कर्नाटक पर टिकी निगाह

उमेश चतुर्वेदी
इसी साल 29 फरवरी को जब वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने आम बजट में मध्य वर्ग को जिस तरह रेवड़ियां बांटीं, उससे वक्त से पहले ही आम चुनाव होने के कयास लगाए जाने लगे। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री चिदंबरम की जोड़ी को उम्मीद रही होगी कि बाज़ार उनका जोरदार स्वागत करेगा। लेकिन जिस शेयर बाजार के दम पर प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री की ये जोड़ी गर्व करते नहीं अघा रही थी, वह धड़ाम से औंधे मुंह जा गिरा। गिरावट का ये दौर अब भी जारी है। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का जो सूचकांक 20 हजार के आंकड़े को पार कर गया था, वह 15 से 17 हजार के आसपास बना हुआ है। इस दौरान लाखों निवेशकों के हजारों-हजार करोड़ रूपए डूब गए हैं। इसके साथ ही वक्त से पहले चुनाव होने के राजनीतिक पंडितों की कयासबाजी भी कमजोर पड़ती नजर आ रही है।
मुद्रा स्फीति की दर सात फीसदी के करीब रहने के बाद आम लोगों की थाली का इंडेक्स इतना बढ़ गया है कि न सिर्फ निम्न मध्यवर्गीय परिवारों की थाली सिकुड़ती जा रही है, बल्कि मध्यवर्गीय परिवार भी ये सोच-सोच कर परेशान है कि वह अपने परिवार का पेट किस तरह भर पाएगा। महंगाई को लेकर ना सिर्फ गांव, बल्कि महानगरों के चौराहों पर भी केंद्र सरकार की आलोचना तेज होती जा रही है। इसे देखते हुए अब शायद ही कोई ये मानने को तैयार होगा कि सोनिया गांधी अपने प्रधानमंत्री को वक्त से पहले चुनाव कराने की झंडी देंगी। महंगाई का आलम ये है कि अब केंद्र की प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता उप चुनावों में जोरशोर से ये नारा लगाते फिर रहे हैं – जब-जब है कांग्रेस सत्ता में आई, तब –तब है महंगाई लाई। 1998 में एक प्याज ने भारतीय जनता पार्टी को दिल्ली में इतने आंसू रुलाए थे कि उसके तमाम कद्दावर नेताओं का दावा धरा का धरा रह गया और शीला दीक्षित प्याज के सहारे दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो गईं। लेकिन आज सिर्फ प्याज ही नहीं, थाली की बुनियादी चीजें भी इतनी महंगी हो गईं हैं कि आम आदमी इस मार को कराहते हुए झेलने को मजबूर हो गया है। प्याज के सहारे सत्ता के सिंहासन पर आई कांग्रेस को ये सब पता है। लिहाजा अब बाजार को सुधारने और महंगाई को काबू करने की तैयारियां केंद्र सरकार ने शुरू कर दी है। कैबिनेट ने चोटी के अधिकारियों को जिम्मेदारी दी है कि वे जरूरी चीजों की कीमतों पर नजर रखें। गैर बासमती चावलों के निर्यात पर रोक लगा दी गई। खाद्य तेलों और पाम ऑयल के साथ ही दालों के आयात का भी फैसला किया गया है। लेकिन महंगाई है कि रूकने का नाम नहीं ले रही है।
महंगाई का ये बढ़ता ग्राफ ही है कि कर्नाटक विधानसभा चुनावों की रणभेरी बजते ही प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने अपनी चुनावी रणनीति बदल दी है। बीजेपी पहले जनता दल – सेक्युलर के अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री हरदनहल्ली डोड्डेगौड़ा देवेगौड़ा की सत्ता लिप्सा और धोखाधड़ी को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में थी। लेकिन अब उसने बढ़ती महंगाई को ही चुनावों के दौरान उछालने की तैयारी में जुट गई है। पार्टी को लगता है कि येदुरप्पा सरकार के महज एक हफ्ते में पतन की बजाय महंगाई को चुनावी मैदान में उछालना ज्यादा फायदेमंद रहेगा। इसलिए अब बीजेपी हर मंच से थाली के बढ़ते इंडेक्स और घटती चीजों को मुद्दा बनाने में जुट गई है।
