औधिया जी यह हैडिंग आपने दी है?

आज ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के ब्लाग पर पंकज औधिया जी का एक भाषण है. वैसे ही जैसे हर हफ्ते होता है. लेख तो परंपरा वगैरह की बात करता है लेकिन हेडिंग बहुत तकलीफ देनेवाली लगी. कोशिश की वहीं टिप्पणी करूं लेकिन सफल न हो सका.

हेडिंग लगी है – विकास में भी वृक्षों को मौका मिलना चाहिए. मुझे इस हेडिंग और ऐसी सोच दोनों पर सख्त एतराज है. आप कौन हैं जो वृक्षों को मौका दे रहे हैं? यह तो वही सोच है जो अपने आप को पर्यावरण के ऊपर समझता है. यानी मैं पर्यावरण बचाऊंगा वाली मानसिकता. अरे, वे लोग अपना अपराध स्वीकार करें जो ऐसे विकास के हिमायती हैं.

वृक्षों को मौका मत दीजिए. आप तो और तेजी से उनके मौके छीन लीजिए. विकास ने नाम पर लोग यही कर रहे हैं. अभी गुजरात के एक फारेस्ट अधिकारी से मुलाकात हुई. वैसे भी मैं आईएएस लोगों से मिलने से कतराता हूं क्योंकि वे लोग अपने आपको परमबुद्धिमान समझते हैं लेकिन होते हैं सब मैनुपुलेटर. आईएएस/आईपीएस ये लोग कोई मिलनेवाले जीव नहीं होते. इनसे मिलने से अच्छा है किसी मजदूर के साथ घंटा दो घंटा समय बिता लो. मन पवित्र हो जाता है. लेकिन किसी ऐसे वरिष्ठ आदमी के साथ था कि गुजरात भवन जाना ही पड़ा.

उन्होंने बातचीत में एक ऐसी बात कही कि होश उड़ गये. उन्होंने कहा कि क्या करें साहब विकास का इतना प्रेशर है कि जंगल बचे भी तो कैसे. मेरा खोपड़ी झन्ना गयी. ऐसे मूर्खों के हाथ में विकास की बागडोर है जो अपने साथ-साथ पूरे चर जगत की नस काटने में लगे हुए हैं. लेकिन क्योंकि वे आईएएस हैं इसलिए अपनी इसी कूड़ा समझ के साथ विकास और जंगल का रिश्ता बनाने में लगे हुए हैं.

पंकज जी, मुझे ऐसी हेडिंग से पर्यावरण की बहुत नासमझी झलकती है जो अभी भी अपनेआप को पर्यावऱण से ऊपर समझता है. अरे पर्यावरण के बाहर है क्या? हम हाड़-मांस के लोग किस खेत की मूली हैं जी. तेज हवा बह जाये तो साफ. चले हैं विकास के बीच वृक्षों को मौका देने.

6 thoughts on “औधिया जी यह हैडिंग आपने दी है?

  1. हेडिंग है, ‘विकास में भी वृक्षों को जीने का मौका मिलना चाहिए’. आपको किस बात पर ऐतराज है, वो तो समझ में नहीं आया. लेकिन मुझे लगा कि आपने जो हेडिंग लिखी है, उसमें कुछ शब्द छूट गए हैं, सो बता दूँ.

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  2. शब्द छूटे नहीं बाद में जोड़े गये हैं.मेरा ऐतराज जिस भाव पर है वह आप भी बेहतर समझते हैं अनाम महोदय.

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  3. आप अतिवादिता के शिकार दिखते हैं इस पोस्ट में. अवधिया जी का आलेख सुंदर है. विकास की अंधी दौड़ में पर्यावरण विनाश के खतरों पर भी सोचने का कुछ समय आम आदमी निकाल पाये तो अच्छी बात होगी. और ऐसा नहीं लगता कि मूल हेडिंग बाद में सुधार गया होगा क्योंकि ब्लौगवाणी पर शीर्षक दिख रहा है “विकास में भी वृक्षों को जीने का मौका मिलना चाहिए”. ब्लौगवाणी एक बार पोस्ट उठा लेने के बाद शीर्षक नहीं बदलता, ऐसा पूर्व अनुभव है.

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  4. तिवारी जी, अब घोस्ट बस्टर जी की बात का जवाब दीजिये. ब्लॉगवाणी पर शीर्षक वही है जो मैंने लिख कर आपको बताया कि कुछ गलती हो गई लगती है.

    आप अवधिया जी के लेख को भाषण कह रहे हैं. एक तरफ़ तो आप भी विकास के चलते हो रहे पर्यावरण विनाश को रोकने की बात कहते हैं, दूसरी तरफ़ अवधिया जी के लेख को भाषण बताते हैं. ये बात ठीक है क्या? मुझे लगता है आपकी पोस्ट का आधार ही ग़लत है. और आप वहाँ टिपण्णी करना चाहते थे तो कर दिया होता. आपका हाथ किसी ने पकड़ रखा था क्या? कम से कम ऐसी निरर्थक पोस्ट से बच जाते. साथ में घोस्ट बस्टर जी के सवाल से भी, जिसका जवाब शायद ही आपके पास हो.

    वही अनाम, जिसे आपने झिड़क दिया

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  5. घोस्ट बस्टर जी,
    ब्लागवाणी पिंग बैक करता है इसलिए जो बदलाव आप अपनी साईट पर करते हैं वहां भी वह बदलाव थोड़ी देर में हो जाता है.

    मसला यह नहीं है. मसला वह समझ है जो पर्यावरण को अपनी दया का पात्र समझता है. अगर ऐसा है तो हो जाने दीजिए मुझे अतिवादी. कौन फिकिर करता है.

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