विस्फोट, एक अच्छी शुरुआत

अच्छी क्यों?

भई मुझे न्यौता दिया है तो अच्छी ही हुई न! कवियों और पत्रकारों के बीच थोड़े बहुत आम इंसानों का भी होना ज़रूरी है।

न हो तो उबकाई आती है, कवियों और पत्रकारों को भी, और आम इंसानों को भी।

यह बात अच्छी है कि विस्फोटक जी यानी संजय तिवारी जी ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि यह चिट्ठा सामूहिक है, और यहाँ विज्ञापन नहीं छपेंगे। आपको धन्यवाद, स्पष्टवादिता के लिए।

बस अब बहुत हुई चाटुकारिता 🙂

मुद्दे की बात करते हैं।

मितभाषी होने का नुकसान यह है कि लोगों में गलतफ़हमी पैदा हो जाती है। खुद को नहीं लगता कि कुछ बोलना ज़रूरी है क्योंकि मन में तरह तरह के विचारों की तरंगें उठती ही रहती हैं, पर यह विचार आगे तक न पहुँचें तो बात बनती नहीं, सर्किट पूरा नहीं होता।

यूँ तो इन डब्लू डब्लू ऍफ़ सरीखे पूर्वरचित टीआरपी-उत्प्रेरक नाट्यमंचनों को भी देख देख कर उबकाई आ चुकी है लेकिन यदि इस सब के चलते अगर और हिंदी के लेखक जाल पर बढ़ते हैं, हिंदी में सामग्री बढ़ती है[2002]-[2007], तो क्या बुरा है, यही सोच के आगे बढ़ रहे हैं हम लोग।
एक सवाल आप सब कवियों, पत्रकारों और आम इंसानों के लिए जाते जाते छोड़ रहा हूँ, इस वादे के साथ कि यहाँ पर हर हफ़्ते कम से कम एक लेख लिखूँगा –
क्या आप सिर्फ़ अपने चार घंटे के टीआरपी के लिए लिखते हैं?

विस्फोटक जी को पुनः धन्यवाद। अब हम होते हैं, नौ दो ग्यारह नहीं, विस्फोटित!

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