जुडीशियरी और विधायिका में जूतम-पैजार : सूचना का अधिकार

चीफ़ जस्टिस के.जी.बालाकृष्णन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सूचना के अधिकार के दायरे से उनका कार्यालय बाहर है इस लिये उनसे किसी सूचना की उम्मीद न करी जाए लेकिन दूसरी ओर लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी और विधि मंत्री एच.आर.भारद्वाज ने इस बात का विरोध किया है। विधि,कार्मिक एवं न्याय के लिये गठित करी गयी खड़ी समिति (स्टैंडिंग कमिटी) के कुर्सीमानव(चेयरमैन) ई.एम. सुदर्शननटचिअप्पन ने कहा है कि जब प्रधानमंत्री तथा लोकसभा जैसे बड़े संसदीय अधिकार रखने वाले कार्यालय इसके दायरे में आते हैं तो फिर संपूर्ण न्यायपालिका भी इसके दायरे में आनी ही चाहिये और आती भी है। लेकिन अब हो ये रहा है कि जो सपना मैं बरसों से देख रहा था कि न्याय खुले प्रांगण में क्यों नहीं होता और जस्टिस आनंद सिंह जैसे लोग खुद दसियों बरस न्याय के लिये जूझते क्यों रहते हैं और न्याय नहीं मिल पाता? जस्टिस आनंद सिंह ने जब न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ें कुरेदना शुरू करीं तो ये हाल हुआ कि आज मुफलिसी से जूझ रहे हैं, राजद्रोह के मुकदमें में सभी भाइयों को फंसा दिया गया,पांच साल तक अंडरट्रायल रहे लेकिन अंततः मुकदमा जीते लेकिन अभी तक माफ़िया का भूत उन्हें और उनके परिवार को भुखमरी के दिन दिखा रहा है। अब न्यायपालिका और विधायिका एक दूसरे पर कीचड़ फेंक रही हैं। ये वो प्रणालियां हैं जो कि लोकतंत्र को सही तरीके से चलाने के लिये बनाई गयी थीं लेकिन स्वार्थ की दीमक ने इन्हें चाट कर खोखला कर डाला लेकिन सूचना का अधिकार शायद एक मल-मूत्र भरी हंड़िया की तरह हो गया है जिससे हर आदमी बचना चाह रहा है चाहे वो न्यायपालिका हो,कार्यपालिका हो या फिर विधायिका बल्कि मेरा तो विचार है कि मीडिया को भी इस दायरे में लाना चाहिये और साथ ही उन तमाम NGOs को भी जो मलाई छान रहे हैं अपने मंत्री चाचा या मामा के कारण।

One thought on “जुडीशियरी और विधायिका में जूतम-पैजार : सूचना का अधिकार

  1. खड़ी समिति और कुर्सीमानव मजाक के लिए तो अच्छा है लेकिन प्रभावकारी लेखन करते समय ऐसे प्रयोगों से बचना चाहिए. अच्छा विषय उठाया है आपने.

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