सक्रियता के तीन तल

अफलातून जी ने मेरी पिछली पोस्ट पर लिखा है- मूल्य पर भी दर्शन दें. तो मुझे लगा कि मैंने जो कुछ लिखा वह दर्शन तो नहीं था. फिर लगा कि दर्शन की अवस्था तक पहुंचने की विधि पर क्यों न कुछ लिखा जाए. जो कुछ मेरी समझ है वह बोलता हूं.

सक्रियता के तीन तल होते हैं. एक, अधिसक्रियता जो भौतिक होती है. दो, सूक्ष्म सक्रियता जो मानसिक होती है. सक्रियता की एक तीसरी अवस्था भी होती है जो मौन होती है. पहले तल पर आप स्थूल माध्यमों का उपयोग करके संवाद करते हैं. सक्रियता के दूसरे तल पर आप संकल्प शक्ति के उपयोग मात्र से अपनी बात दूसरे तक पहुंचा सकते हैं. मैंने सोचा और बात आपके पास पहुंच गयी.

पहले के संवाद का माध्यम बुद्धि होती है जिसे आप विचार कहते हैं. दूसरे प्रकार की सक्रियता का माध्यम हृदय होता है जिसे आप भावना कहते हैं. सक्रियता का तीसरा तल होता है मौन. जब आप बुद्धि और हृदय दोनों का उपयोग बंद कर देते हैं. आप न सोचते हैं न भावना करते हैं. वाणी से मौन हो जाते हैं. विचार से मौन हो जाते हैं और भावनाओं से मौन हो जाते हैं. फिर तीसरे स्टेट का उदय होता है. बुद्धि काम करना बंद कर देती है. जब हृदय अच्छे-बुरे का भाव करना छोड़ देता है तब संवाद की तीसरी अवस्था का उदय होता है.

तीसरी अवस्था के इस संवाद अर्थात मौन को ही दर्शन कहते हैं. तंत्र इसे पश्यति के रूप में परिभाषित करता है. यहां आप प्रकृति के साथ एक हो जाते हैं. दादू महल बरीक हैं द्वै कै नाहीं ठांव. आप और प्रकृति दोनों एक हो गये. मैं और आप अलग बचे ही नहीं. भेद रहा नहीं. इसलिए दार्शनिक वह जो इस तीसरी अवस्था में हो. बुद्धि से ऊपर, भावनाओं से परे समभाव में स्थित व्यक्ति ही दार्शनिक हो सकता है. बुध्द ने इस अवस्था को सम्मासति कहा है.

सवाल है यह तो मौन है, शून्य है फिर यहां संवाद क्या होगा भला? लेकिन जो अनुभव की बात करते हैं वे जानते हैं यह है. यही वह रहस्य है जिसे समझने के लिए साधक होना पड़ता है. इस तीसरी अवस्था तक पहुंचने के लिए जो उपाय किये जाते हैं उन्हें योग कहा जाता है. योग का अभ्यास करने के लिए जो जीवन जिया जाता है उसे तपस्या कहते हैं.

संक्षेप में इन चार बातों को मौन समझिये जिनको योग के द्वारा प्राप्त किया जाता है.

1. शरीर की स्थिरता शरीर का मौन है.
2. वाणी को विराम वाणी का मौन है.
3. विचार की लयबद्धता बुद्धि का मौन है
4. भावातीत अवस्था हृदय का मौन है.

जब यह चार द्वार पार हो जाते हैं तो पंचम द्वार अपने आप खुल जाता है. सालों की तपस्या के बाद कभी-कभार क्षणभर के लिए यह अवस्था आती है. लंबी हो जाए तो समाधि हो गयी. और क्या बोलें. लिखने-बोलने से कुछ होता है. क्यों जी?

4 thoughts on “सक्रियता के तीन तल

  1. बड़ी गूढ़ बातें हैं। बिना किए समझना भी मुश्किल है। हम तो बस साधना में यकीन रखते हैं। मन और बुद्धि की साधना। इसी प्रयास में लगे हैं। देखिए किसी दार्शनिक आयाम तक पहुंच भी पाते हैं या नहीं।

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  2. बहुत गहरी बात है..पुनः पढ़ूँगा कुछ और हिस्सा ग्रहण करने के लिये.

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  3. एड्ब्राईट मैने वीब्गयोरलाईफ(अंकुर जी) के साईट मे देखा था फीर सोचा क्यो ना मै भी यही एड लगाऊं और लगा दीया और हफ्तो तक देखा पर कोई एड नही मीला और फीर सोचा हटा ही देता हुं तभी मैने एकाऊंट मे देखा की (ad review) 400 है फीर क्या था मै उसके बढ्ने दीया।
    यानी की आप एक adbrite का कोड डाल के छॊड दे फीर कुछ दीनो बाद(हो सक्ता है महीनो) आपका ad review बढ जाए और फीर कीसी का ईंतजार नही करना पडॆगा, लोगो की लाईन लग जाएगी (धयान रहे की ad approved आऊटॊमैटीक पर रहे)

    मेरी शुभकामनाएं आपके साथ है

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  4. हें हें हें …..
    हम ठहरे निरे मूढ आज तक अध्यात्म ,क्या ज्ञान क्या ,ज्ञानोत्पादन क्या …कुछ समझ नही आया महाराज !
    फिर भी कबीर और जायसी को जित्ता पढा है उत्ता समझ लेते हैं ।

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