अपने ही लोगों को गाली देना बंद करो, प्लीज

इतिहासकार धर्मपाल ने कई बार यह बात कही थी कि हमारी सबसे बड़ी बुराई यह है कि हम अपने आप को गाली देते हैं. अपनी जाति व्यवस्था को गाली देते हैं, अपने समाज को गाली देते हैं, अपनी राजनीति को गाली देते हैं और कभी कभी तो अपने लोगों को भी गाली देते हैं. मानों हमसे हीन दुनिया में कोई है ही नहीं. वे कहते थे यह हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है. उस समय हमें उनकी यह बात समझ में नहीं आयी. अब जबकि वे नहीं है बार-बार उनकी यह बात याद आती है. उनके ऐसा कहने के पीछे दुनियादारी की कितनी गहरी समझ रही होगी यह भी समझ में आता है. आखिर हम दुनिया के सर्वश्रेष्ठ नस्ल अपने आप को क्यों नहीं मानते? क्यों हमें अपने ऊपर विश्वास नहीं रह गया है कि हम भी कुछ कर सकते हैं? क्या हम इतने अक्षम हो गये हैं कि अपने लोगों के लिए रोजी-रोटी के अवसर भी नहीं पैदा कर सकते?

पूरा का पूरा भारतीय प्रशासनिक तबका अपने आप को गाली दे रहा है. कहता है कि हमारी कोई आर्थिक समझ नहीं है. हमारी कोई प्रशासनिक समझ नहीं है. इसलिए यूरोप से जो व्यवस्थाएं निकली हैं उन्हें ही बिना किसी कांट-छांट के स्वीकार कर लो. उनकी आर्थिक प्रणाली को बिना यह सोचे समझे अपना लो कि इससे हमारा कितना भला या बुरा होगा. यह गाली देना नहीं तो और क्या है?

भारत की वर्ण व्यवस्था जातीय कटुता बनाने के लिए बनी हो ऐसा नहीं लगता. वह एक सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का आधार है. लेकिन हमने आंखमूंदकर उसे गाली ही दी है और कुछ नहीं. मानों इस बात की प्रतियोगिता खड़ी हो गयी है कि कौन अपने आप को कितना गाली दे सकता है. उसे प्रगतिशील कहा गया जो गाली देने में महारत हासिल रखता है. आस्था, धर्म, आध्यात्म, जीवन पद्धति सब ओर हमने अपनी ही व्यवस्था को ध्वस्त करने का काम किया है. और लगातार हम कमजोर होते चले गये हैं.

लगता है हमारा अंदर से आत्मविश्वास डगमगा गया है. अब कोई परंपरागत भारतीय तकनीकि की बात करे तो लोग हंसते हैं. जीवनशैली की बात करे तो लोग हंसते हैं. फण्डिंग खाकर हमारे यहां संस्थानों ने लगातार यही काम किया है. उन्होंने देश को अंदर से खोखला किया है. देश के लोगों का आत्मविश्वास कमजोर करने का काम किया है. यहां आकर समझ में आता है कि विदेशी लोग जो पैसा देते हैं आखिर में उसका मकसद क्या होता है. विदेशी पैसा लंबी रणनीति के तहत आता है जो देश का आत्मविश्वास कमजोर करता है. आपको आपके रास्ते से भटकाता है. आपकी प्राथमिकताओं में व्यतिक्रम पैदा कर देता है.

आज एक समझदार भारतीय की चिंता यही होनी चाहिए कि भारत का आत्मविश्वास कैसे लौटे? बाकी प्रगतिशील लोग भट्ठा बैठाने का काम तो कर ही रहे हैं.

2 thoughts on “अपने ही लोगों को गाली देना बंद करो, प्लीज

  1. बाकी प्रगतिशील लोग भट्ठा बैठाने का काम तो कर ही रहे हैं.
    आप की उक्त पंक्ति के अतिरिक्त पूरी पोस्ट से सहमत हूँ। गाली देने का अभ्यास ऐसा है कि यह आप से भी नहीं छूटा और उक्त पंक्ति में आप ने यही किया।
    सम्भव हुआ तो आप के इस आलेख पर लिखने की इच्छा है।

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  2. मेरी गलती पकड़ने के लिए धन्यवाद. हां आवेग में मैं भी वहीं लिख गया जिसका विरोध कर रहा था.
    आप इस कड़ी में आगे कुछ लिखें तो बात आगे बढ़ेगी.

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