एक जिन्दगी जयललिता सी

गजब जीवन था जयललिता का। जिन्दगी में उन्हें वह कुछ नहीं मिला जो वह पाना चाहती थीं लेकिन जो मिला वही उनकी पहचान बन गया। पैदा हुईं कर्नाटक में लेकिन  पहचान मिली तमिलनाडु में। दो साल की उम्र में पिता का निधन हो गया तो पालन पोषण मां के कंधे पर आ गया। मां रोजगार की तलाश में फिल्मों की तरफ गयीं तो संयोग ऐसा बना कि एक बाल कलाकार के रूप में एक हिन्दी फिल्म में उन्हें तीन मिनट का रोल मजबूरी में करना पड़ा। भरतनाट्यम् की विद्यार्थी जयललिता अभी मैट्रिक में ही थीं कि उन्हें तमिल फिल्मों में अभिनय का आफर आ गया। मां के दबाव में उन्होंने अभिनय करना तो स्वीकार कर लिया लेकिन कैसी विडंबना थी कि पंद्रह साल की उम्र में उन्हें एक “केवल वयस्कोंं के लिए” वाली फिल्म में काम करना पड़ा। फिल्म रिलीज हुई तो वो खुद नहीं देख पायीं क्योंकि वो खुद वयस्क नहीं थी। 

इसके बाद प्रथम श्रेणी कि फिल्मों में उनका पहला रोल विधवा स्त्री का था। यहां से उनका तमिल फिल्मों में विधिवत प्रवेश हुआ। फिर तो जैसे जयललिता ने तमिल फिल्मों में उबाल ला दिया। पहली बार तमिल फिल्मों में जयललिता ने बिना बाजू के ब्लाउज पहने जो सनसनी जैसी थी। फिल्मों में काम करते हुए उन्हें शोभन बाबू से प्यार हो गया। लेकिन उनका पहला प्यार परवान न चढ़ सका क्योंकि शोभन बाबू शादीशुदा थे। इसके बाद जयललिता की जिन्दगी में एमजी रामचंद्रन का प्रवेश होता है जो अपने दौर के तमिल सुपरस्टार थे। एमजीआर के साथ उनके जिन्दगी की जो फिल्मी पारी शुरू हुई तो एमजीआर की मौत के बाद सियासी रंगमच पर आकर खत्म हुई। 

एमजीआर के साथ उन्होंने २८ हिट फिल्मों सहित अस्सी हिट फिल्में दी। एमजीआर राजनीति के सितारे बने तो विरासत संभालने के लिए एक बार फिर जयललिता आगे आयीं। हालांकि खुद जयललिता राजनीति में नहीं आना चाहती थीं। न फिल्म उन्होंने चुना और न ही राजनीति। लेकिन दोनों ही जगह वे एक रोल मॉडल बनीं। शायद फिल्म और राजनीति ने अपनी प्रसिद्धि के जयललिता का चयन किया था। मानो द्रविण स्क्रिप्टराइटर करुणानिधि ने अपनी फिल्मों से तमिलनाडु में जो नास्तिक फिजा बनाई थी उसकी काट के रूप में अम्मा (देवी) का उभार होता है। फिल्मी सितारे राजनीति के सितारे शायद इसलिए बन गये क्योंकि तमिल समाज लंबे समय से फिल्मों के जरिए नायकत्व ही नहीं विचारधारा की तलाश कर रहा था। 

जयललिता ने तमिल राजनीति में वह जगह भरी जो एमजीआर खाली कर गये थे। बहुत अतिवाद और जिद्द के समानांतर उनका एक जनवादी उदार चेहरा भी हमेशा सामने आता रहा। शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती को जेल भिजवाने का मामला हो या फिर करुणानिधि सरकार द्वारा बनायेे गये विधानसभा भवन को अस्पताल बनाने का मसला उनकी जिद्द का चरमोत्कर्ष था। लेकिन ठीक इसके विपरीत वो जनता से जुड़ी सहूलियतों का इतना ध्यान रखती थीं कि मिक्सी ग्राइंडर तक राशन कार्ड से बंटवाने में संकोच नहीं करती थीं। एक तरफ उनका लकदक जीवन है और दूसरी तरफ उनका जीवन दर्शन।  दत्तक पुत्र की शादी करती हैं तो सारे देश में उनके शाहखर्ची के चर्चे हो जाते हैं लेकिन वही जयललिता जनता की छोटी छोटी जरूरतों का ऐसा ध्यान रखती थीं कि उनका वादा भी करतीं और पूरा भी। 

फिल्मों की शोख चंचल और दिलकश अदाकारा राजनीति में आयी तो इतनी धीर गंभीर हो गयी कि लोगों ने देवी के रूप में स्वीकार कर लिया। यह सिर्फ जयललिता ही कर सकती थीं। यह सिर्फ उन्होंने ही किया भी।

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