलब यह नही निकाला जा सकता है कि सांड को अन्न के साथ खाया जाएगा बल्कि यहां इसका मतलब अनाज के पुष्ट दानो से है। ऋग्वेद मे ऐसे प्रतीकात्मक शब्दो की प्रचुरता है, जिससे अर्थ का अनर्थ निकालने वालो को सुविधा होती है।

उदाहरण के लिए पेश है कुछ बानगी- अथर्ववेद की IX.4.4 वी ऋचा मे लिखा है कि बछड़ा, ताजा दूध, दही और घी ये सब सांड के बीज है। IX4.1 वी ऋचा मे कहा गया है कि सांड के बिना दूध की कल्पना असंभव है। IX4.7 वी ऋचा मे कहा गया है कि घी सांड का बीज/चर्बी है। इन बेतुकी (प्रतिकात्मक)बातों का निहितार्थ यह है कि सांड़ के शुक्राणु से ही गाय प्रजनन के बाद बछड़ा, दूध,घी और दही देने लायक हो पाती है। इतना ही नही अथर्ववेद मे तो यज्ञ मे प्रयुक्त लकडि़यो का नाम पशुओ से मिलता है। लेकिन इसके आधर पर हम इस निष्कर्ष पर नही पहुंच सकते कि इन पशुओं की यज्ञ मे आहुति दी जाती थी तथा यज्ञ के बाद उसका भक्षण किया जाता था।

साफ शब्दो मे कहा जाए तो मामला यह है कि आज के हिसाब से बीस लाख रुपये ब्रिटिश कंपनी से लेकर पं. तारानाथ ने वैदिक शब्दो की व्याख्या इस तरह से की जिससे हिंदुओ का गाय के प्रति बना सदियो का विश्वास और आस्था संदेहात्मक हो गया.

सुधी पाठको को याद हो कि कारतूस मे चिकनाई के लिए गाय और सुअर की चर्बी प्रयुक्त होने की खबर ने ही ब्रिटिश कंपनी सरकार के खिलाफ भारत मे 1857 मे विद्रोह करा दिया था। इसके बाद से अंग्रेजो ने वैदिक ऋचाओ का हवाला दे कर गाय की पवित्रता खत्म करने और हिंदुओं द्वारा गो मांस खाने की भ्रांति फैलाने की साजिश रचे जाने लगी। इसभ्रांति को वैदिक ऋचाओ द्वारा सही प्रमाणित करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने युरोपियन और भारतीय विद्वानो को बजाप्ता नौकरी पर रखा हुआ था। कोलकाता संस्कृत कॉलेज के व्याकरण के व्याख्याता पं. तारानाथ ने कई खंडो मे प्रकाशित अपने शब्दकोश वाचस्पत्यम मे इसी विचारधारा पर काम करते हुए लिखा है- \क्चगोघन्। गां हन्ति हन्। गोहन्तरि। \क्चअर्थात तारानाथ के अनुसार गोघन् का मतलब गाय की हत्या करने वाला निकलता है। मालूम हो कि वाचस्पत्यम छह खंडो का शब्दकोश है जिसे संस्कृत के विद्वानो द्वारा आज भी उपयोग मे लाया जाता है। जबकि स्वामी प्रकाशानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक द ट्रू हिस्ट्री ऑफ रिलीजन ऑफ इंडिया की पृष्ट सं 274 मे गोघन्(गो हन)शब्द का मतलब लिखा है-ऐसे अतिथि जो उपहार के रूप मे गाय स्वीकार करते है। इससे संबंधित महर्षि पाणिनी का एक सूत्र भी है- \क्चदाशगोघनै सम्प्रदाने यहां सम्प्रदान मे दस गाय लेने वालो की चर्चा हो रही है। इस तरह से महर्षि पाणिनी ने गोघन्(गोहन) शब्द का मानक अर्थ गाय को प्राप्त करने वाला प्रतिपादित किया।

