सफेद धन के खिलाफ डिजिटल स्ट्राइक

कोई सेवक यह काम क्यों करेगा कि लाओ अपने पैसे तुम मेरे पास रख दो? अगर आप बैंकिंग सिस्टम को समझते हैं तो यह भी समझते होंगे कि बैंक केन्द्रित पूंजीवाद का सबसे सशक्त हथियार है। विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था में लेनदारी और देनदारी का जो काम लाखों लोग किया करते हैं पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में यही काम चंद बैंक करते हैं। इसलिए जन धन योजना असल में जन निर्धन योजना थी लेकिन कहा यह गया कि इससे देश मजबूत होगा। 

लेकिन बात वहां तक भी रहती तो ज्यादा मुश्किल न होती। अब उसके आगे जाकर कह रहे हैं कि चाय का बिल भी पेटीएम करो। तीन हजार तक की खरीदारी डिजिटल तरीके से करने के लिए ईनामों की सौगात दी जाएगी। मकसद साफ है कि छोटी पूंजी के वो लोग जो अभी तक बैंकिंग सिस्टम के बाहर थे वो बैंकिंग सिस्टम में आयेंगे और बड़ी मछली का पेट भरेंगे। 

ये दोनों योजनाएं किसी सेवक के दिमाग में नहीं आ सकती। यह किसी ठग के दिमाग में ही आ सकती हैं जो  यह जानता हो कि जन धन ही सबसे बड़ा धन होता है। अगर उस पर हाथ साफ कर दिया जाए तो रातों रात अमीर हो जाएंगे। और कोई प्रधानमंत्री भले ही ऐसा पहली बार कर रहा हो लेकिन कंपनियां तो आये दिन ऐसा करती रहती हैं। सहारा कंपनी के खिलाफ तो सुप्रीम कोर्ट में ऐसी धोखाधड़ी का केस ही चल रहा है। उसने भी जन धन से हजारों करोड़ इकट्ठा कर लिये थे और फिर उसकी योजनाएं लुप्त हो गयीं थीं। 

ऐसी योजनाओं के जरिए जन धन के लूट का सबसे बड़ा फायदा ये होता है कि लुटने वाला बड़ी छोटी रकम खोता है लेकिन लूटनेवाला मोटा माल हथियाता है। मसलन चाय के लिए दस रूपये का अगर आप डिजिटल भुगतान करते हैं तो शायद सात पैसा आपको सेवाकर देना पड़े। क्या फर्क पड़ता है आपको सात पैसे से? लेकिन जो दस दस रूपये का भुगतान ले रहा है उसे भारी फर्क पड़ता है। उसकी कमाई लाखों और करोड़ो में होती है। 

खैर, अगर लोग समझदार होंगे तो इस लूट से खुद को बचाने का प्रयास करेंगे। डिजिटल मनी का इन्कार न करें लेकिन इस तरह से स्वीकार भी न करें। कैश और डिजिटल के बीच अपनी जरूरतों के मुताबिक एक संतुलन कायम रखें। यही आपके हित में है और यही भारतीय समाज के भी हित में है। बैंकों की गुलामी अच्छी बात नहीं है। यह कोई विकास नहीं है बल्कि मनुष्य और समाज का विनाश है। लोक मानस और लोक समझ को बचाते हुए अपनी अर्थव्यवस्था को अपने हाथ में रखिए। लॉटरी में मिलनेवाले करोड़ों की लालच में अपना हजारों बर्बाद मत करिए।

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