बढ़ती महंगाई पर लगाम लगाने में अब तक नाकाम दिख रही कांग्रेस को सिर्फ और सिर्फ अपने युवराज राहुल गांधी के रोड शो पर ही भरोसा है। उसे लगता है कि देश की जनता महंगाई को राहुल गांधी के सुंदर-सलोने चेहरे के सामने भूल जाएगी। उसे लगता है कि राहुल की प्रभावशाली आवाज के सामने आटा-दाल और तेल की बढ़ी कीमतें वोटरों को याद ही नहीं रहेगी। लिहाजा उसका सारा जोर सांप्रदायिकता की मुखालफत और अपने युवराज की करामात पर टिका हुआ है।
वैसे महंगाई रोकने के प्रभावी उपाय तो नहीं किए जा रहे हैं – लेकिन इसे जायज ठहराने के लिए कांग्रेस सरकार कथित एलीट मीडिया का सहारा ले रही है। केंद्रीय मंत्रालयों के हवाले से इन दिनों अंग्रेजी मीडिया और गुलाबी रंग वाले आर्थिक अखबारों में महंगाई को जायज ठहराया जा रहा है। कहा जा रहा है कि अपने यहां से ज्यादा महंगा गेंहूं तो थाईलैंड और यूक्रेन में बिक रहा है। बांग्लादेश और ब्राजील में चावल की कीमतें भारत से ज्यादा हैं। अफ्रीकी देशों में भी महंगाई अपने चरम पर हैं। लेकिन ये तर्क देते वक्त सरकारी विभाग और सरकार के प्रबंधक भूल जाते हैं कि भारत में अब भी चार लाख टन से ज्यादा गेंहूं का स्टॉक है। यूपी के किसानों के खेतों में आलू सड़ रहा है। उन्हें रखने का कोई माकूल इंतजाम ना तो केंद्र सरकार ने किया है और ना ही राज्य सरकार ने। चावल का भी करीब 56 हजार टन बफर स्टॉक पड़ा है। खुद ये आंकड़े केंद्र सरकार के खाद्य निगम ने ही जारी किए हैं। इसके बावजूद आम आदमी की थाली क्यों महंगी होती जा रही है, इसका माकूल जवाब केंद्र सरकार के पास नहीं है।
कहने को तो केंद्र में यूपीए सरकार का समर्थन कर रहे वामपंथी दलों को भी बढ़ती महंगाई से परेशानी है। गाहे-बगाहे वे सरकार को चेताते भी रहते हैं। चेतावनी देते-देते चार साल का वक्त गुजर गया है। लेकिन ना तो सरकार अपने एजेंडे से पीछे हटी ना ही महंगाई रूकी। अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को लेकर भी वामपंथी दल सरकार की लानत- मलामत करते रहे। सरकार गिराने तक की धमकी दी गई। इन धमकियों से सरकार के प्रबंधकों की परेशानियां भी बढ़ीं। बेकाबू महंगाई को लेकर भी वामपंथी दल एक बार फिर लाल हुए। लेकिन करार 123 तो टल गया है – लेकिन महंगाई अब भी बेकाबू है। इसके बावजूद सरकार की सेहत पर कोई असर पड़ता नजर नहीं आ रहा।
इन हालात में सबकी नजरें 25 मई पर लगी रहेंगी। तब तक संसद का बजट सत्र भी निबट जाएगा। कर्नाटक के नतीजे इसी दिन आएंगे। अगर कांग्रेस ने सत्ता की दौड़ में बाजी मार ली तो ये तय मानिए कि केंद्र सरकार वक्त से पहले जनता का आदेश मांगने की तैयारी में जुट जाएगी। हालांकि इसी साल राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में विधानसभा के चुनाव होने हैं। गुजरात और हिमाचल में कांग्रेस की हार ने कांग्रेस के मनोबल को तोड़ने में अहम भूमिका निभाई। तब से कांग्रेस अपनी खोई साख बचाने की कोशिश में जुटी हुई है। अगर राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के नतीजे कांग्रेस के पक्ष में आए तो देश को वक्त के पहले चुनाव के लिए तैयार रहना होगा।
वैसे वाम दलों ने जितनी बंदर घुड़की केंद्र सरकार को दी है, उससे केंद्र सरकार परेशान तो है। यही वजह है कि कांग्रेस भी मौजूदा हालात की बजाय और ताकत में आना चाहती है। वह वामदलों पर अपनी निर्भरता कम करना चाहती है। लेकिन लाख टके सवाल ये है कि केंद्र सरकार की ये मंशा कर्नाटक की जनता पूरा करने में कितना मदद करती है।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s