हड़बड़ी में हुई गड़बड़ी? 

2000 के नोट की छपाई का काम मैसूर प्रेस में लगभग हो गया था। उसका स्टॉक दिल्ली के आरबीआई हेडक्वार्टर में बनाया गया था जहां से देशभर के बैंकों को सप्लाई की जा रही थी। एक अखबार का दावा तो यह है कि छह महीने पहले से चुपचाप से यह काम चल रहा था और नोटों की ढुलाई के लिए एक निजी चार्टर्ड विमान किराये पर लिया गया था। जो भी था दो हजार के नोटों का पर्याप्त शुरूआती भंडार सरकार के पास था। 
अब पांच सौ के नोटों की छपाई शुरू होनी थी। सरकाप के नाशिक और देवास प्रेस में पांच सौ के नये नोट छापने थे। शुरुआत भी हो गयी और पचास लाख नोटों की पहली खेप शुक्रवार शाम आरबीआई को मिल भी गयी। दूसरी खेप बुधवार को आयेगी। इस लिहाज से एक से दो महीने में रिजर्व बैंक के पास नये नोटों का इतना भंडार होता कि वह यह ऐतिहासिक योजना को लागू कर सकती। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। 

7 नवंबर को विजिलेन्स कर्मचारियों का दिल्ली के विज्ञान भवन में सालाना जलसा था जिसे प्रधानमंत्री जी ने संबोधित किया। हमेशा की तरह यहां यहां भी उन्होंने बड़ा जोरदार भाषण दिया। लेकिन भाषण देने के बाद जब वे कुर्सी पर बैठे तो सहज नहीं थे। उनके चेहरे पर एक अजीब सी खीझ और झुंझलाहट थी। मेरा ध्यान भी किसी ने इस ओर दिलाया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ भाषण तो इन्होंने बहुत अच्छा दिया फिर इतनी झुंझलाहट में क्यों हैं? 

संभवत: यही वह मौका था जब मोदी ने आनन फानन में फैसला लिया कि काले धन के खिलाफ अब ऐतिहासिक ऐलान कर देना है। लौटकर आने के बाद उन्होंने वित्त मंत्रालय के सचिव के साथ गुप्त बैठक की और चौबीस घण्टे के भीतर ही 8 नवंबर को राष्ट्र के नाम संबोधन हो गया। 

अब साफ दिख रहा है कि यह हड़बड़ी में लिया गया फैसला है। सरकार का प्रबंधन तंत्र जो तैयारी कर रहा था उसके बीच में ही यह योजना लागू कर दी गयी। न तो कोई अफवाह थी और न ही कोई ऐसा माहौल कि सरकार कि योजना की भनक किसी को लगी हो। इक्का दुक्का खबरें आयीं जरूर लेकिन किसी ने ध्यान दिया नहीं। लेकिन संभवत: सरकार की तरफ से जारी तैयारियों के बीच की गयी इस घोषणा से अफरा तफरी का माहौल बन गया। सरकार के पास न तो पर्याप्त नोट थे और न ही एटीएम मशीनें तैयार थीं। तिस पर मोदी के जापान चले जाने से स्थिति और भयावह हो गयी। इसलिए कहे कोई कुछ लेकिन परिस्थितियां साफ इशारा कर रही हैं कि मोदी से हड़बड़ी में गड़बड़ी हो गयी है। नतीजा क्या आयेगा, राम जाने।

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