काला धन कितना काला है?

​बहुत समझदारी भरी बातें करने का दौर नहीं है ये। मूर्खता भरी बातें करिए। लोग खुश रहेंगे और आप की जान को सांसत भी नहीं होगी। काले धन पर सारी कांव कांव के बीच एक बात गांठ बांधकर रख लीजिए। इससे हमारी जेबों में अदला बदली करके नयी नोट जरूर आ जायेगी लेकिन अगर आपको लगता है कि देश समाज व्यक्ति किसी को कुछ हासिल होगा तो कुछ हासिल नहीं होगा। 
अव्वल तो यह अपने आप में बहुत बड़ा मिथक है कि काला धन जैसी कोई चीज होती है। काला पीला धन जैसा कुछ होता नहीं। जो होता है वह है बैंकिंग मनी और नॉन बैंकिंग मनी। बैंकिग मनी एक तरह का बाजार चलाती है और नॉन बैंकिंग मनी भी एक दूसरे तरह से बाजार चलाती है। दोनों बाजार में चलते हैं। दोनों व्यापार करते हैं लेकिन दोनों के आखिरी सिरे पर दो अलग अलग तरह के मुनाफाखोर बैठे होते हैं। दोनों की आपस में जंग चलती रहती है कि अपने मुनाफे को अधिक से अधिक कैसे बढ़ाया जाए, बचाया जाए। 

इन दोनों में सरकार बैंक के साथ होती है क्योंकि उसे बैंक के साथ खड़े रहने में बहुत सारी सहूलियत और मुनाफा होता है। इसलिए गैर बैंकिंग व्यवस्था में पड़े धन को वह ब्लैक मनी घोषित कर देती है। लेकिन यह सिर्फ सरकार का नजरिया है। जनता का और समाज का नजरिया ऐसा बिल्कुल नहीं होता। उलटे जिसे सरकार ब्लैक मनी घोषित करती है जनता के लिहाज से वह ज्यादा ह्वाइट मनी है। वैसे भी निजी बचत का स्वभाव होने के कारण भारत में गैर बैंकिंग मनी की अहमियत बैंकिंग मनी से ज्यादा है।

इसी नॉन बैंकिंग मनी की बदौलत भारत आज तक बीते बीस पच्चीस सालों में आर्थिक मंदी से अछूता रहा है। यह सौभाग्य की बात है कि आज भी पच्चासी फीसदी गांव बैंकिंग सिस्टम से दूर हैं। यह हमारी ताकत है जो हर आड़े वक्त में हमारे काम आती है। लेकिन सरकार ऐसे में कमजोर होती है। मजबूत होता है समाज जो कि सरकार के लिए हमेशा बड़ा खतरा होता है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को जो सरकार चलायेगी वह कभी नहीं चाहेगी कि समाज मजबूत हो। वह हमेशा चाहेगी कि सरकार का नियंत्रण समाज और व्यक्ति पर हमेशा कठोर से कठोर होता जाए। नहीं तो जिसे ब्लैक मनी कहा जाता है उसका सबसे बड़ा खेल बैंकिंग सिस्टम में होता है। कभी स्विस बैंक, कभी मारीशस रूट तो कभी पनामा गेट। ये सब बैंकों के ब्लैक मनी के सेफ गेट हैं। अगर लालाजी आपको काले धन का खजांची लगते हैं तो मोर्गन स्टैनली कौन हैं भला? 

इसलिए जिस काले धन पर सरकार रोक लगाना चाहती है वह उसके लिए घाटे का सौदा है लेकिन बैंक का धन समाज के लिए घाटे का सौदा है। लेकिन हम मान भी लें कि सरकार के इस पहल से काले धन का एक झटके में खात्मा हो जाएगा तो कितने दिन के लिए? वह जिसे सरकार काला धन कहती है उसके बनने की प्रक्रिया तो कभी बंद ही नहीं हो सकती। तात्कालिक तौर पर कुछ फायदे जरूर होंगे। बैंकों के पास नकदी का बहाव आ जाएगा। कारपोरेट घराने जो बैंक के कर्जों से कारोबार करते हैं उन्हें जनता की गाढ़ी कमाई आसान ब्याज पर मिल जाएगी जिसका इस्तेमाल वे फिर आम आदमी को गरीब और खुद को थोड़ा और अमीर बनाने के लिए करेंगे। आतंकवाद और हवाला कारोबार पर फौरी तौर पर रोक लगेगी लेकिन वह अस्थाई ही रहेगा। थोड़े ही दिनों में सबकुछ पूर्ववत हो जाएगा तो फिर इस अफरा तफरी की जरूरत क्या थी? सरकारों को पता होता है कि काला धन कहां कहां पल बढ़ रहा है। अगर हिम्मत और ईमानदारी होती तो सरकार सीधे वहां हाथ डालती। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। 

खैर छोड़िये। जाने दीजिए। कहां का रोना लेकर बैठ गये। आप भी पेटीएम मय हो जाइये, शनि महाराज हो गये हैं। आप वह दुनिया देखना चाहते हैं जिसे देखकर अमेरिका और अब चीन के लोग बैंकों के गुलाम हो चुके हैं। देख लीजिए। बिना बर्बाद हुए अपनी व्यवस्थाओं की अहमियत समझ में कहां आती है?

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s