शास्त्र सम्मत विज्ञान को नोबेल

ओह! तो यही आपका भी विज्ञान है। बहुत डर लगता था कि न जाने कौन सा भूत प्रेत है जो बार बार आप वैज्ञानिक नजरिया बोल बोलकर डराते रहते हैं। वेदों में हजारों साल पहले “विज्ञानं ब्रह्म” कहकर जिस सत्य तक तब पहुंचा गया था उसी सत्य तक अब आधुनिक विज्ञान भी पहुंच रहा है। अच्छा ही है। सत्य का बार बार अन्वेषण होना चाहिए। अपने अपने तरीके से होना चाहिए। लेकिन पहली बार विज्ञान के नोबेल पुरस्कार विजेता योशिहोरी ओशुमी विज्ञान को वहां ले गये जहां सदियों पर शास्त्र ले जा चुके हैं। बाहर से भीतर की ओर। 
इस साल के नोबेल पुरस्कार विजेता योशिहोरी ओशुमी ने शरीर की जिन क्षमताओं का वैज्ञानिक अनुसंधान किया है उन क्षमताओं का सदियों पहले पता लगाया जा चुका था और उसी के आधार पर भारत में एक जीवन दर्शन विकसित किया गया। ओशुमी ने पता लगाया है कि उपवाश करने से शरीर शरीर के भीतर की अतिरिक्त कोशिकाओं को खा जाता है। इसलिए शरीर को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी है उपवाश किया जाए। 

दुनिया की कमोबेश हर सभ्यता में उपवाश को कहीं न कहीं जगह मिली हुई थी लेकिन भारत में उपवाश बहुत वैज्ञानिक व्यवस्था बनायी गयी। भोजन के संस्कार की तरह की उपवाश के संस्कार हैं। “अन्नम् वै प्राण: तद् व्रतम!” अन्न ही प्राण है लेकिन इसके बाद भी उपवाश करिए। ओशुमी ने एक और वैदिक वाक्य को वैज्ञानिक सिद्धांत बनाया है। उन्होंने आगे कहा है कि शरीर में ही शरीर के उपचार की क्षमता होती है। एक बार फिर तैत्तरीय उपनिषद पढ़िये जो कहता है “तनुरेव तन्वो अस्तु भैषजम।” शरीर ही शरीर का सबसे अच्छा चिकित्सक है। 

इसलिए मुझे लगता है इस साल हेल्थ का नोबेल ओशुमी को नहीं उपनिषदों के दो सूत्रों को मिला है। पहला “अन्नम् वै प्राण: तद् व्रतम्” और दूसरा “तनुरेव तन्वो अस्तु भेषजम्”। उनकी खोज उपनिषद के यही दो सूत्र हैं। लेकिन वेदों उपनिषदों को तो नोबेल दिया नहीं जा सकता तो ओशुमी को ही सही। सही सिद्धांत को मान्यता मिलनी चाहिए चाहे वह किसी भी नजरिए से मिले। ओशुमी का नजरिया बिल्कुल सही है। इसलिए वे नोबेल के सच्चे हकदार हैं।

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