आखिर गजनी सोमनाथ क्यों नहीं हो सकता?

हजार साल पहले लूटमार से समृद्ध हुआ गजनी फिर दरिद्र हो गया जबकि सोमनाथ लुटने के बाद भी समृद्ध रहा

​उस दिन रवीन्द्र शर्मा भारत की समाज व्यवस्था के नष्ट हो जाने पर पूछे गये एक सवाल का जवाब देते हुए कह रहे थे कि शांत समाज धूर्तों के सामने पराजित हो जाता है, इसमें कुछ अन्यथा नहीं है। इसका कारण यह है कि सभ्य समाज को किसी पर आक्रमण नहीं करना है, इसलिए उसकी ऐसी कोई तैयारी नहीं होती। ऐसे में जब उस पर आक्रमण होता है तो वह अपना बचाव भी नहीं कर पाता है क्योंकि उसे लगता है कि जब मुझे किसी को नष्ट नहीं करना है तो भला मुझे नष्ट करने कौन आयेगा? लेकिन नष्ट करनेवाले असभ्य आते हैं। हर युग काल परिस्थिति में आते हैं और वो सभ्यताओं को नष्ट करते हैं।

महमूद गजनवी कोई सभ्य समाज से तो नहीं आता था। बर्बर और असभ्य होने के साथ साथ दरिद्र भी था। “द स्टोरी आफ सिविलाइजेशन” में विल डुरंट लिखते हैं “गजनी छोटा सा दरिद्र राज्य था जिसका महमूद सुल्तान बना था। महमूद के पड़ोस में भारत के कई राज्य थे जो संपन्न थे इसलिए अपनी और अपने राज्य की हालत ठीक करने के लिए उसने हमला करने का निश्चय किया। यह भारत पर पहली बार सुनियोजित इस्लामिक आक्रमण था। पहले हमले में उसने हिन्दुओं की हत्या की, मंदिरों को ध्वस्त किया, नगरों को बर्बाद किया और हीरे, जवाहरात, सोने, चांदी से भरे ऊंटों के साथ वापस लौट गया। इसके बाद वह हर साल सर्दियों में भारत की तरफ आता। भीमनगर, मथुरा और सोमनाथ की लूट से वह इतना अमीर हुआ कि संभवत: इतिहास में उससे ज्यादा अमीर दूसरा सुल्तान नहीं हुआ।” 

यहां तक तो रवीन्द्र शर्मा की बात बिल्कुल सही है। वे जो कह रहे हैं इतिहास में भारत के साथ वही हुआ है लेकिन इस प्रकरण को सामने रखकर मेरे मन में दो सवाल उभरते हैं। आज एक हजार साल बाद महमूद के गजनी का क्या हाल है? और उस सोमनाथ और मथुरा की क्या दशा है जिन्हें गजनवी ने लूट और मारकाट का कत्लगाह बना दिया था? आज के अफगानिस्तान का गजनी उसी तरह दरिद्र है जैसे महमूद के सुल्तान बनते समय था और मथुरा, सोमनाथ फिर उसी तरह समृद्ध जैसे सुल्तान के हमले के पहले थे।

नुकसान ज्यादा होगा तो भरपाई करने में वक्त लगता है लेकिन जैसे शरीर अपना घाव भर लेता है वैसे ही सभ्य समाज अपने नुकसान की भरपाई कर लेता है। लेकिन समस्या है असभ्य और बर्बर लोगों के साथ। सभ्यताओं को नष्ट करनेवाले खुद कोई सभ्यता विकसित नहीं कर सकते क्योंकि ध्वंस और निर्माण दो अलग अलग तरह के वैचारिक धरातल हैं। जो आज भी विध्वंस की मानसिकता में जी रहे हैं वो गजनवी को अपना आदर्श उदाहरण मानें और अपनी उस मानसिकता को बदलें जिसके मूल में विध्वंस है। विध्वंस की मानसिकता से गजनी दरिद्र का दरिद्र ही रह जाएगा, सोमनाथ और मथुरा नहीं बन पायेगा।

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