ब्राह्मणवादी कम्युनिस्ट

हालांकि भारत में साम्यवाद की स्थापना और उभार दोनों ही दमित, शोषित और मजदूरों के उत्थान के नाम पर हुआ लेकिन समय के साथ साथ खुद साम्यवाद उसी ब्राह्मणवाद का शिकार हो गया जिसके विरोध में वह खड़ा हुआ था। ​राजनीतिक आजादी आने के बाद जितने उच्च वर्ण वाले प्रगतिशील लोग थे वो सब कम्युनिज्म और सोशलिज्म की तरफ भागे। पढ़े लिखे तेज दिमाग लोग। ज्यादातर ब्राह्मण। राजनीति से लेकर समाज तक, विश्वविद्यालय से लेकर फिल्म तक इनकी पहुंच और पकड़ बनी। 

लेकिन इसके विपरीत का जो राजनीतिक हिन्दू पुनर्जागरण हुआ उसकी कमान पिछड़े वर्ग के हाथ में थी। बीजेपी को ब्राह्मणवादी पार्टी कहा जरूर गया लेकिन असल में वह पिछड़े वर्ग का हिन्दूवादी उभार था। असली ब्राह्मणवादी दल कम्युनिस्ट पार्टियां थीं क्योंकि वैचारिक स्तर पर सबसे ज्यादा ब्राह्मण इस ओर ही आये थे। याद करिए सीपीआई के सबसे प्रखर महासचिव पीसी जोशी को जिन्होंने देश में  साम्यवाद की बुनियाद रखी। यह सिर्फ एक ब्राह्मण बुद्धि ही सोच सकती थी कि लंबे समय तक जिंदा रहना है तो राजनितिक जनाधार से ज्यादा बौद्धिक जनाधार विकसित करो। 

भारत में कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया के पहले महासचिव पंडित पीसी जोशी ने जब राजनीति से अलने अलग हटने का फैसला किया तो घर नहीं बैठे। वे जेएनयू में जाकर बैठे और साम्यवाद की ऐसी मजबूत वैचारिक बुनियाद रखी कि आज भी उस बुनियाद को हिलाने की ताकत हिन्दूवादियों में नहीं आ सकी है। 

जबकि दूसरी तरफ जो हिन्दूवादी पनपे उनकी खोज सत्ता और ताकत थी। यह ब्राह्मण की सोच नहीं है। ब्राह्मण सत्ता नहीं खोजता। वह सत्ता का नियंत्रक होता है जैसे कम्युनिस्ट लंबे समय तक कांग्रेस की सरकारों के रहे। लेकिन कम्युनिस्टों से इतर जो गैर ब्राह्मण हिन्दूवादी उभार था उसने धार्मिक विस्तार के नाम पर मूर्खों की एक पूरी पीढ़ी सामने कर दी। आज जितने गलत बयानी नेता बीजेपी या वीएचपी के दिख रहे हैं वो सब ओबीसी कम्युनिटी से आते हैं। निरंजन ज्योति से लेकर साध्वी प्राची तक। यहां तक कि बीजेपी में ब्राह्मणों का भयंकर अनादर और तिरस्कार है। एक तो डर है कि बदनामी हो जाएगी और दूसरा बनिया और ओबीसी वर्चस्व जो ब्राह्मणों को अपने पास टिकने नहीं देता है। 

इसका नतीजा यह है कि पूर्ण बहुमत की सत्ता के बाद भी बीजेपी वैचारिक दरिद्रता का शिकार है और मुट्ठीभर ब्राह्मणवादी कम्युनिस्ट हर चौथे दिन वैचारिक रूप से बीजेपी को घेरकर लतिया देते हैं। हो सकता है सत्ता के शिखर पर जा बैठी बीजेपी को कभी यह समझ आये या हो सकता है कभी न आये लेकिन हकीकत यही है। समझ में आया तो वैचारिक रूप से टिक जाएंगे, नहीं आया तो जिस तरह उपजे हैं उसी तरह विनश जाएंगे।

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