हंस का ध्वंस

सब कुछ देख सुन लेने के बाद यही दो शब्द शेष रह जाते हैं। मुंशी जी ने अपनी प्रिय साहित्यिक पत्रिका का नाम हंस शायद इसीलिए रखा होगा कि हंस के पास ही नीर क्षीर का विवेक होता है। लेकिन 31 जुलाई 2013 को दिल्ली के ऐवाने गालिब सभागार में जो कुछ हुआ वह उसी नीर क्षीर विवेक के लोप की दास्तान बयान करता है जो दूसरे शब्दों में कहें तो हंस का विध्वंस है। तीन दशक से हंस का संपादन कर रहे राजेन्द्र यादव ने आखिर ऐसी कौन सी खता कर दी थी कि उनके अपने ही उनके ऊपर आक्रांता बनकर टूट पड़े हैं?

क्या मुंशी जी का नाम और काम किसी खास पंथ का बंधुआ मजूर बनकर रह गया है जिसे दूसरा कोई निहार भी नहीं सकता है? किसी गोविन्दाचार्य या फिर किसी अशोक वाजपेयी के मौजूद भर रह जाने से कोई वरवर राव या कोई अरुंधती रॉय इतना नाराज क्यों हो जाते हैं कि आने से मना कर देते हैं? क्या मुंशी जी ने अपने पूरे जीवन जो साहित्य रचा उसका यही एक सूत्र था कि उनके नाम पर एक नागरिक दूसरे नागरिक से इतनी घृणा करे कि मेरे नाम पर भी साथ आने को राजी न हों?

मामला दिल्ली का है और मुंशी प्रेमचंद के जन्मदिन पर हंस द्वारा आयोजित 28वे कार्यक्रम से जुड़ा हुआ है। 31 जुलाई को प्रेमचंद को याद करने के बहाने राजेन्द्र यादव साहित्यिक जमावड़ा करते हैं हर साल। इस साल भी किया। लेकिन इस साल उनकी उदारता उनके लिए अभिशाप बन गई। वक्ताओं की सूची में उन्होंने दो नाम ऐसे रख लिये गये जिन्हें उस खेमे का नहीं माना जाता है जिस खेमे के राजेन्द्र यादव माने जाते हैं। ये दो नाम थे- गोविन्दाचार्य और अशोक वाजपेयी। एक राजीनीति से समाज में समा चुका है और दूसरा साहित्य का सरल सा नाम भर है। इन दो नामों का बाकी नामों ने इतना मुखर विरोध किया कि राजेन्द्र यादव के लिए उनके ही समर्थक रजाकर होकर सोशल मीडिया पर टूट पड़े हैं। अरुन्धती रॉय और तेलुगु कवि वरवर राव।
अरुन्धती का आरोप कि उनसे बिना पूछे उनका नाम शामिल कर लिया गया। क्या करें? यह तो साहित्यिक धोखाधड़ी है। इसलिए उन्होंने बहिष्कार कर दिया। यह तो राजेन्द्र यादव जाने कि अरुन्धती के बयान में कितनी सच्चाई है लेकिन तेलुगु कवि कार्यक्रम में शामिल होने के लिए दिल्ली तक आकर ऐवान-ए-गालिब नहीं आये। उनकी चिट्ठी आई। विरोध वाली। लिखा कि ”अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य इस परम्परा के मद्देनजर किसके पक्ष में हैं? राजेन्द्र यादव खुद को प्रेमचंद की परम्परा में खड़ा करते हैं। ऐसे में सवाल बनता है कि वे अशोक वाजपेयी और गोविंदाचार्य को किस नजर से देखते हैं? और, इस आयोजन का अभीष्‍ट क्या है?” विरोध की इस चिट्ठी में वे जिस परंपरा का जिक्र कर रहे हैं वह जनवादी परंपरा है। जनता को जनता से जोड़नेवाली। वह जनवादी परंपरा जो कारपोरेट कल्चर का विरोध करती है और एक खास उग्रत्व के उभार का निषेध करती है। खुद को आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में प्रतिबंधित जनवादी क्रांतिकारी मोर्चा के अध्यक्ष बतानेवाले वरवर राव संवेदनशील कवि भी कहे जाते हैं.

