समाज को बदनाम करते कानून

भारत के सभी कानून यूरोप और अमेरिका की देन हैं। भारत का कोई भी कानून भारतीय नहीं है। पहले अंग्रेजों के कानूनों को हूबहू कॉपी पेस्ट किया गया उसके बाद शुरूआत हुई अमेरिका से नकल करने की। एक बार एक जज ने बताया था कि हमारे फैसलों के ज्यादातर रिफरेन्स भी अमेरिकी फैसले ही होते हैं। 
भारत में कानून बनवाने का एक नेक्सस काम करता है। इसमें अमेरिकी फण्डेड एनजीओ, एडवोकेसी ग्रुप, लॉ फर्में और ब्यूरोक्रेट्स शामिल रहते हैं। ये लोग सालों साल माहौल बनाते रहते हैं और सरकार को मजबूर करते हैं कि वो जिस कानून की बात कर रहे हैं वो कितना जरूरी है। आखिरकार मीडिया के मूर्खताभरी रपटों और इन धूर्त फण्डखोरों की मदद से एक माहौल बना लिया जाता है कि कोई कानून पास करवा लिया जाए और अंतत: संसद के बंदर बिना कुछ जाने समझे कानून बनाकर वाहवाही लूटने लगते हैं। 

अमेरिकी या फिर यूरोपीय संस्थाएं जानती हैं कि भारत में फिलहाल सीधे हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता इसलिए वो कानूनों का सहारा लेती हैं। हाल फिलहाल में ऐसे कुछ नये कानून बने हैं या कानूनों में संशोधन किया गया है जिसमें अमेरिकी और यूरोपीय फंडखोर संस्थाएं अति सक्रिय थीं। अभी एक और कानून के लिए जबर्दस्त लॉबिंग चल रही है कि कैसे पति पत्नी के बीच रेप घुसाया जाए। जो फण्डखोर जमातें हैं वो शांत नहीं बैठी हैं और जब तक वो अपने मकसद में कामयाब नहीं हो जातीं, शांत बैठेंगी भी नहीं क्योंकि उन्हें शांत बैठने के लिए डॉलर नहीं दिये जाते हैं। 

सवाल ये है कि ये सब कानून क्यों बनवाये जा रहे हैं? जवाब ज्यादा मुश्किल नहीं है। हम अपनी ही नजरों में गिर जाएं। एक समाज को गुलाम कैसे बनाया जा सकता है? उसकी व्यवस्थाओं को भंग करके। उन्हें हीन और तुच्छ बताकर। भारत जैसी उन्नत सामाजिक व्यवस्था वाले देश को नष्ट करने के लिए कानून से बेहतर भला और कौन सा रास्ता हो सकता है? और अगर वह कानून एक सामाजिक रूप से नष्ट हो चुके देश से आये तो कहने ही क्या? आश्चर्य होता है जो अमेरिका और यूरोप कभी समाज नहीं रह पाये वो हमें कानून बता रहे हैं। लेकिन उससे ज्यादा आश्चर्य इस बात पर होता है कि बिना कुछ सोचे समझे हम उसे जस का तस मान भी ले रहे हैं। 

हमारी अपनी सामाजिक व्यवस्थाएं बहुत उन्नत हैं। उनमें व्यक्ति, समाज, संसार सबका भला निहित है। इस देश को अमेरिकी और यूरोपीय कानूनों की कोई जरूरत नहीं है। इस देश को समय समय पर सामाजिक पुनर्जागरण की जरूरत है ताकि यह अपने दोषों से मुक्त होकर नवजीवन धारण करता रहे। उसके बारे में सोचिए। कानूनों के जाल से जीवन हासिल नहीं होगा।

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