अब प्रश्न यह उठता है कि पाणिनी जैसे व्याकरण के विचार से पं.तारानाथ का इत्तफाक न रखने के पीछे क्या करण था। जाहिर है ऐसा करने के लिए पं. तारानाथ को धन की लालच दी गई हो। और ऐसा था भी. स्वामी सरस्वती के अनुसार ब्रिटिश सरकार ने इस शब्दकोश को लिखने के लिए 50 रुपये प्रति कॉपी के हिसाब से 200 प्रतियां खरीदने का लिखित अग्रिम आश्वासन पं. तारानाथ को 26 जनवरी 1866 मे फोर्ट विलियम से पत्रक संख्या 507 जारी किया गया था। इस तरह भ्रामक व्याख्याओ से युक्त शब्दकोश को पूरा करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने प. तारानाथ को तब रु. 10,000 देने का वादा किया जिसका मुल्यांकन आज के हिसाब से 20 लाख रुपये होता है। यानी साफ शब्दो मे कहा जाए तो मामला यह है कि आज के हिसाब से बीस लाख रुपये ब्रिटिश कंपनी से लेकर पं. तारानाथ ने वैदिक शब्दो की व्याख्या इस तरह से की जिससे हिंदुओ का गाय के प्रति बना सदियो का विश्वास और आस्था संदेहात्मक हो गया, और अंग्रेजो ने ऐसा इसलिए करवाया ताकि दोबारा ऐसे मुद्दो पर अंग्रेज सरकार को 1857 जैसे विद्रोह का सामना न करना पड़े।

  • ओ.पी. गुप्ता

6 thoughts on “गोमांस भक्षण का सच

  1. सत्य कहा जी ये बिलकुल ऐसा ही है जैसा तुलसी के “मसीत को सोयबो “को यानी मस्ती को सोयबो को मस्जिद मे जाकर सोता हू पढाने और समझाने की कोशिश तथाकथित कम्यूनिष्ट और धर्म निर्पेक्ष कहलाने की कवायद मे जुडे लोगो की होती है..:)

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  2. संजय बाबू, यह कहां की बहस उठा दी यार। जो चीजें बाबा आदम के जमाने से साबित हो चुकी हैं, उन्हें प्रश्नांकित करके आप दोबारा पहिए की खोज जैसा प्रयास कर रहे हैं? और ये अरुण जी जैसे सज्जन अब हमें तुलसीदास के लिखे का भी मतलब समझाएंगे? इन लोगों ने राम का सत्यानाश पहले ही कर डाला है, भले लोगों अब तुलसी को तो बख्श दो! जिस समय गोस्वामी तुलसीदास उत्तर भारत के सारे मंदिरों-मठों से संस्कृतनिष्ठ ब्राह्णण मठाधीशों द्वारा कुत्ते की तरह दुरदुराए जा रहे थे तब जाड़े की किसी हाड़ कंपाती रात में वे मस्जिद में न सोने जाते तो क्या ‘मस्ती’ में सोने आपके घर चले आते?

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  3. हमारा वेद जो विज्ञान है वह अल्पबुद्धि द्वारा एक काल्पनिक उपन्यास से ज्यादा नही समझा गया .
    हम दैनिक जीवन मे कई बार वैदिक जीवन जी जाते है मगर तब जब हम स्वस्थ रहते है मानसिक रूप से .
    अगर जो समझ नही पाये उसे मना किया गया पढ़ने से तो बुराई कहाँ से आ गई ? हाँ गलती हुईं है समझाने मे
    तुरंत अर्थ सहित व्याख्या हिन्दी मे या तात्कालिक भाषा मे आ गई होती .तो आज मूर्ख लोग इतराते नही.
    वैसे पंडित ताराकांत जी की तरह कम सम पंडित नही है जो वेद के शल्य चिकित्सा करने मे जुटे हैं.
    रोज नज़र रखता नही हूं पर नज़रें उन गिरे हुए पंडित पर स्वतः चली जाती है .
    गुप्ता जी के साथ आपका भी आभार ! अर्थ सहित व्याख्या जारी रहती तो कल्याण सम्भव है .

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  4. माफ़ करें संजय आप का विस्फोट फुस्स निकला.. यहाँ दिये तर्क पोले हैं.. गोघ्न के सही अर्थ को अंग्रेज़ो द्वारा रिश्वत लेकर किया गया गलत अर्थ बताना मूर्खतापू्र्ण है.. कोई भी भाषा का होशमंद विद्यार्थी इसे नहीं मानेगा..
    और दूसरी बात यह कि अगर ये सच होता भी तो सिर्फ़ यह साबित कर देने भर से कि हिन्दू गोमांस खाते थे, अंग्रेज़ क्या हासिल कर लेने वाले थे.. ये बात भी ये लेख साफ़ नहीं कर सका!

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