सिक्योरिटी स्टेट होने का खतरा

कभी जिया उल हक के लिए भी इसी तरह अमेरिका ने लाल कालीन बिछाया था जैसे आज प्रधानमंत्री मोदी के लिए बिछा रहा है। ऐसा नहीं है कि अमेरिका का तथाकथित उदारवादी समाज नहीं जानता था कि जनरल जिया किस मिट्टी के बने हैं लेकिन अमेरिका को उससे क्या? उसे तो अफगानिस्तान में मुजाहिद चाहिए थे जो सोवियत संघ से लड़ सके। जिया की नीति पर बेनजीर भी चलीं और दो दशकों तक भारत के बार बार कहने के बाद भी कश्मीर में होनेवाले आतंकवाद पर अमेरिका आंख मूंदें बैठा रहा। उस वक्त अमेरिका को कश्मीर में आतंकवाद नहीं दिख रहा था क्योंकि पाकिस्तान अमेरिका का बड़ा हित साध रहा था।

आज कमोबेश उसी स्थिति में अमेरिका भारत संबंध हैं। कुछ फर्क तो है लेकिन लेकिन अमेरिका का लाड़ प्यार वैसा ही है जैसा उस वक्त पाकिस्तान से था। यह ठीक है कि अमेरिका भारत को आर्थिक मदद नहीं दे रहा, यह भी ठीक है कि भारत अमेरिका से भीख लेने की बजाय सैन्य साजो सामान की खरीदारी कर रहा है लेकिन इस खरीदारी में बेतहाशा बढोत्तरी हुई है। अमेरिका से दशक भर पहले 300 मिलियन डॉलर की रक्षा खरीदारी आज 14 बिलियन डॉलर पहुंच गयी है। यहां तक भी कोई खास दिक्कत नहीं है। भारत सरकार जिससे चाहे रक्षा उपकरण खरीदे। सोवियत संघ के पतन के बाद अमेरिका के अलावा दुनिया में कोई दूसरा ऐसा देश है भी नहीं जिसके साथ आगे बढ़ कर भारत रक्षा खरीदारी का संतुलन साध सके। लेकिन खतरा शुरू होता है इसके बाद।

अमेरिका एक सिक्योरिटी स्टेट है। पूरी दुनिया का जितना रक्षा बजट है उसका 40 परसेन्ट अकेले अमेरिका खर्च करता है। लेकिन भारत न तो उस मुताबिक अपना रक्षा बजट खर्च कर सकता है और न ही खुद को सिक्योरिटी स्टेट घोषित कर सकता है। भारत की जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है। भारत का भविष्य एक वेलफेयर स्टेट के रूप में ही सुरक्षित है। बजट का जो हिस्सा हम डिफेन्स पर खर्च कर रहे हैं वह हमारी अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिहाज से कम नहीं है। जिस देश में आज भी आधे पेट खाकर लोग सोने को मजबूर हों, जिस देश में आज भी पीने का साफ पानी सबसे बड़ी समस्या हो उस देश में सालाना पचास बिलियन डॉलर का खर्च डिफेन्स पर किया जाना कम नहीं है। हम अगर चीन या सऊदी अरब का मॉडल लागू करना चाहते हैं तो इसका मतलब है कि हम गलत दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। अमेरिका के बाद सऊदी अरब और चीन ही ऐसे दो देश हैं जो डिफेन्स पर सबसे ज्यादा खर्च करते हैं। तो क्या हम इस डिफेन्स जंग में चीन या सऊदी अरब को पछाड़कर दूसरी जगह पाना चाहते हैं? और पाना भी चाहते हैं तो क्यों?

जो लोग यह तर्क देते हैं वे भूल जाते हैं कि अमेरिका के पास डिफेन्स की सारी तकनीकि और कंपनी उनकी अपनी है। उनकी अर्थव्यवस्था युद्ध की अर्थव्यवस्था है। जिस दिन दुनिया में जंग होना बंद हो जाएगी अमेरिका का इंतकाल हो जाएगा। उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को इस तरह से मॉडल कर लिया है कि एक तरफ जंगी साजो सामान बनानेवाली कंपनियां हैं तो दूसरी तरफ वे बहुराष्ट्रीय कंपनियां जो पूरी दुनिया में घूमकर व्यापार करती हैं और मुनाफा लेकर अमेरिका जाती हैं। चीन भी अब विश्व के मानचित्र पर इसी मॉडल के साथ उभरने की कोशिश कर रहा है और आज दुनिया की सबसे बड़ी वित्तीय कंपनी अमेरिका की नहीं बल्कि चीन की है। तो क्या भारत ने भी बुनियादी तौर पर सोच लिया है कि उसे सैन्य पूंजीवाद के उसी मॉडल पर आगे बढ़ना है जिस पर अमेरिका और चीन बढ़ रहे हैं?

