सिन्धुदेश का सिन्धुघोष

साल २०१५ में पाकिस्तानी रेन्जर्स ने दावा किया था कि उन्होंने सिन्ध से सिन्धी लिबरेशन आर्मी को खत्म कर दिया है। लेकिन साल भर बाद ३१ जुलाई को लरकाना में पाकिस्तानी रेन्जर्स पर हमला करके सिन्धियों ने संदेश दे दिया है कि वे रुके जरूर थे लेकिन खत्म नहीं हुए हैं। सिन्धुदेश लिबरेशन आर्मी के इन सिपाहियों ने पाकिस्तान रेन्जर्स पर दो धमाके किये जिसमें एक रेन्जर मारा गया। मौके पर वे अपना पर्चा छोड़कर भी गये जिसमें सिन्धुदेश की आजादी का ऐलान किया गया है।

पाकिस्तान के सिन्ध प्रांत के मुसलमान बीते ४५ साल से सिन्धुदेश मूवमेन्ट चला रहे हैं। सिन्धुदेश मूवमेन्ट की बुनियाद जिन्होंने रखी वो जीएम सईद खुद पाकिस्तान मूवमेन्ट का हिस्सा रह चुके थे। वे मुस्लिम लीग के बड़े नेता थे। सिन्ध की प्रांतीय असेम्बली में चुने जाने के बाद से ही वे लगातार मुस्लिम लीग की नीतियों का समर्थन करने लगे थे। १९४० में सिन्ध असेम्बली में पाकिस्तान प्रस्ताव को पास करवाने में उनका अहम योगदान था। लेकिन पाकिस्तान बनने से एक साल पहले ही उनका मुस्लिम लीग से मोहभंग होने लगा था। पाकिस्तान बन जाने के बाद तो पूरी तरह से भंग हो गया। जितनी ताकत उन्होंने पाकिस्तान बनाने में लगाई थी उतनी ही ताकत उसे तोड़ने में लगा दिया। 

१९७२ में उन्होंने जिये सिन्ध मूवमेन्ट की शुरूआत की जिसमें सिन्धुदेश को अलग राष्ट्र बनाने का मुद्दा उठाया गया। जीएम सईद सिन्ध में साईं (फकीर) के नाम से जाने जाते थे। वे सिन्ध में उसी तरह से लोगों के प्रिय नेता थे जैसे बलोचिस्तान में नवाब अकबर खान बुग्ती या फिर खैबर पख्तूनख्वा में सरहदी गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान। लेकिन ये तीनों ही नेता पाकिस्तान बनने के बाद धीरे धीरे उसके विरोधी हो गये और इन तीनों के साथ ही पाकिस्तान ने बहुत बुरा व्यवहार किया। खान अब्दुल गफ्फार खान को देशद्रोही तक घोषित किया गया जबकि जीएम सिन्ध को गिरफ्तार करके पाकिस्तान की जेलों में डाल दिया गया। मुशर्रफ के शासनकाल में नवाब बुग्ती की हत्या कर दी गयी। इस तरह पाकिस्तान ने अलग अलग तरीकों से तीनों को खत्म तो कर दिया लेकिन उनके द्वारा शुरू किये आंदोलन कभी खत्म नहीं हुए। 

जिए सिन्ध मूवमेन्ट ने बाद में अपना नाम बदलकर मुत्तहिदा सिन्धी महाज कर दिया और आंदोलन बदस्तूर जारी है। हाल के वर्षों में जब से कराची में पाकिस्तानी रेन्जर्स की कार्रवाई बढ़ी है सिन्धुदेश मूवमेन्ट ने फिर जोर पकड़ा है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि सिन्धुदेश मूवमेन्ट को लेकर भारत का क्या रूख होना चाहिए। आमतौर पर अब तक भारत की नीति यह रही है कि वह दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देता। बलोचिस्तान में भी पाकिस्तान आरोप चाहे जो लगाये लेकिन वहां का फ्रीडम मूवमेन्ट स्थानीय कद्दावर नेताओं के भरोसे है। बुग्ती और मरी कबीलों की अपनी इतनी ताकतवर पकड़ है कि बलोचिस्तान में अपने बूते वे अपनी आजादी का आंदोलन दशकों से चला रहे हैं। स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने अपनी आवाज बुलंद कर रखी है। लेकिन सिन्धुदेश के हालात दूसरे हैं। 

सिन्धुदेश की सीमा भारत से लगती है। राजस्थान और गुजरात की करीब चार सौ मील लंबी सीमा के इधर भारत है और उधर सिन्ध। बंटवारे के बाद दोनों तरफ के लोगों के एक दूसरे से रिश्ते हैं। सिन्ध में अमरकोट के राणा ने एक बार कहा था कि शायद ही कोई ऐसा परिवार हो जिसका बार्डर पार रिश्ता न हो। मजहब का मामला नहीं है। आज भी पाकिस्तान में जो हिन्दू बच गये हैं वे भारत पाकिस्तान बार्डर के इसी सिन्ध इलाके में हैं। पाकिस्तान के थारपारकर (मीठी) में हिन्दुओं की अच्छी खासी आबादी है लेकिन बहावी आतंकवाद पंजाब से निकलकर अब सिन्ध में भी दाखिल हो रहा है जिसका खामियाजा हिन्दुओं को उठाना पड़ रहा है।

पंजाब के जो जिहादी मुसलमान सिन्ध की तरफ आये उन्होंने बड़े स्तर पर बहावी और देओबंदी मदरसे खोल लिये हैं। कराची का बिनौरी टाऊन मदरसा तो टेररिस्ट रिक्रूटमेन्ट सेन्टर ही कहा जाता है। इन गतिविधियों से न केवल हिन्दुओं के खिलाफ बल्कि गैर सुन्नी मुसलमानों के खिलाफ भी कार्रवाइयां की जा रही है। इसमें मुख्य रूप से अहमदिया और शिया हैं। इसके कारण सिन्ध में पंजाबियों के खिलाफ दोहरी नफरत बढ़ रही है। पहली तो पंजाबियों का सिन्धियों पर बढ़ता दबदबा और दूसरा शिया मुसलमानों पर सुन्नी हावी हो रहे हैं। 

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