वरवर राव के विरोध और बहिष्कार के अपने तर्क हैं और उन तर्कों से वे पूरी तरह सहमत है लेकिन क्या उनके तर्क इतने लोकतांत्रिक हैं कि उनसे हर कोई सहमत हो चले? वरवर राव जिस गोविन्दाचार्य को हिन्दूवादी घोषित करके उसका बहिष्कार कर चले थे, अब तक उन्हें खबर मिल ही गई होगी कि उस हिन्दूवादी ने भी वही बोला जो बर्बर राव शायद उतनी स्वीकार्यता से नहीं बोल पाते। आखिरकार गोविन्दाचार्य ने भी तो यही कहा कि जेपी के जमाने में जो लोग तानाशाही को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करना चाहते थे आज वे लोग भी आंशिक तानाशाही के समर्थक हो चले हैं? यह आंशिक तानाशाही क्या है इसे बताने की जरूरत नहीं है। तब तो और भी नहीं जब खुलेआम गोविन्दाचार्य नरेन्द्र मोदी के खिलाफ बोलते चले आ रहे हों और गुजरात दंगों के लिए दोषी मानने से भी नहीं हिचकते हों?

और दूसरी बात। वरवर राव आते तो वे भी सुनते कि गोविन्दाचार्य के गुरू भी एक कामरेड थे। काशी के कामरेड मोहनलाल तिवारी। गोविन्दाचार्य भले ही साहित्यकार न हों और प्रेमचंद से उनका रिश्ता पाठक भर का हो लेकिन मोहनलाल तिवारी साहित्यकार थे और उसी धारा के साहित्यकार थे जिस धारा के लोग प्रेमचंद को अपना कॉपीराइट मानते हैं। यह संयोग ही कहा जाएगा कि 30 जुलाई को मोहनलाल तिवारी का जन्मदिन होता है और 31 जुलाई को मुंशी जी का। उनके बेटे विवेक शंकर अपने पिता को याद करते हुए बताते हैं कि हर साल 31 जुलाई लमही में ही बीतती थी, अपने पिता के साथ। राजेन्द्र यादव तो बेचारे लमही जाकर प्रेमचंद को नहीं पुकार पा रहे हैं लेकिन मोहनलाल तिवारी लमही में मुंशी जी को पुकारते थे। और पुकारते ही नहीं थे, उनके पूरे जीवन में वामपंथ ऐसा समाया था कि उनकी साहित्य रचना का आधार समतामूलक समाज ही बना रहा। उन स्वर्गीय मोहनलाल तिवारी का अगर गोविन्दाचार्य ने अपने गुरू के बतौर जिक्र किया तो क्या गुनाह कर दिया?

वरवर राव की चिट्ठी को आधार बनाकर बहुत सारे कामरेड सोशल मीडिया के मैदान में कूद पड़े हैं। उन्हें बहस करने की अच्छी आदत होती है। वे बहस करेंगे। भांति भांति से बहस करेंगे। तर्कों के अंबर तले कुतर्कों का अंबार लगायेंगे लेकिन क्या कोई यह बताएगा कि छूआछूत की यह बर्बर परंपरा उस ब्राह्मणवाद से किस तरह भिन्न है जिसके विनाश के लिए समूचे समतामूलक विचार को धारा में तब्दील कर दिया गया है? अगर धाराएं इतनी संकीर्ण और तंग घाटियों से गुजरती हैं तो विचार के लिए जगह कहां बचेगी? और किसी धारा से विचार ही गायब हो गया तो उस धारा के साथ बहनेवाले वाले लोग बहते हुए कहां चले जा रहे हैं? अगर वरवर राव खुद अपनी चिट्ठी में यह कहते हैं कि अभिव्यक्ति को प्रतिबंधित किया जा रहा है तो उनका यह बहिष्कार क्या कौन सी स्वीकारोक्ति है? अगर सब अपने अपने दायरे में दूसरों का प्रवेश वर्जित कर सकते हैं तो फिर किसी सिरफिरी सरकार और वरवर राव में फर्क क्या रह जाता है?

हंस तो विवेकशील है। उसको क्या फर्क पड़ता है कि दूध में कितना पानी है कि पानी में कितना दूध है? वह तो क्षीर का साथी है, उसे नीर से भला क्या काम? और अगर हंस का यही विवेक जाता रहा तो वह हंस कितना हंस रह पायेगा? सवाल राजेन्द्र यादव से नहीं लेकिन उन वरवर राव और अरुन्धती राय से जरूर पूछा जाना चाहिए जिन्होंने मुंशी जी के हंस के विध्वंस का काम किया है।

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