दोजख को जन्नत समझने का दुख

तीन मेल स्टार हैं इस दौर में। शाहरुख। आमिर और सैफ। तीनों को अपने धर्म मजहब में एक अदद पत्नी नहीं मिली। जब प्यार मोहब्बत शादी करना हुआ तो उन्हें अपने मजहब के दायरे से बाहर जाना पड़ा। एक चौथा भी जाना चाहता था लेकिन ऐश्वर्या ने साथ नहीं दिया इसलिए अकेला रह गया। 
इन चारों को अगर आप मुस्लिम समाज के नजरिए से देखें तो पायेंगे कि बीस करोड़ लोगों की दुनिया औरतों को लेकर इतनी दमित और पिछड़ी है कि कोई सफल आदमी अपने लिए जीवनसाथी नहीं खोज सकता। जीवनसाथी का मतलब बुर्क में लिपटी एक काली आकृति नहीं होती। मनुष्य मन की इच्छाएं समान होती हैं वो धर्म बदल देने से बदल नहीं जातीं। इसलिए जैसे ही आप अपने नियम खुद निर्धारित करने लगते हैं तो आपको भी सहज लोग पसंद आते हैं। 

लेकिन इस्लाम औरतों के दमन का सबसे कारगर हथियार है। जब औरत की गुलामी की बात आती है तो बाकी धर्म भी इसके तरीकों के आगे बौने साबित होते हैं। एक से एक तरीके गढ़े गये हैं। ये शायद मनुष्य मन की कमजोरियां होती हैं जो औरत को ज्यादा से ज्यादा नियंत्रित करता है क्योंकि वह अपनी वासनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाता है। स्त्री अंगों के प्रति पुरुष में बहुत जबर्दस्त आकर्षण होता है। पूरब की सभ्यता में जो धर्म पनपे उन्होंने इस आकर्षण से पार पाने के लिए स्त्री के दमन का रास्ता नहीं पकड़ा। उन्होेंने आत्म दमन और संयम को अपना मार्ग बनाया। इसलिए हिन्दू हो या बौद्ध या फिर जैन आप इनकी जीवनशैली देखेंगे तो पायेंगे कि पुरुष सामान्यत: यौन कुंठा का शिकार है। यह उसका संयम के नाम पर किया जानेवाला दमन है जो उसे कुंठित कर देता है। 

अरब की कबीलाई सभ्यता में इस्लाम से पहले बिल्कुल यही पद्धति थी। औरतों पर नियंत्रण के कोई सख्त नियम कानून नहीं थे। बल्कि इस्माइल के प्रभाव में जो स्थानीय धर्म परंपराएं पनपीं उनमें औरत का सम्मान था। खुद मोहम्मद साहब का कुरैश कबीला किसी देवता का नहीं बल्कि देवी का उपासक था। जो काला पत्थर काबा में लगाया गया है, जिसे हज के दौरान मुसलमान चूमते हैं वह उसी कुरैश कबीले की देवी का पत्थर है जिससे मोहम्मद साहब ताल्लुक रखते थे। उनकी पहली पत्नी खुद एक सफल व्यवसायी थीं। जाहिर सी बात है, किसी बंद समाज में कोई महिला सफल कारोबारी नहीं हो सकती थी। 

लेकिन बाद में बहुत सारी गड़बड़ की गयी और उस पर इस्लाम का आवरण चढ़ा दिया गया। युद्ध में जीती जानेवाली औरतों के बंटवारे वाले नियम को चार शादी का नियम बना दिया गया। जिस हिजाब का मतलब हया होता है उसे स्कार्फ बना दिया गया जो कि अनिवार्य रूप से औरत के सिर पर रहना ही चाहिए। औरतों के सामान्य रूप से खांसने पादने तक पर फतवे जारी कर दिये गये। ये सब नियम कानून असल में पुरुष की अपनी कामोत्तेजना को न भड़कने देने के साधन थे जिन्हें औरतों पर लाद दिया गया। स्त्री देह के प्रति पुरुष के मन में जो स्वाभाविक आकर्षण है उसको नियंत्रित करने के लिए इस्लाम में दुनियाभर के नियम कानून गढ़े गये और स्त्री को विकृत किया गया। 

आज इस्लाम में औरतों की क्या दुर्दशा है इसे जानने के लिए देश की शिक्षा व्यवस्था में मुस्लिम लड़कियोम की हिस्सेदारी देखकर लगा लीजिए। कभी जिस फिल्म इंडस्ट्री में एक से एक प्रतिभावान मुस्लिम लड़कियां अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाती थीं आज वहां एक कायदे की अभिनेत्री नहीं मिलेगी। यह ऊपरी तौर पर चाहे जो लगे लेकिन गहरे में यह बीमारी का लक्षण बताता है कि कैसे एक समाज धर्म के नाम पर भीतर ही भीतर बीमार हो गया है। शाहरुख की गौरी और सैफ अली की करीना उसी बीमारी का लक्षण हैं। लेकिन मुसलमानों का दुर्भाग्य यह है कि उन्हें जिस बीमारी पर रोना पीटना चाहिए वो उस पर ताली बजाते हैं। वे उसी को जन्नत बता रहे हैं जो जीवित इंसान के दोजख हैं।

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