अगर इस लिहाज से देखें तो भारत सैकड़ों साल पीछे चल रहा है। फोर्ब्स की ताजा लिस्ट के मुताबिक दुनिया की दो हजार बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में भारत की पचास कंपनियां हैं जबकि अमेरिका की पांच सौ। आज भारत में कोई भी बड़ा ब्रांड ले लीजिए वह भारतीय नहीं होगा। टाटा रिलायंस और महिन्द्रा जैसे कुछ घरेलू कंपनियों को छोड़ दें तो भारत के पास कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय ब्रांड नहीं है। तकनीकि के फील्ड में भी दुनिया जहां जा रही है उसका बादशाह अमेरिका है। अब तक आपकी जिन्दगी का हिस्सा बन चुके गूगल फेसबुक और ट्विटर तीनों बड़ी कंपनियां अमेरिकी हैं। चीन ने इन्हें जवाब देने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो सका। भारत के लोग उन कंपनियों के सीईओ तो बन सकते हैं लेकिन भारत में ऐसी कोई कंपनी खड़ी नहीं कर सकते। और ऐसा इसलिए क्योंकि भारत में वह माहौल आने में अभी दशकों लग जाएंगे जहां आपका आइडिया आपकी पूंजी पर भारी पड़ेगा।

तो फिर हम अमेरिका के साथ डिफेन्स साझीदारी को कहां तक ले जाना चाहते हैं? भारत एक पूंजीवादी समाजवाद तो झेल सकता है लेकिन वह पूंजीवाद इसके लिए बर्बादी का सबब बनकर आयेगा जिस पर अमेरिका और चीन चल रहे हैं। अमेरिका के पास इतनी आबादी नहीं है और चीन के पास आबादी है तो उसे नियंत्रित करने के लिए साम्यवाद है। भारत के पास आबादी भी है और लोकतंत्र भी। इसलिए पूंजीवाद का वह मॉडल हमारे लिए एक डाइनामाइट होगा जिसकी तरफ हम दौड़ लगा रहे हैं। आंशिक रूप से हमारा सिक्योरिटी स्टेट में तब्दील होने का मतलब है हम अपने आस पास ऐसे दुश्मनों की तलाश शुरू कर दें जिनसे हम जंग लड़ सकें। जंग की अर्थव्यवस्था के लिए जंग का होना जरूरी होता है। अगर कि हम भारत को पूंजीवादी सिक्योरिटी स्टेट बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं तो अगला सवाल यह उठता है कि हमारा वह दुश्मन है कौन? क्या वह दुश्मन पाकिस्तान है या कि चीन?

आप समझें न समझें लेकिन अमेरिका का नया सिक्योरिटी समीकरण आपको यही समझाने की कोशिश कर रहा है। डिफेन्स के जिस मेक इन इंडिया में अमेरिका भागीदारी करने के लिए भागदौड़ कर रहा है उसकी मकसद भारत को उसी तरह एक बफर स्टेट है जैसे कभी अमेरिका और सोवियत संघ के बीच पाकिस्तान बन गया था। अमेरिका के थिंक टैंक बार बार यह बात कह रहे हैं चीन के एक तरफ साउथ कोरिया और जापान तो दूसरी तरफ भारत ही वह जगह होगी जो संभावित “जंग” में चीन का मुकाबला करेगी। इसलिए जिस अमेरिका ने जापान को हिरोशिमा का दर्द दिया था वही अमेरिका जापान को फाइटर प्लेन दे रहा है। जिस वियतनाम से उसने जंग में शिकस्त खाई उस वियतनाम को हथियार देने से पाबंदियां हटा रहा है। उसकी इस घेरेबंदी में भारत को भी एक मोहरे के तौर पर इस्तेमाल करने की नीति पर अमल शुरू हो गया है। इसी को पूरा करने के लिए भारत और अमेरिका के बीच एक सैन्य समझौता होने जा रहा है जिसमें अमेरिका भारत में अपने सैनिक अड्डे बना सकेगा। वैसे ही जैसे उसने पाकिस्तान में बनाये थे।

जाहिर है, भारत भी अमेरिकी नीतियों को मानने के बदले में सौदेबाजी कर रहा है। सैन्य क्षेत्र में अमेरिका से भारत की उम्मीदें हैं कि वह न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप का मेम्बर बन जाए। एनएसजी में शामिल होने से भारत और अमेरिका दोनों को फायदा है। इसलिए अमेरिका भारत को एनएसजी में शामिल कराने के लिए सभी पूर्व तैयारियां कर रहा है। मिसाइल टेक्नॉलाजी कन्ट्रोल रिजीम में भारत की सदस्यता इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन चीन इसके लिए तैयार नहीं है कि भारत न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप का मेम्बर बने।

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यह बात सही है कि चीन का विस्तार वाद न सिर्फ दुनिया में भारत को रोकने की कोशिश कर रहा है बल्कि भारत की सीमाओं को भी छू रहा है लेकिन यह भी सच है कि ऐतिहासिक रूप से भारत और चीन एक दूसरे के जंगी दुश्मन कभी नहीं रहे हैं। चीन की चुनौतियों से निपटने के लिए भारत सक्षम नहीं है तो अक्षम भी नहीं है। उसे चीन पर जो बढ़त हासिल करनी है वह अपने बूते हासिल कर सकता है लेकिन इस चुनौती के डर से अगर उसने अमेरिका को अपना सैन्य साझीदारी बनाया तो वह ऐसे भंवर में फंसेगा जिसमें फंसने के बाद निकल पाना नामुमकिन हो जाएगा। और कहीं जिक्र हो न हो कम से कम भारत की संसद को इस बारे में बहस जरूर करना चाहिए कि क्या वह अमेरिका को सैनिक अड्डे बनाने के लिए भारत की जमीन देने को तैयार है?

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