" धर्मान्तरण "

कल तक उमर था
नाम मेरा
आज से उमेश है

चीख पड़े
धर्म के नुमायिंदे
वो कहते हैं –
मैं उमर नहीं
वो कहते हैं –
मैं उमेश नहीं
उनका रहीम मेरा नहीं
उनका राम मेरा नहीं
अब ना हाथ उठाऊ मैं
अब ना हाथ जोडुँ मैं

मुझसे मेरा विश्वास छीनकर
जीने की चाह छीनकर
वो कहते हैं –
गलती की मैंने
बिना पूछे किया
धर्मान्तरण

पूछता तो
मुझे समझाते
रहीम भक्त के घटने पर
भव्य आयोजन करते
राम भक्त के बढ़ने पर

क्या मेरा विश्वास कुछ नहीं
क्या मेरी ईच्क्षा कुछ नहीं
तो फिर क्यों
खर्च करते हैं लाखों
धर्मान्तरण के नाम पर

— पिछले वर्ष भोपाल के उमर ने सिन्धी लड़की से विवाह करने के लिए हिंदू धर्म अपना लिया था। सो, काफी बवाल हुआ था। पता नही अब वह दोनों कैसे हैं ? मैंने बस उन्हें याद करने के लिए यह कविता लिखीं।

4 thoughts on “" धर्मान्तरण "

  1. धर्मान्तरण व्यक्ति को नही करना चाहिये चाहे वो किसी भी धर्म का हो, क्यो कि एक के पीछे कितनी जाने जाती हे,धर्म से उपर इन्सानियत हे, हम इन्सान बन जाये काफ़ी हे जो लेवेल लगा हे धर्म का लगा रहे, क्यो कि उसे उतारने से हमारा कोई भला नही हो सकता, लेकिन कई मासुम मरते हे .

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  2. धर्म व्यक्ति के लिये है या व्यक्ति धर्म के लिये….
    सुन्दर रचना है….
    साधुवाद स्वीकारें

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  3. मित्र,
    ये तो सनातन काल से चली आ रही है, हम सुरु से ही धार्मिक प्रविरती के रहे हैं. परन्तु इंसान शायद ही बन पाए. धर्म ने हमें लड़ाया, फिर भी हम धार्मिक हैं, धर्म ने हमसे इंसानियत छीन ली फिर भी हम धार्मिक हैं.
    सुन्दर रचना है.
    बधाई

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